रामत्व के बिना खेल भी युद्ध बन जाता है
October 5, 2022संवाद
"रामत्व के बिना खेल भी युद्ध बन जाता है"
राम के लिए जीवन-संघर्ष किसी लीला से रत्ती भर भी ज्यादा नहीं था। अतः जीवन में जय हो या पराजय ; राम का समत्व-योग सदैव बना रहा जिसके कारण उनके लिए हर दिवस विजयादशमी का दिवस था।
आज की घटनाओं को देखकर लगता है कि उनसे राम भक्तों ने कुछ भी नहीं सीखा। इंडोनेशिया में खेल का मैदान 'मौत का मैदान' बन जाता है। यहां खेल को भी युद्ध बना लिया जा रहा है तभी तो अपनी पसंदीदा टीम को हारते हुए देखकर परस्पर मारपीट में 175 लोगों की जानें चली जाती हैं जबकि इंडोनेशिया में रामलीला का सर्वाधिक मंचन किया जाता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम ने तो युद्ध को भी खेल की तरह लड़ा। बिना रथ के और बिना शरीर पर किसी कवच के वे रथी और कवच पहने हुए रावण से लड़ते हैं; जीता हुआ राज्य विभीषण को सुपुर्द कर देते हैं और अपने भाई लक्ष्मण को रावण से भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहते हैं।
आज तो फिल्मों में कुछ दृश्यों के दिखाने से राम-भक्तों की आस्था को चोट पहुंच जाती है जबकि राज्याभिषेक की खबर के बाद वनगमन की खबर से राम की आस्था वनवास देने वाले अपने पिता के प्रति और सौतेली मां कैकई के प्रति थोड़ी भी नहीं डिगती और वे विचलित तक नहीं होते-
"प्रसन्नतां यां न गता अभिषेकत:
न तथा मम्लौ वनवासदुखत:"
एक समय था कि रामलीला में काम करने वाले और सहयोग करने वाले की धर्म,जाति कुछ नहीं पूछी जाती थी; सिर्फ राम लीला में अभिनय और सहयोग करने मात्र से उनके प्रति श्रद्धा जग जाती थी जो समाज में प्रेम और भाईचारा को बढ़ा जाती थी। आज मंदिरों के बाहर यह ख्याल रखा जाता है कि किस धर्म और किस जाति के लोग बैठे हुए हैं;जबकि राम ने सभी को गले लगाया।
प्रेम-शांति-करुणा की मूर्ति राम के जीवन से संवेदनशीलता और संवादशीलता की प्रेरणा मिलती है किंतु राम का नाम लेने वालों में संवेदनहीनता और संवादहीनता की खबरें दिखने लगती हैं तो ऐसा लगता है कि भारतीय संस्कृति के अग्रणी प्रतिनिधि राम को समझने में कुछ भूल की जा रही है।
जिस संस्कृति में रावण को जलाने वाले और रावण की पूजा करने वाले दोनों लोग आपस में खुशी खुशी रह सकते हैं, उस संस्कृति की विराटता और उदारता का क्या कहना!
स्वामी विवेकानंद से किसी ने पूछा कि "जीवन क्या है?" तो उन्होंने बड़ा प्यारा उत्तर दिया कि "हमारे अंदर का काम-क्रोध- लोभ रूपी रावण हमारे भीतर के प्रेम-शांति-करुणा रूपी राम को हर हालत में हराना चाहता है; दोनों के बीच चल रहे संघर्ष का नाम ही जीवन है।
जीवन में विजयादशमी का दिवस तभी आता है जब हृदय की विशालता और उदारता के साथ त्याग-तपस्या-धैर्य के कारण "रामत्व" जीत जाता है-
"यह कौन चमनपरस्त गुजरा है इन राहों से
हमने कांटों पर भी होठों के निशान देखे हैं।"
राम ने तो राह के कांटों को भी चूमा है क्योंकि उनके लिए कांटें फूलों के दुश्मन नहीं , बल्कि फूलों के प्रहरी हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
विजयादशमी की शुभकामना🙏🌹