हार्दिक-स्मारक को और भव्य बनाने का वक्त
November 6, 2022संवाद
"हार्दिक-स्मारक को और भव्य बनाने का वक्त"
पीएम द्वारा मानगढ़-धाम को राष्ट्रीय-स्मारक घोषित नहीं किए जाने पर बहुत बड़ी आशा को निराशा मिली। किंतु मानगढ़-धाम का हार्दिक-स्मारक होना इतनी बड़ी गौरव-गरिमा की बात है कि अन्य सब बातें गौण हो जाती हैं। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में-
महलों में गरुड़ न होता है,
कंचन पर कभी न सोता है।
सरकारी स्वीकृति के रास्ते बड़े टेढ़े-मेढ़े होते हैं,हार्दिक स्वीकृति के रास्ते सीधे-सरल। सादा-सरल गोविंद गुरु का व्यक्तित्व नजदीक आने वाले सभी व्यक्तियों के दिलों में सीधा रास्ता बना लिया। 17 नवंबर 1913 को हजारों गुरुभक्त आदिवासियों ने ब्रिटिश-राज के अन्याय के विरुद्ध मानगढ़ की पहाड़ियों पर संघर्ष करते हुए अपनी शहादत दी जिसने देशभक्ति के जज्बे को दूर-दराज तक कई गुना बढ़ा दिया। इसे कुछ लोग जालियांवाला बाग से भी पहले घटी और उससे भी बड़ी घटना मानते हैं जिसे इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिला।
गांधीजी की प्रखर वैचारिक प्रतिनिधि "इलाबेन भट्ट" का अभी निधन हुआ जिन्होंने "सेवा" नामक संस्था बनाकर 20लाख से अधिक महिलाओं के जीवन की दशा-दिशा बदल कर महिलाओं के रोजगार के लिए ऐसा अद्भुत काम किया कि गांधी की आत्मा उनके रूप में अभी तक हमारे बीच बनी रही। इसी प्रकार से गोविंद गुरु के प्रखर वैचारिक प्रतिनिधि बनकर उनकी आत्मा को साकार रूप में जिंदा रखना होगा। मेरा हृदय कहता है कि-
"वो तुझे जान भी लेगा और पहचान भी लेगा
मशाल की लौ को बढ़ा,वो तेरा नाम भी लेगा।"
100 से अधिक वर्षों के बाद भी गोविंद गुरु के वचन और जीवन अमिट छाप छोड़े हुए हैं। उनके त्याग-तपस्या की ज्योति को आज भी जलाए हुए लोग अंधेरों को बहुत बड़ी चुनौती दे रहे हैं। श्री गोविंद गुरु ने "संप सभा" के माध्यम से मेरी नजर में सबसे बड़ा संदेश यही दिया था कि बच्चों को पढ़ाओ और नशे से दूर रहो।
उनकी मशाल को उठाकर आगे बढ़ने वालों को यह ध्यान रखना होगा कि उनके संदेश की रोशनी कहीं मद्धिम तो नहीं पड़ रही। एक तरफ "श्री गोविंद गुरु राजकीय महाविद्यालय" और दूसरी तरफ "गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय" यह प्रमाण दे रहे हैं कि उनकी शिक्षा को अमलीजामा पहनाने के लिए बहुत बड़े संस्थान हमने उनके नाम पर बना दिए हैं। लेकिन इन संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का जीवन क्या बहुत बड़े लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है?
विद्यार्थियों को देखता हूं तो पासबुक की विकृति और ट्यूशन की प्रवृत्ति ने उनकी प्रतिभा रूपी फूल को खिलने के पहले ही कुम्हला दिया है ।मौलिक पुस्तकों की संस्कृति और स्वाध्याय की प्रवृत्ति के अभाव में वे गुणवत्ता के स्तर पर खरा नहीं उतरते।
जब विद्यार्थी क्लास में नहीं आएंगे, स्वाध्याय से और मौलिक पुस्तकों से दूर रहेंगे तो वे महापुरुषों की पुस्तकों को कहां से पढ़ेंगे? जब शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कामों में इतना व्यस्त कर दिया जाएगा कि उसे पाठ्यक्रम (सिलेबस) पूरा कराने का अवसर नहीं मिलेगा तो वह महापुरुषों के बारे में अतिरिक्त ज्ञान अपने विद्यार्थियों को कब और कैसे देगा?
महापुरुष जीवन के खिले हुए फूल होते हैं और उनके संदेश उनके जाने के बाद बीज रूप में हमारे पास सुरक्षित होते हैं। जब तक कोई किसी उपजाऊ मिट्टी में उन बीजों को नहीं बोएगा और उपवन बनाकर उनकी सुरक्षा नहीं करेगा, उनमें खाद-पानी नहीं डालेगा तब तक संदेश रूपी बीज बड़े नहीं हो सकते।
गोविंद गुरु के संदेश रूपी बीज को फूल बनाने के लिए शिक्षकों को अतिरिक्त समय और ऊर्जा लगानी होगी और विद्यार्थियों को भी ऐसे शिक्षकों के पास धूणी रमानी होगी।
गोविंद गुरु की धूणी और प्रतिमा पर लगने वाले श्रीफल के ढेर यह साबित करते हैं कि उनमें आस्था रखने वालों की संख्या बहुत बड़ी है।लोग उन्हें लोक देवता के रूप में पूज रहे हैं। लेकिन जब इन श्रद्धालुओं को मन्नते मांगते देखता हूं तो ऐसा लगता है कि उनकी उत्सुकता अपनी क्षुद्र-मनोकामनाओं की पूर्ति में ज्यादा है , गोविंद गुरु के विराट-जीवन-संदेशों को समझने में कम।
किसी इंसान को भगवान बना कर उसकी पूजा करने लगना बहुत आसान है लेकिन उसके बताए रास्ते पर कदम दर कदम आगे बढ़ाना बहुत मुश्किल। मानगढ़-धाम उन मुश्किल रास्तों की याद दिलाता है जिस पर गोविंद गुरु ने स्वयं चलकर दूसरों को चलने के लिए प्रेरित किया। इस हार्दिक- स्मारक को और भव्य बनाना होगा ताकि कई राष्ट्रीय-स्मारक इसकी ओर निहारने लगें।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
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