श्रद्धांजलि और प्रार्थना


"विश्वास और संदेह के बीच झूलता जीवन"


विश्वास-स्वरूपम् भगवान शिव की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा को देखकर तथा संत मुरारी बापू के मुखारविंद से उनकी महिमा को सुनकर हृदय विश्वास से भरता जा रहा था कि अचानक मोरबी पुल हादसे से मन संदेह से भर गया। हंसते-खेलते मासूमों को लेकर अधिक से अधिक खुशियां बटोरने के विश्वास के साथ गए हुए परिवार झूलते पुल के टूट जाने से दर्दनाक मौत के शिकार हो गए। दिल दहलाने वाले उस दृश्य को देखकर संदेहग्रस्त चित्त यह पूछने लगता है कि कहां है व्यवस्था?और कहां है भगवान??


दिलोदिमाग में अंतर्द्वंद्व के तूफान उठने लगे। "कहां विश्वास किया जाए और कहां संदेह किया जाए?"-इस प्रश्न ने रात की नींद हराम कर दी। किसी कवि के शब्दों में-


क्या बतलाऊं अधिक निराशा या उर में विश्वास अधिक है?


क्या बतलाऊं इस जीवन में रुदन अधिक या हास अधिक है?


पूरब की संस्कृति मूलतः एक विश्वास-प्रधान संस्कृति रही है। भगवान पर विश्वास करने वाली जनता ने अपने नेताओं पर भी आंख मूंदकर विश्वास किया ; परिणाम सामने है। विश्वास की अति ने अंधविश्वास को जन्म दे दिया। धर्म ने विश्वास करना सिखाया था, वह विश्वास भारतीयों के रोम-रोम में बस गया। फलत: भारत संदेह करना भूल गया और प्रश्न उठाना छोड़ दिया।


इसके विपरीत पश्चिम की संस्कृति संदेह-प्रधान रही। संदेह करने से और प्रश्न उठाने से विज्ञान का जन्म हुआ। विज्ञान ने जगत को अनेक आविष्कारों से भर दिया और आश्चर्यचकित कर दिया। किंतु संदेह करने की आदत के कारण पदार्थ पर संदेह करते-करते परमात्मा पर भी संदेह उत्पन्न होने लगा। जिसके कारण नास्तिकता ने जन्म ले लिया। पश्चिम किसी पर भी विश्वास करने की कला भूल गया।


तत्त्वदर्शी कहते हैं कि विश्वास भी जीवन के लिए जरूरी है और संदेह भी। जिस प्रकार सागर में पड़ी नौका बिना दो पतवार के आगे नहीं बढ़ सकती, उसी प्रकार विश्वास और संदेह दोनों के बिना यह जीवन भी भवसागर को पार नहीं कर सकता।


व्यवस्था पर और पदार्थ पर संदेह करना ही होगा और प्रश्न उठाना ही होगा। आखिर पुल में ऐसी क्या कमी रह गई जिसके कारण इतना बड़ा हादसा हो गया? व्यवस्था ने कहां लापरवाही बरती कि चारों तरफ मातम पसर गया? कहीं उद्घाटन करते ही पुल टूट जाता है और कहीं पुल पर बिना परमिशन और उद्घाटन के टिकट काटकर लोगों को जमा कर लिया जाता है ; इसमें भ्रष्टाचार और लापरवाही दोनों स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।


इस दुर्घटना ने सब को तोड़ कर रख दिया है। लेकिन टूटे हुए मन से कोई खड़ा नहीं होता। जिंदगी कहीं पर भी रुकना नहीं जानती। इस हृदय विदारक दुर्घटना से टूट चुके लोगों के लिए विश्वास-स्वरूपम् शिव ही एकमात्र सहारा बचते हैं।


मृत-आत्माओं के प्रति श्रद्धांजलि


टूट चुके परिवारों के लिए विश्वास-स्वरूपम् शिव से प्रार्थना


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹