संवाद


"एकता का मूर्तरूप"


राष्ट्रीय एकता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक तरफ जाति,धर्म(पंथ) के संकीर्ण आधारों पर जो राजनेता सत्ता को प्राप्त करना चाहते हैं, वे ही राजनेता दूसरी तरफ राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की बात भी करते हैं। "फूट डालो,राज करो" की जिस नीति का अंग्रेजों ने उपयोग किया, उसी नीति का उपयोग यदि भारतीय राजनीति भी करे तो ब्रिटिश-नीति और भारतीय-नीति में अंतर कहां रहा?


"हेट स्पीच" पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का प्रमाण है कि सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक मंचों से सार्वजनिक नेतृत्व द्वारा जो जहर उगले जा रहे हैं उससे "एकता की अमृत" की प्राप्ति नहीं हो सकती।


राष्ट्रीय एकता के लिए "गर्व से कहो हम भारतीय हैं" के आग्रह को मजबूत करना होगा।किंतु एक तरफ हम धार्मिक प्रतीकों को चुनावी मुद्दा बनाते जा रहे हैं और दूसरी तरफ राष्ट्रीय एकता के नारे भी बुलंद करते जा रहे हैं।


सरदार पटेल ने रियासतों के राजाओं को अपना स्वार्थ छोड़ने के लिए बाध्य किया तब 550 से अधिक रियासतों का भारत में विलय संभव हुआ। यह असंभव सा काम संभव हुआ क्योंकि लौह पुरुष मराठी-मानुष या गुजराती-मानुष, हिंदू-मानुष या मुस्लिम-मानुष के विचार को लेकर आगे नहीं बढ़ रहे थे। उनके दिलो-दिमाग में सिर्फ भारतीय-मानुष का विचार था। किंतु यह तत्कालीन परिस्थितियों में शक्ति के बल पर किया गया राजनीतिक-एकीकरण था।


सरदार के द्वारा किए गए राजनीतिक-एकीकरण को भावनात्मक-एकीकरण में तब्दील कर देने की हम सबकी जिम्मेवारी थी। क्या आजादी के इस अमृत महोत्सव काल में राष्ट्र की भावनात्मक एकता को हमने सुदृढ़ कर लिया हैं? क्या हमारा नेतृत्व अपने मन-वचन-कर्म से भारत को जोड़ने के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है? क्या हम लिंग,जाति,धर्म,क्षेत्र,भाषा के अपने पिंजरे से मुक्त होकर भारत के खुले आकाश में एक साथ उड़ने को तैयार हैं?


यदि "हां" तो निश्चित ही हम एकता की सबसे ऊंची प्रतिमा 'statue of unity' ही नहीं बना रहे हैं बल्कि सरदार पटेल के राष्ट्रीय एकता के सपने को भी साकार कर रहे हैं।


यदि "नहीं" तो निश्चित ही हम ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल के उस बयान को सही साबित करने के रास्ते की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत को आजादी दे देने पर भी वह इसे बचा नहीं पाएगा क्योंकि भारतीय एक दूसरे से लड़कर भारत को टुकड़ों- टुकड़ों में बांट देंगे।


एक तरफ भारतीय मूल के ऋषि सुनक अपने संकटमोचक व्यक्तित्व के बल पर ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बन गये हैं जिससे भारत की आजादी के अमृत महोत्सव में चार चांद लग रहा है तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे सनकी भारतीय भी हैं जो जहर बांटने का काम कर भारत के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहे हैं।


विभाजनकारी प्रवृत्ति को नेस्तनाबूद करने के कारण ही श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत भी राष्ट्रीय एकता दिवस के दिन ही हुई थी।


महापुरुषों की मूर्ति बनाने से भी बड़ी श्रद्धांजलि होती है उनके आदर्शों को मूर्तरूप देने से। लौह पुरुष और आयरन लेडी की आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब राष्ट्रीय एकता के उनके सपनों को हम साकार करें -


"मूर्ति तो लोग महापुरुषों की खूब बना लेते हैं,


किंतु उनके सपनों को मूर्तरूप विरले ही देते हैं।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


राष्ट्रीय एकता दिवस की शुभकामना🙏🌹