संवाद


"डिग्री और योग्यता के बीच की बढ़ती दूरियां"


15 अक्टूबर को UNO ने "विश्व विद्यार्थी दिवस" के रूप में मनाने का इसलिए निर्णय लिया कि इस दिवस को जन्मे "भारत रत्न" कलाम साहब का संपूर्ण जीवन विद्या और विद्यार्थी की आराधना में व्यतीत हुआ। विद्या के प्रति अनुराग उनका बचपन से ही इतना था कि एक छोटे से गांव से निकलकर भारत ही नहीं बल्कि विश्व के प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचे, विद्यार्थियों के प्रति अनुराग के कारण उन्होंने राष्ट्रपति भवन को शिक्षा भवन में तब्दील कर दिया और अपनी अंतिम सांस भी एक शिक्षा संस्थान में व्याख्यान देते हुए ली।


प्यास गहरी और सच्ची हो तो व्यक्ति पानी की खोज में कहीं भी पहुंच सकता है। प्यास नहीं हो तो गंगा के किनारे भी वह न अंजुलि भरेगा और न पानी लेने के लिए झुकेगा।


जनजातीय क्षेत्र बांसवाड़ा के विद्यार्थियों के बारे में जब मैं विचार करता हूं तो ऐसा लगता है कि प्यास की भारी कमी है। सरकार ने दूरदराज के इलाकों में भी स्कूल से लेकर कॉलेज तक खोल दिया है और अब तो ggtu (विश्वविद्यालय) भी आ चुका है जो स्वर्ण-पदक प्रदान करने का कार्यक्रम बहुत बड़े स्तर पर आयोजित करता है। लाखों विद्यार्थियों को प्रतिवर्ष डिग्रियां दी जा रही हैं।


लेकिन उनकी योग्यता और क्षमता पर भारी प्रश्न उठ रहा है। ऐसा क्यों है?-इस प्रश्न पर गहराई से विचार करने में ही "विश्व विद्यार्थी दिवस" की सार्थकता है।


विद्यार्थियों के साथ 25 वर्षों के सतत संवाद के अनुभव के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि प्यास के कारण एकलव्य ने गुरु की मूर्ति से भी धनुर्विद्या सीख ली, उसी धरती पर आज के एकलव्यों के पास पुस्तकीय-विद्या के लिए वह प्यास नहीं है।


इसका प्रमाण यह है कि पढ़ने के लिए क्लासेज में उनकी उपस्थिति अत्यंत अल्प और अनियमित है। दूसरा पासबुक रूपी नौका में बैठकर वे उच्चशिक्षा के ज्ञान रूपी सागर से पार होना चाहते हैं। तभी तो इस क्षेत्र में मौलिक पुस्तकों की संस्कृति का अभाव होता जा रहा है और पासबुक की विकृति बढ़ती जा रही है। पासबुक भी परीक्षा के नजदीक आने पर खरीदने की मानसिकता बढ़ती जा रही है। कुछ विद्यार्थी जो पढ़ने वाले हैं, उनमें भी स्वाध्याय की प्रवृत्ति बहुत कम हैं। पढ़ने के नाम पर ट्यूशन या कोचिंग की वृत्ति चरम पर है।


अधिकतर विद्यार्थियों द्वारा लिखे किसी भी आवेदन पत्र में अशुद्धियों की संख्या बता देगी कि इनकी स्कूली शिक्षा स्तरीय नहीं रही है और उनकी अभिव्यक्ति यह सूचना दे देगी कि उच्च शिक्षा की डिग्री और योग्यता में कितना भारी अंतर है।


आधुनिक तकनीकी ज्ञान के विकास हेतु इस क्षेत्र में करोड़ों के बजट से खोला गया इंजीनियरिंग कॉलेज पढ़ने की ललक और प्यास की कमी के कारण आज अत्यंत दयनीय दशा में है। करोड़ों के बजट से खोले जा रहे वेद विद्यापीठ की सफलता भी इस बात पर निर्भर करेगी कि परंपरागत वैदिक ज्ञान की शिक्षा के लिए विद्यार्थियों में प्यास और ललक है कि नहीं।


ब्रिटिश काल से ही शिक्षा के लिए जितने भी आयोग बनाए गए थे, सबने स्कूली शिक्षा सबके लिए अनिवार्य बताया था किंतु मेधा संपन्न विद्यार्थियों के लिए ही उच्च शिक्षा के दरवाजे खोलने की अनुशंसा की थी। क्योंकि नींव मजबूत हो तभी उस पर भव्य इमारत खड़ी की जा सकती है।


लेकिन आज हम बिना नींव के इमारतें ही खड़ी नहीं कर रहे हैं बल्कि उस पर स्वर्ण-कलश भी लगा दे रहे हैं। आखिर परिणाम क्या निकल रहा है?


शिक्षित बेरोजगारों की संख्या करोड़ों में पहुंच रही हैं और छोटे पद के लिए भी पीएचडी धारक लोगों के आवेदन सैकड़ों की संख्या में आ रहे हैं।


ऐसे में एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि "बिना पढ़े लिखे लोगों में बेरोजगारी 0% है". अर्थात् आज की शिक्षा व्यवस्था में जो कदम नहीं रख रहा है,वह आजीविका पाने के रास्ते पर जल्दी कदम बढ़ा लेता है। अनपढ़ किसी भी हुनर को सीखकर सिर्फ अपना परिवार ही नहीं चला रहा है बल्कि कई प्रकार के दुर्गुणों से बच भी जा रहा है। दूसरी तरफ कागज की डिग्री लिए हुए तथाकथित पढ़े लिखे विद्यार्थियों का जीवन धोबी के कुत्ते के समान होता जा रहा है जो न घर का रहता है और न घाट का -


"ये नजारे अजीब है, हालात बदनसीब है


वे कहीं के न रहे,घाट और घर करीब है।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


विश्व विद्यार्थी दिवस की शुभकामना🙏🌹