संवाद


"मन के अनुसार हो तो अच्छा, नहीं हो तो बहुत अच्छा"


मानसिक स्वास्थ्य आज मानव की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है, इसी कारण 10 अक्टूबर को मनाया जाने वाला "विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस" का महत्त्व भी बहुत बढ़ता जा रहा है। 2022 के लिए विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की थीम है- "Make mental health and well being for all a global priority" अर्थात् 'सभी के लिए मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक-प्राथमिकता बनाओ'


मानव अपने मन के अनुसार जीना चाहता हैं किंतु जिंदगी अस्तित्व के अनुसार और ही ढंग से चलती है। जब मन और जिंदगी में फासला बढ़ने लगता है तो मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। इसकी परिणति निराशा,अवसाद,हत्या और आत्महत्या के रूप में होती है। जम्मू कश्मीर के डीजी (जेल) के हत्यारे यासीर ने अपनी डायरी में लिखा है कि मेरी जिंदगी में प्यार जीरो प्रतिशत और दिखावा 100%। ओ प्यारी मौत!मेरी जिंदगी में आ जाओ ..... यह दृष्टांत आज विचारणीय है की जिंदगी में मानव क्या चाहता है? और उसे क्या चाहिए??


कोरोना काल और उसके बाद पोस्ट कोविड प्रभाव ने मन को छिन्न-भिन्न कर दिया है।मौत,बीमारियां,आर्थिक-सामाजिक-पारिवारिक चुनौतियां इतनी बढ़ गई है कि मन के अनुकूल कुछ भी घटित नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ मन के प्रतिकूल परिस्थितियों में जीने की कला हमने सीखी ही नहीं।


हमारे परिवेश में किसी के बेटे ने आत्महत्या कर ली तो किसी का जवान बेटा मर गया, किसी का परिवार टूट गया तो किसी को पैरालाइसिस-कैंसर जैसी बीमारियों ने तोड़ कर रख दिया। जिससे भी बात करो उसका मन रुठा या टूटा है।


मनोचिकित्सकों के अनुसार हर चौथा आदमी mental है। किंतु जागरूकता का आलम यह है कि भारत में किसी को शारीरिक रूप से बीमार कहने पर वह बुरा नहीं मानता किंतु मेंटल या मानसिक रूप से बीमार कहने पर वह लड़ने को आतुर हो जाता है।


मन अकेले भी रहना नहीं जानता और किसी के साथ भी रहना नहीं जानता। अतः साइकियाट्रिस्ट और डिप्रेशन की दवा की मांग बढ़ती जा रही है। शिक्षा-संस्थानों में मेंटल हेल्थ कमेटी बना दी गई है।


व्यक्ति का जीवन दूसरे से लड़ने में ही नहीं जा रहा है बल्कि वह स्वयं से भी लड़ रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध बाहर में ही नहीं हर व्यक्ति के भीतर भी लड़ा जा रहा है। थाईलैंड में एक पुलिसकर्मी बिना किसी व्यक्तिगत दुश्मनी के डे केयर सेंटर में गोलीबारी करके 37 लोगों को मार देता है, जिसमें 22 बच्चे थे। दिनदहाड़े किसी लड़की पर तेजाब फेंक दिया जाता है या किसी अंकिता द्वारा बात नहीं मानने पर उसे नहर में फेंक दिया जाता है। मानसिक विक्षिप्तता की हालत में ड्राइविंग करने से बहुत सारे रोड एक्सीडेंट प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान ले रहे हैं। क्या ऐसे लोगों के मानसिक इलाज की जरूरत नहीं है?


साइकियाट्रिस्ट और दवाओं की अपनी अहमियत है किंतु भारतीय संस्कृति की दृष्टि मन के संबंध में अद्भुत और अनूठी है-


"मन एवं मनुष्यानाम् कारणं बंध-मोक्षयो:"


अर्थात् मन मनुष्य को बंधन में भी डालता है और मुक्ति भी प्रदान करता है। सदैव अपनी मर्जी से चलाने की जिद करो तो मन नरक की सृष्टि कर देता है और परमात्मा की मर्जी के अनुसार मन को चलने दो तो स्वर्ग निर्मित हो जाता है। अतः इस मन को परमात्मा को समर्पित कर दो। अपने मन के अनुसार हो तो "अच्छा"(good) और मन के अनुसार नहीं हो तो "बहुत अच्छा" (very good)क्योंकि वह परमात्मा के अनुसार हो रहा है।


एक अकेला मन अस्तित्व में किस-किस से और कितनों से लड़ सकता है। लड़ने में तो उसे टूटना ही है। अतः लड़ाई छोड़ कर सब कुछ परमात्मा की इच्छा पर छोड़ दो।


बाबूजी हमेशा बोला करते थे- "जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए"। पढ़े लिखे तो थे नहीं किंतु चेहरे पर हमेशा अमन (शांति)की झलक मिलती थी जबकि परिस्थितियां बहुत प्रतिकूल थीं। सीक्रेट इतना ही था कि हमेशा उस राम के स्मरण में रहते थे जिन्होंने राज्याभिषेक की खबर और वनगमन की खबर को एक समान भाव से शांति से ग्रहण कर लिया।


हमारी पीढ़ी ज्यादा पढ़ी-लिखी और ज्यादा संपन्न है किंतु पुरानी पीढ़ी वाली शांति और प्रेम नहीं है। काफी खोजबीन की तो पाया कि किसानी वाली पुरानी पीढ़ी खेतों में काफी मेहनत करती थी किंतु बीज बोने के बाद बारिश के इंतजार में आकाश की तरह आंखें उठाए परमात्मा पर सब कुछ छोड़ देती थी। उनका दर्शन था-


तंतु प्रेरित गात्र हो तुम , एक पुतले मात्र हो तुम


इस जगत की नाटिका के क्षणिक भंगुर पात्र हो तुम।।


‌ इस अल्पकालिक जीवन के नाटक में जो भी भूमिका मिली है,उसका निर्वाह करो। इससे ज्यादा तुम्हारे वश में कुछ नही।


जीवन रूपी नौका को इस अस्तित्व रूपी महासागर में आगे बढ़ाने के लिए "पतवार" भी है और "पाल" भी है। जिनको अपने हाथों पर ज्यादा भरोसा होता है,वे पतवार उठा लेते हैं। किंतु समुद्र की लहरों के सामने पतवार की कितनी हैसियत है? कितनी भी पतवार चलाओ नाव तो उधर ही जाएगी , जिधर की लहर है। अतः विवेक कहता है कि पाल खोल दो, परमात्मा की हवाएं जिधर बहाकर ले जाए, उधर ही बह चलो।


मनोरोगी या मेंटल होने से बचने का तो यही उपाय दिखता है कि जब तक और जहां तक अपना वश चले पतवार चलाओ किंतु अपना वश नहीं चले तो पाल खोल दो;


होईंहे वही जो राम रचि राखा


क्यों करि तर्क बढ़ावहीं साखा।।


"मेंटल हेल्थ प्रभारी"HDJGGC


डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹