संवाद


"मूल न पूछो ऋषि का"


भारतीय मूल के ऋषि सुनक का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनना भारत के लिए एक तरफ गर्व का विषय है तो दूसरी तरफ मेरी दृष्टि में आत्मावलोकन का विषय भी है। गर्व का विषय इसलिए है कि जिस ब्रिटिश जाति ने हम पर 200 वर्षों तक शासन किया और जो भारत को 'The white man's burden' की दृष्टि से देखती थी,वह ब्रिटिश जाति अपने सबसे मुश्किल आर्थिक संकट के दौर में चमड़ी का रंग भूलकर एक प्रतिभा पर विश्वास जता रही है। यह आत्मावलोकन का विषय भी इसलिए है कि भारतीय प्रतिभाएं भारत से पलायन कर जाती हैं और विदेशों में जाकर शिखर को भी छू लेती हैं। दादाभाई नौरोजी ने "Drain of wealth" का सिद्धांत दिया था कि कैसे भारत के धन को ब्रिटिश ब्रिटेन की ओर बहा रहे हैं, आज जरूरत है "Drain of brain" सिद्धांत दिए जाने की, जिसमें यह बताया जाए कि 'कैसे भारत स्वयं अपनी प्रतिभाओं को विदेशों में बहा रहा है।'


ज्ञान और त्याग प्रधान संस्कृति वाला भारत यदि अज्ञानपरक और भोगपरक दृष्टि की ओर नहीं गया होता तो हमारी शिक्षा-व्यवस्था इतनी बदहाल नहीं होती और राजनीतिक-व्यवस्था इतनी भ्रष्ट नहीं होती। भारत सरकार द्वारा एडवाइजरी जारी करने के बावजूद भी यूक्रेन से भारतीय प्रतिभा बिना डिग्री लिए वापस लौटने को तैयार नहीं है जबकि स्पष्ट रूप से जान को खतरा है। लगभग 15 से 20लाख भारतीय प्रतिभाएं विदेशों में पढ़ने जाती हैं और अधिकांश वहीं पर बस जाती हैं क्योंकि उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा के साथ योग्यता-अनुकूल काम की गारंटी मिलती हैं।


भारत का मूल उद्घोष कबीर के शब्दों में यह था कि-


"जाति न पूछो साधु की , पूछ लीजिए ज्ञान


मोल करो तलवार का , पड़ा रहन दो म्यान।"


इस मूलमंत्र को अपनाकर अमेरिका सबसे नया राष्ट्र होने के बावजूद विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बन गया। अमेरिका ने प्रतिभाओं के लिए अपने दिल और दिमाग के दरवाजे खोल दिए, तभी तो भारतीय मूल की कमला हैरिस वहां उपराष्ट्रपति बन जाती हैं। उनके भारतीय मूल का होने पर भारत सिर्फ गर्व करने का काम करता है और जाति-धर्म के नाम पर राजनीति कर भारत की प्रतिभा को कुंठित कर विदेशों में जाने को मजबूर करता है।


जब विश्व के विकसित देश यह सोच रहे हैं कि कौन-कौन से नए विषय शिक्षा-व्यवस्था में जोड़े जाएं ताकि आज की समस्याओं का समाधान मिल सके, तब भारत इस बात पर माथापच्ची कर रहा है कि भारतीय मुद्रा पर किसकी तस्वीर छापी जाए और किसकी नहीं। भारत के स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाए जाने वाले परंपरागत विषयों के भी शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं और जो शिक्षक उपलब्ध हैं उनसे गैर-शैक्षिक काम ज्यादा लिए जा रहे हैं।


अपनी उत्कृष्ट शिक्षा-व्यवस्था और ज्ञान की प्यास के कारण भारत विश्वगुरु बना था। उस समय लिंग,जाति,धर्म,क्षेत्र के आधार पर प्रतिभा को दरकिनार नहीं किया जाता था। "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" अर्थात् ब्रह्म को जानकर ही कोई अपने ज्ञान के बल पर ब्राह्मण होता था।शिक्षा व्यवस्था का ध्यान सिर्फ प्रतिभा के बीज को पहचानने और उसे वृक्ष बनाने पर था-


"वतन की माटी उर्वर है लेकिन


चमन का माली कहीं खो गया है।"


प्रतिभा को खोजने और अपनी ओर खींचने की इसी खूबी के कारण ही अमेरिका जैसा देश कमला हैरिस को अपना उपराष्ट्रपति बना देता है और ब्रिटेन जैसा देश ऋषि को अपना प्रधानमंत्री। भारतीय मूल के होने के बावजूद इन प्रतिभाओं की निष्ठा भी सबसे पहले उस राष्ट्र के प्रति होती हैं जिसने इनकी प्रतिभा को विकसित होने का मौका दिया है और उसे उचित मान-सम्मान दिया है। अपनी इसी राष्ट्र-निष्ठा और प्रतिभा के कारण भारतीय मूल के लोग अनेक देशों में जाकर उनके शीर्ष पदों को सुशोभित कर रहे हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹