सत्यानुसारणी लक्ष्मी:???
October 22, 2022संवाद
"सत्यानुसारणी लक्ष्मी:???"
"लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती है" -भारतीय संस्कृति की इस ऋषि-दृष्टि को आज स्वीकार करना मुश्किल है। क्योंकि बेशुमार धन दौलत कमाने वाले प्राय:अनैतिक और भ्रष्ट तरीकों में लिप्त पाए जाते हैं। यह आम धारणा बन चुकी है कि सत्य और ईमानदारी से गुजारा लायक ही धन कमाया जा सकता है, असीमित धन नहीं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है -
"नित्य बदलती दुनिया में मानव तू कितना धन कमाएगा?
कितनी भी दौलत जुटा मगर तू खाली हाथ ही जाएगा।।"
सर्वे रिपोर्ट कहती है कि काले धन और बेनामी संपत्तियों के बल पर आज की राजनीतिक पार्टियां चलाई जा रही हैं और फिर वे ही सत्ता में आकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ने का दावा करती हैं। यही कारण है कि चुनाव में करोड़पति उम्मीदवारों की संख्या में भारी वृद्धि होती जा रही हैं।
भर्तृहरि का प्रसिद्ध कथन है- "सर्वे गुणा:कांचनमाश्रयन्ति" अर्थात् धनी व्यक्ति में लोगों को सारे गुण दिखाई देने लगते हैं-
"जिसके घर में अमीरी का शजर होता है
उसका ऐब भी जमाने में हुनर होता है।।"
तो क्या यह मान लिया जाए कि "सत्यानुसारणी लक्ष्मी:" की दृष्टि में कोई दम नहीं है।
जीवन का अनुभव और सूक्ष्म-दृष्टि कहती है कि लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती है। किंतु यह समझना पड़ेगा कि लक्ष्मी का अर्थ सिर्फ "धन-संपत्ति" ही नहीं है बल्कि भारतीय दृष्टि में "शोभा-समृद्धि" भी है।
जिन्होंने लक्ष्मी का अर्थ सिर्फ "धन-संपत्ति" तक में संकुचित कर दिया है, उन्होंने महात्मा बुद्ध के "सम्यक-आजीविका" के ढंग को ठुकरा कर असम्यक-उपायों से निश्चित ही रुपयों-पैसों के अंबार लगा दिए, आलीशान महल खड़े कर दिए और पद-प्रतिष्ठा भी खरीद लिए। किंतु ऐसे अमीरों की भीतरी गरीबी दिखाई नहीं देती। धन को कमाने में और धन को बचाने में कोई जेल चला जाता है तो कोई अपने को गिरवी रख आता है। बाहरी चकाचौंध की दुनिया में जीने वाले ऐसे लोगों के अंदर का अंधेरा कितना घना होता है-इसका पता धनिकों के अंदर के चल रहे अनिद्रा बेचैनी रुपी नरक को देखने से चलेगा।
क्रांतदर्शी ऋषियों की दृष्टि में लक्ष्मी का "शोभा-समृद्धि" वाला अर्थ ज्यादा प्रमुख है। सत्य के रास्ते पर चलकर भी लोगों ने लक्ष्मी अर्जित की हैं, ऐसे लोगों के लिए हमारी संस्कृति में "श्रेष्ठी" शब्द प्रयुक्त हुआ था जो 'श्रेष्ठ' से बना है जिसका आजकल अपभ्रंश 'सेठ' है। किंतु सेठ में वह गौरव-गरिमा नहीं है जो "श्रेष्ठी" शब्द में हैं क्योंकि ऐसे श्रेष्ठी लोग ही सत्य के रास्ते से कमाए गए अपने धन को शिक्षा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगाते थे। आज बिरला का बिट्स पिलानी और अजीम प्रेमजी का शिक्षा संस्थान इसके जीते जागते उदाहरण हैं।
सत्य के अनुसरण से जो लक्ष्मी आती हैं, वे ही नर को नारायण बनाती है। अर्थात् "ऐश्वर्य से पूर्ण-पुरुष" जिसकी लक्ष्मी जी चरण दबाती हैं -because (money is a good servant but terrible master)और जो जीवन रूपी सागर में उठ रहे तूफानों के बीच भी शांत और आनंदित है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
शुभ धनतेरस शुभ लक्ष्मी 🙏🌹