सिक्ख अर्थात् सीखने वाला
November 8, 2022संवाद
"सिक्ख अर्थात् सीखने वाला"
गुरु नानक द्वारा स्थापित किया गया सिक्ख धर्म अपने सीखने की और संघर्ष करने की प्रवृत्ति के कारण अनूठा धर्म है। गृहस्थ रहते हुए संन्यासी का जीवन जीने वाले गुरु नानक जी ने सृष्टि (संसार) और स्रष्टा (परमात्मा)में कोई भेद नहीं माना। गृहस्थ के रूप में अपने खेत में काम भी करते रहे और संन्यासी के रूप में अपने जीवन-सत्य को संसार में बांटते भी रहे।
पिता के कहने पर व्यापार में लाभ कमाने हेतु कंबल खरीदा किंतु उसे ठंड से ठिठुरते हुए साधुओं के बीच मुफ्त में बांटकर अपनी दृष्टि में परम-लाभ कमा कर लौट आए।
उनके द्वारा शुरू की गई लंगर- प्रथा ने तो महामारी के काल में सभी भेदभाव से ऊपर उठकर जो मानवता की सेवा की है, उससे पेट की भूख भी मिटी है और लोगों की आत्मा की भूख भी।
चार धर्मों ( हिंदू,बौद्ध,जैन,सिक्ख )को जन्म देने वाला भारत विश्व का एकमात्र देश है। इस देश का मूल संदेश यह है कि जिस प्रकार नदियां अपने-अपने रास्तों से चलकर सागर में गिरती हैं,उसी प्रकार से व्यक्ति अपने-अपने धर्म के रास्ते से चलकर परमात्मा को प्राप्त करता है -
"रुचीनां वैचित्र्यात् ऋजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसार्णवमिव।"
आज धर्म के नाम पर हो रहे विवादों के कारण जो धर्म समाधान देने में समर्थ हैं, वे ही समस्या बन गए हैं। धर्मों की विविधता वाला देश भारत यदि अनेकता में एकता की अपनी इस शक्ति को पहचानने में समर्थ हुआ तो एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो हर धर्म से बहुत कुछ सीख सकती हैं।
इसी सीखने की प्रवृत्ति पर सबसे ज्यादा जोर देने के कारण सिक्ख-धर्म मुझे बहुत प्रिय है।सीखने की उत्कट अभिलाषा और समय के अनुसार अपने आप को ढाल लेने की प्रवृत्ति के कारण गुरु नानक की आध्यात्मिक शक्ति से शुरू हुआ धर्म अपनी शारीरिक शक्ति को भी चरम पर पहुंचाया। कलम के साथ तलवार भी उठाया।
गुरुग्रंथ में सिक्ख गुरुओं के साथ 30 अन्य हिंदू और मुस्लिम संतों की वाणियों को भी स्थान दिया। जिस किसी भी धर्म में और जिस किसी भी जाति में दिव्य-आत्माएं मिलीं, उनको अपने आदि-ग्रंथ में स्थान देने वाले सिक्ख धर्म से आज बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।
"सिक्ख" शब्द भारतीय संस्कृति के अनूठे शब्द "शिष्य" से निकला है। शिष्य शब्द की दो व्युत्पत्तियां हैं- 'शासनात् इति शिष्यं'
' अर्थात् जो शासन करने योग्य हो। यानी जो अपने आप को गुरु के अनुसार ढालने को सदैव तैयार रहे।( 2) 'शंसनात् इति शिष्यम्' अर्थात् जो अपना विश्लेषण करते रहे, अपने गुण-दोषों को परखते रहे।
"मोम के ढेर को हल्की सी तमाजत भी बहुत
हो सके तो किसी शक्ल में ढालो मुझको।
तुमसे तन्हा न हटेगा शब की स्याही का तिलिस्म
मैंने पहले ही कहा था कि जला लो मुझको।।"
शिष्य के अंदर से आवाज आती है कि हे गुरुवर! मैं मोम का ढेर हूं। इसके पहले कि जिंदगी की कड़ी धूप में पिघलकर बेतरतीब आकार ले लूं, मुझे संभाल लो और किसी विशिष्ट शक्ल में ढाल दो। तब गुरु कहता है कि ओ शिष्य!अकेले तुमसे जीवन का अंधेरा नहीं हटेगा। मैं तो कब से कह रहा हूं कि जला लो मुझको।
सीखने की प्रवृत्ति के कारण शिष्य जब ढलने को तैयार हो और गुरु सिखाने के उद्देश्य से अपने को जलाने को तैयार हो तो वह क्रांति घटित होती है जिसका नाम सिक्ख-धर्म है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
गुरु-नानक जयंती की शुभकामना🙏🌹