संवाद


"पिता का प्रेम पुत्री को "आयरन लेडी" बना देता है"


जवाहर लाल नेहरू जैसे पिता हों तो मोम की गुड़िया जैसी कोमल "इंदु" वाजपेयी जी के शब्दों में "साक्षात् दुर्गा" बन जाती हैं।


नेहरू जी यात्राओं में रहे या जेल में परंतु उनका ध्यान अपनी पुत्री से कभी हटता नहीं था। वे अपनी पुत्री को बराबर खत लिखा करते थे और देश तथा दुनिया की जानकारी से अवगत कराते हुए अपना प्रेम प्रकट करते थे। "Letters from a father to his daughter" सभी को पढ़ना चाहिए ताकि पता चले कि पुत्रियों को भार समझने वाली दुनिया के पास यदि जवाहरलाल सा प्रेमपूर्ण-हृदय तथा दूरदृष्टि हो तो बेटियां साक्षात दुर्गा,सरस्वती और लक्ष्मी बन सकती हैं।


भारत रत्न श्रीमती इंदिरा गांधी जी को जब देश याद करता है तो एक साथ कई उपलब्धियां ध्यान में आती हैं- राजाओं का प्रिवी पर्स खत्म करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना और बांग्लादेश को मुक्त कराना इत्यादि।


लेकिन मुझे उनका एक निर्णय बेहद पसंद है जिसमें भारत की बहुत सारी समस्याओं के मूल पर चोट की गई थी। वह दूरदर्शितापूर्ण निर्णय था- जनसंख्या नियंत्रण के लिए उठाए गए कठोर कदम।


फिलिपींस में मंगलवार को जन्मी एक बच्ची ने विश्व की आबादी को 8 अरब के आंकड़े तक पहुंचा दिया। संयुक्त राष्ट्र ने इस प्रतीकात्मक उपलब्धि को हासिल करने के लिए विनीस माबानसाग को चुना है। सिर्फ 11 साल में दुनिया की जनसंख्या 7 से 8 अरब तक पहुंच गई है।


ओशो ने कहा था कि यदि जनसंख्या विस्फोट को नहीं रोका जा सका तो यह एटम बम और हाइड्रोजन बम से भी खतरनाक बम साबित होगा। जन्म से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है जीवन देना ताकि मानवीय गरिमा के साथ कोई भी जी सके। लेकिन संसाधनों के अभाव में हमारी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा और स्वास्थ्य से वंचित होकर नारकीय जीवन जी रही हैं।


उस समय सरकार के अनिवार्य नसबंदी कार्यक्रम के विरुद्ध जनता में कुछ भ्रांतियां फैल गईं और इंदिरा जी को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी। इसके बाद कोई भी सरकार भारत के सबसे महत्वपूर्ण और ज्वलंत समस्या पर बहुत संभल कर टीका-टिप्पणी मात्र करती है। लेकिन जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न सिर्फ सत्ता बचाने से संबंधित नहीं है बल्कि मानव अस्तित्व को बचाने से सीधा जुड़ा हुआ मामला है।


मैंने तो एक परिवार को बहुत नजदीक से देखा है जिसमें 11 बच्चे थे। जहां मां-बाप इतने सोए हुए हों, वहां बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता कौन करे। हमेशा कलह और अभाव के कारण आस-पड़ोस का भी जीवन उन लोगों ने नर्क बना दिया था। बेटों में से कुछ दुर्दांत-अपराधी निकल गए और बेटियों में से कुछ ने देह-व्यापार का सहारा ले लिया। एक दो बच्चे प्रतिभाशाली थे और पढ़ना भी चाहते थे किंतु नजदीक के सगे-संबंधियों ने भी मुंह मोड़ लिया। सगे संबंधियों का भी सोचना था कि एक या दो का मामला होता तो सहायता की भी जा सकती थी,इस पूरे भीड़ की जिम्मेवारी कौन उठाए। उन मां-बाप की मौत भी हुई तो कंधा देने वालों में अपने बच्चों में से कोई नहीं था।


इस घटना के साक्षात अनुभव के बाद मुझे इंदिरा जी द्वारा 70 के दशक में उठाया गया कदम काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। भारत के कल्याण के लिए उठाए गए कठोर कदमों को हम सभी धर्म और क्षेत्र के चश्मे से देखने लगते हैं। अफवाह फैलाकर और असहयोग कर उसे विफल करा देते हैं।


आज भारत इंदिरा जी के दृढ़ और दूरदर्शितापूर्ण संकल्पों को दिल की गहराइयों से याद कर रहा है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि मेरे घर में ही इंदु और इंदिरा नाम की 2 बेटियां हैं-


" एक: चंद्र: तमो हंति , न च तारागणो अपि च".


अर्थात् एक इंदु (चंद्र) अंधकार हर लेता है,जिसे तारों का समूह भी नहीं हर पाता।


जनसंख्या नियंत्रण हेतु कड़े से कड़े उपाय अपनाने की प्रेरणा प्राप्त कर हम सही मायनों में भारत का विश्व में गौरव बढ़ाने वाली इस बेटी का जन्मदिवस सार्थक रूप से मना पाएंगे।


'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹