संवाद


"पैरेंटिंग-चेतना कैसे जगे?"


चचेरी बहन के साथ रेप का प्रयास और उसके बाद उसकी हत्या की घटना ने बांसवाड़ा को हिलाकर रख दिया है। किशोर जो देख रहे हैं ,उसका यह परिणाम है। पुलिस-विभाग के लिए यह महज एक अपराध है किंतु शिक्षा-विभाग के लिए मन को समझने का एक अवसर है। ज्यादती का प्रयास और विरोध करने पर हत्या एक आयाम है और किशोरावस्था के छात्र-छात्राओं का घर से भागना इस पहलू का दूसरा आयाम है, जिसमें अप्रत्याशित बढ़ोतरी हाल के दिनों में हुई है।


जब मैं किशोरावस्था में नौवीं क्लास में था तो मेरे बड़े भाई साहब ने एक पुस्तक "पवित्र जीवन" मुझे पढ़ने को दी। पढ़ाने के साथ-साथ मुझे खेलाने के लिए भी भाई साहब बहुत मेहनत करते थे। उस पुस्तक की एक लाइन मेरे दिलो-दिमाग में प्रवेश कर गई-


"पवित्र मन में ही प्रतिभा का जन्म होता है।"


उस उम्र में ज्यादा समझ नहीं थी लेकिन जब भी कोई गलत विचार मन में उठता था तो मैं डर जाता था क्योंकि बुरे विचार के कारण न तो मुझमें खेल की प्रतिभा जन्म लेगी और न पढ़ाई की प्रतिभा।


खेल के मैदान में पसीने की बूंदे गिराने से तन पवित्र हो जाता था और महापुरुषों की जीवनी पढ़ने से मन पवित्र हो जाता था। अच्छे शिक्षक कोर्स की किताबें इतनी अच्छी प्रकार से समझा देते थे कि उनके पढ़ाए विषय सरल और सरस हो जाते थे। उस समय मोबाईल नहीं था और समाचारपत्र,पत्रिकाएं पढ़ने के लिए भी गांधी-पुस्तकालय या रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाना पड़ता था।


कॉलेज में जब आया तो कुछ साथी गंदी फिल्मों की लत में थे। उनकी फालतू बातों में उत्सुकता की जगह मन में कंपकंपी बैठ जाती थी कि अपवित्र मन मुझे नर्क में डाल देगा। पढ़े गए किताब की इस एक बात ने गंदी संगति से जीवन को बचा लिया।


पवित्र तन-मन-आत्मा की बातें और उसके साथ प्रतिभा का संबंध यदि किशोर मन में बैठ जाए तो कीचड़ में कमल खिलता है ,यह बात अनुभव में आने लगती है।


यदि पवित्रता का एक बार स्वाद मिल जाए तो अपवित्रता में वही बेचैनी होने लगती हैं जो अमृत पीने वाले को नाली का पानी देखकर बेचैनी होती है।


दुर्भाग्य की बात है कि आजकल चारों तरफ किशोरों को अश्लील फिल्म रुपी नाली का पानी ही नसीब हो रहा है। अच्छे भाई-बहन, माता-पिता,परिवार और शिक्षक का सौभाग्य नहीं मिलता जो पवित्रतारूपी अमृत का स्वाद उन्हें चखा दे। जिस गलत काम को करने से पहली बार उनकी आत्मा में अपराध-भाव उठा था,उसी को बार-बार करने पर अपराध-भाव खत्म हो जाता है और गंदी बातों की आदत बहुत मजबूत हो जाती है।


संस्कृत के श्लोक की एक पंक्ति है-


"कामातुराणाम् न भयम् न लज्जा


विद्यातुराणाम् न सुखम् न निद्रा।"


अर्थात् काम में उत्सुक व्यक्ति न भयभीत होता है और न लज्जा करता है और विद्या के उत्सुक को न सुख अच्छा लगता है और न निद्रा।


हमारी संस्कृति ने तो विद्यार्थी के लिए सुख को भी त्यागने को कहा था-


"विद्यार्थी वा त्यजेद् सुखम्, सुखार्थी वा त्यजेद् विद्याम्"


दुर्भाग्य की बात कि आजकल के विद्यार्थी सुखार्थी ही नहीं, कामार्थी भी निकलने लगे। ऑनलाइन एजुकेशन ने सभी के हाथ में स्मार्टफोन पहुंचा दिया किंतु स्मार्ट पैरेंट्स के अभाव में विद्यार्थी क्या देख रहे हैं ,श्रेय या प्रेय; इसका पता नहीं चलता,जिससे इस प्रकार की घटनाएं बढ़ रही हैं।


बलात्कारी मन के निर्माण में क्या सिर्फ किशोर अकेले दोषी है? या परिवार का और समाज का भी अपवित्र मन के निर्माण में दोष है?इस बात पर गहराई और ईमानदारी से सोचने का यह अवसर है-


"न जाने मासूम ने क्या देख लिया


दूसरे क्षण ही वो काफिर हो गया।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹