संवाद


"आंतरिक-लोकतंत्र को ढूंढता भारतीय-लोकतंत्र"


"आंतरिक लोकतंत्र कितनी पार्टियों में है?" - आजादी के 75 वर्षों के बाद अमृत महोत्सव के दौरान आज यह सबसे बड़ी चर्चा का विषय है। चर्चा का विषय यह होना चाहिए था कि- "लोकतांत्रिक-मन के निर्माण में हम कितने परिपक्व हुए हैं?"


यदि लोकतांत्रिक-मन का निर्माण हुआ होता तो बिलकिस के बलात्कारियों की रिहाई पर और उन्हें माला पहनाने, सम्मानित करने और संस्कारी बताए जाने पर हर पार्टी के भीतर से बहुत आवाजें आतीं। किंतु जाति,धर्म के आधार पर कुछ पार्टियां भी चुप हैं और उन पार्टियों के सदस्य भी। आत्मा को मानने वाला भारत अंतरात्मा की आवाज उठाने से क्यों डरने लगा?


लोकतांत्रिक-मन का दर्शन स्वतंत्रता-पूर्व के कांग्रेस के अधिवेशन में अच्छी प्रकार से दिखाई देता था। किसी विषय पर पटेल नेहरू से सहमत नहीं होते थे , नेहरू सुभाष से सहमत नहीं दिखते थे और सबसे बड़ी आश्चर्य की बात कि नेहरू गांधीजी से भी अलग मत महात्मा की इजाजत से ही सार्वजनिक मंचों पर रखते थे। नेहरू जी ने तो गांधी जी को "आश्चर्यजनक विरोधाभास" कहा था।फिर भी सभी एक दूसरे के प्रति गहरे आदर और प्रेम से भरे हुए थे तथा कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में तथा सफल बनाने में मिलजुल कर योगदान करते थे। खुले मतभेदों के बावजूद सबके मन में भारत की स्वतंत्रता का बसा हुआ लक्ष्य उन्हें एकजुट रखता था।


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद धीरे-धीरे यह लोकतांत्रिक-मन कमजोर होने लगा और किसी विषय पर खुलकर पार्टी-मत से अलग मत रखने की प्रक्रिया लुप्त होती चली गई। इसके साथ लुप्त होता चला गया किसी विषय की गहरी समझ और उसके विभिन्न आयामों से उसकी जांच-परख की बौद्धिकता।


समस्या की गहरी समझ और उसके समाधान के अलग-अलग रास्ते जमीनी जुड़ाव के साथ गहरे चिंतन-मनन के बाद आते हैं।आज जमीनी जुड़ाव का और गहरे चिंतन-मनन का अभाव होने के कारण पार्टियों में आंतरिक-लोकतंत्र खत्म होता जा रहा है। इसी कारण से चर्चा का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है। डिबेट्स में व्यक्तिगत-आक्षेप और शीर्ष नेतृत्व की स्तुति के अलावा सार्वजनिक समस्याओं पर अलग-अलग समाधान सुनने को नहीं मिलते हैं।


किंतु खड़गे जी के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने से और शशि थरूर जी द्वारा अच्छे मत हासिल करने से "पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र" के मुद्दे को नई जान मिल गई है। इसके कारण दूसरी पार्टियों में आंतरिक-लोकतंत्र के लिए मांग उठेगी और जमीन से जुड़े होने की तथा समस्या के गहरे चिंतन-मनन की प्रक्रिया मजबूत होगी।


राजनीति को गंदा धंधा कह कर मुंह मोड़ लेने की प्रवृत्ति से हमारा लोकतंत्र कमजोर होता चला जाएगा। अच्छे लोगों ने राजनीति से मुंह मोड़ कर बुरे लोगों के लिए जगह खाली कर दी। अच्छे लोगों का यही तर्क रहता है जो मंथरा ने रानी कैकई को दिया था-


"कोउ होइहें नृप हमें का हानि,


चेरी छोड़ ना होयब रानी।।"


अर्थात् राम राजा हों या भरत; मैं तो दासी ही रहूंगी,रानी कभी नहीं बनूंगी। अत: हे रानी कैकई!मैं आपको राम के विरुद्ध भड़का नहीं रही हूं बल्कि आपको अपने बेटे भरत के लिए अधिकार मांगने हेतु जगा रही हूं।


राजतंत्र में राजनीति-निरपेक्ष होने से भले ही कोई अंतर नहीं पड़ता हो किंतु लोकतंत्र में तो एक मत से भारत की अटल सरकार गिर जाती है। अत: केवल पार्टी के नेता को ही नहीं बल्कि हर नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अच्छी प्रकार से समझना चाहिए तथा इसमें गहरी रुचि दिखानी चाहिए। क्योंकि यह राजनीति हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रही है। धार्मिक वृत्ति के गांधी यदि राजनीति में नहीं उतरते तो क्या राजनीति सत्य-प्रेम-अहिंसा के रास्ते की ओर उन्मुख होती?


राजनीतिक दलों में आंतरिक-लोकतंत्र अंततः भारत के लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा। किंतु लोकतांत्रिक-मन के निर्माण के बिना यह आंतरिक-लोकतंत्र नहीं आ सकता। लोकतांत्रिक-मन के निर्माण की कला हमें अपने महापुरुषों से (गांधी,अंबेडकर,नेहरू,पटेल सुभाष जैसों से) सीखनी होगी कि कैसे वे एक विषय पर अलग-अलग मत रखते हुए भी देश की स्वतंत्रता के लिए एक-मन के साथ आगे बढ़ रहे थे।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹