अंधी-आस्था पर ग्रहण कब लगेगा?
October 25, 2022संवाद
"अंधी-आस्था पर ग्रहण कब लगेगा?"
बलात्कार व हत्या के जुर्म की सजा काट रहे बाबा द्वारा फरलो पर छूटकर ऑनलाइन प्रवचन की खबरें सुनकर तथा उसको सुनने वाले लोगों की संख्या और उसके प्रति आस्था को देखकर आंखों को विश्वास नहीं हो रहा। जनप्रतिनिधियों की भक्ति तो गुरु के प्रति अवर्णनीय है।
किंतु आस्था की ऐसी अविश्वसनीय घटना को घटता हुआ देखकर मन में कई प्रकार के प्रश्न उठने लगे हैं। क्या एक नई सामाजिक-चेतना का निर्माण हो रहा है जिसमें बलात्कारी को संस्कारी के रूप में प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया चल रही है या राजनीतिक सत्ता और धार्मिक सत्ता मिलकर सामाजिक-चेतना को पंगु बना रही है?
पुराने जमाने में आटे में नमक के बराबर संदिग्ध चरित्र के लोग समाज में एडजस्ट हो जाते थे किंतु उन्हें सुदृढ़ समाज के सामने सर झुकाकर रहना पड़ता था। नए जमाने में तो व्यभिचारियों की प्राण-प्रतिष्ठा की जा रही है।
चूंकि इसी समाज में बेटे-बेटियां बड़े होते हैं तो एक स्वाभाविक चिंता बनी रहती है कि समाज सद्गुणों को प्रोत्साहित करे और दुर्गुणों को हतोत्साहित करे। लेकिन जब से राजनीतिक सत्ता ने अपराधी-प्रवृत्ति को संरक्षण देना शुरू किया और उसे पद-प्रतिष्ठा से नवाजना प्रारंभ किया तब से समाज के सामने में एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई।
समाज दबाव बनाकर सरकार से जो हित साधना चाहता है उसमें ऐसे अपराधिक प्रवृत्ति के लोग बहुत उपयोगी साबित होने लगे। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर वे न सिर्फ समाज की छाती पर चढ़ बैठे बल्कि एक नए सामाजिक चेतना का निर्माण भी करने लगे। दबंग समर्थकों के सहारे समाज पर उन्होंने पकड़ ऐसी बनाई कि नैतिक-अनैतिक की जगह अब मुख्य मुद्दा हो गया हित-अहित का। अपने समाज के हित के लिए कोई गलत मांगे भी उठाए और उसे सरकार से मनवा ले तो वह समाज के लिए सर्वेसर्वा बन गया।
ऐसी स्थिति में नैतिक-अनैतिक के मुद्दे के लिए एकमात्र आश्रय-स्थली धार्मिक-सत्ता रह गयी थी। पाप-पुण्य और शुभ-अशुभ का ख्याल तो हर एक की अंतरात्मा में गूंजता ही रहता है। अतः धर्म सभाओं में इनके बारे में सुनकर लगता था कि धर्म कुछ बचा हुआ है।
लेकिन जब धार्मिक सत्ता ही पाप और अशुभ में खुलेआम लिप्त हो जाए और उसे सामाजिक स्वीकृति भी मिल जाए तो चरित्र की प्रेरणा के लिए कोई आधार नहीं बचता।
ऐसी बात नहीं है कि समाज में अच्छे लोग नहीं है। जिस दिन सभी बुरे हो जाएंगे उस दिन समाज एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। किंतु राजनीतिक सत्ता और धार्मिक सत्ता ने सांठगांठ करके समाज के अच्छे लोगों को हाशिए पर धकेल दिया है। समाज के अच्छे लोग तटस्थ बने हुए हैं और किसी भी प्रकार के संघर्ष से बचना चाहते हैं। इसका फायदा उठाकर सक्रिय और संघर्षशील बुरे लोग दिनों दिन शक्तिशाली बनते जा रहे हैं।
नई पीढ़ी को संदेश यह जा रहा है कि येन-केन-प्रकारेण राजनीतिक सत्ता या धार्मिक सत्ता प्राप्त करो, नहीं तो अस्तित्व मिट जाएगा। अपने अस्तित्व की खोज में समाज के कम योग्यता वाले लोग राजनीतिक सत्ता और धार्मिक सत्ता के अनुयायी बन कर अपना थोड़ा बहुत वजूद बना रहे हैं। इसके कारण अच्छे लोगों की संख्या और शक्ति दिनोंदिन और घटती जा रही है।
अच्छे लोगों में से कोई बुराई के विरोध करने का हिम्मत भी करे तो वह अपने आप को अलग-थलग पाता है-
"देखा,सच बोलने का फायदा
तू जिधर है,उधर कोई भी नहीं।"
नई पीढ़ी को समझ में नहीं आ रहा है कि "क्योंकर एक तरफ किताबों में इतने नैतिक मूल्य पढ़ाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक जीवन में जहां भी देखो अनैतिकता शीर्ष पर बैठती जा रही है?"
इससे एक तरफ अधिकांश-व्यक्तित्व पाखंडी बनता जा रहा है तो दूसरी तरफ सच्चा-व्यक्तित्व घुट घुट कर जीने को मजबूर होता जा रहा है। भारतीय संस्कृति का उद्घोष है- "सत्येन रक्ष्यते धर्मो" अर्थात् सत्य से धर्म की रक्षा होती है। किंतु डेरा सच्चा सौदा के बारे में सत्य बोलकर एक पत्रकार सहित कई लोग अपनी जान गवां चुके हैं,फिर भी धर्म की रक्षा कहां हुई?
धर्म का मुखौटा पहनकर अधर्म जब ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है और सब कुछ जान कर भी अंधी आस्था वाले लोग उसके प्रति समर्पित बने रहते हैं तो व्यवस्था अन्यायी और जीवन घुटन भरा हो जाता है। हालात को देखकर अच्छे लोगों का इस व्यवस्था से ही नहीं बल्कि इस जीवन से भी आस्था उठती जा रही है-
"सब कुछ जानकर भी सर झुकाते हैं,
क्या इसी को हम आस्था पुकारते हैं?"
दूरदर्शी और संवेदनशील लोगों का आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि "इस अंधी-आस्था पर ग्रहण कब और कैसे लगेगा?"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹