श्रद्धा अपनों से ही हिंसा की शिकार क्यूं?
November 24, 2022संवाद
"श्रद्धा अपनों से ही हिंसा की शिकार क्यूं?"
25 नवंबर को महिलाओं के प्रति हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में UNO द्वारा जनजागरण हेतु मनाया जाता है।श्रद्धा का जो अंजाम हुआ, आज वह सभी की निगाहों में दहशत के रूप में बस गया है और मानवता को शर्मसार कर गया हैं। कोई भी धर्म हो या कोई भी देश हो; स्त्री के प्रति हिंसा की दृष्टि से वे सभी एक समान है।
यूएनओ (UNO)प्रमुख एंतोनियो गुतेरेस तक इस जघन्य हत्याकांड की आंच पहुंची। उन्होंने कहा कि हर 11 मिनट में एक महिला या लड़की की हत्या किसी करीबी साथी या परिवार के सदस्य द्वारा की जाती है, जो मानव अधिकारों का सबसे व्यापक उल्लंघन है। दुनिया भर की सरकारों को इस संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय- कार्य-योजनाओं की डिजाइन पर जोर देना चाहिए। 2026 तक महिला अधिकार संगठनों और आंदोलनों के लिए 50% तक वित्त- पोषण सरकारों द्वारा बढ़ाया जाना चाहिए। नागरिक समाज समूह को शामिल कर जनजागरूकता का बहुत बड़ा अभियान चलाए जाने का यह वक्त है।
भारतीय संस्कृति के अनमोल शब्दों में से एक शब्द है "श्रद्धा"। घनघोर अंधेरी रात में जहां हाथ को हाथ नहीं सूझे,वहां श्रद्धा भरी आंखें आफताब (सूरज) देखने की सामर्थ्य रखती है। बीच मझधार में भी श्रद्धा से भरे हृदय को किनारा पास लगता है। खिजां में भी उसे बहार नजर आता है। तभी यह सृष्टि नारी के प्रति निर्मम व्यवहार के बावजूद भी आज तक अनवरत आगे बढ़ रही है।
ऐसी श्रद्धा के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाने से पुरुष-मनोवृति का एक घिनौना चेहरा सामने आ रहा है। सती प्रथा से लेकर कन्या भ्रूण हत्या तक और हलाला से लेकर तीन तलाक तक पर्याप्त प्रमाण देते हैं कि नारी के प्रति पुरुष-दृष्टि बर्बर रही है। उभर रहे हिंसा का आधुनिक स्वरूप बहुत डरावने हैं। इसका मतलब है कि नारी के साथ भी जीना नहीं आया और नारी के बिना भी जीना नहीं आया।
जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं तो हम अनुमान कर सकते हैं कि कैसी दुनिया बनी है जिसमें स्त्री के गर्भ से पैदा हुए लड़के को रास्ते पर खड़े देखकर लड़कियां रास्ता बदल लेती हैं-
लड़की ने देख रास्ते को जंगल की ओर मोड़ लिया,
लड़कों से ज्यादा जानवरों पर विश्वास कर लिया।
ऐसी स्थिति में परिवार और विद्यालय की भूमिका पर गहन विचार-विमर्श होना चाहिए।
इसे लव-जिहाद के एंगल से भी देखा जा रहा है। नहीं पता इसमें कितनी सच्चाई है।किंतु मेरी समझ में जहां लव(प्रेम) है,वहां जिहाद नहीं हो सकता और जहां जिहाद है, वहां लव नहीं हो सकता। ठीक आकाश-कुसुम और बंध्या-पुत्र की तरह लव-जिहाद मुझे लगता है। "लव" जहां होता है वहां जाति,धर्म कुछ भी दिखाई नहीं देता अपने प्रेमी के सिवा -
तुझमें रब दिखता है यारा मैं क्या करूं?
सजदे सर झुकता है यारा मैं क्या करूं??-
ऐसी विराट भाव दशा का नाम लव है, जबकि जिहाद में तो संप्रदाय की संकुचित दृष्टि होती है। फिर दोनों को एक साथ कैसे जोड़ा जा सकता है?
राजनीतिक दृष्टि से चुनावी फायदे के लिए नारी के प्रति हो रही हिंसा को मात्र लव-जिहाद के एंगल से देखने से नारी के प्रति संवेदनासृजन की जगह एक संप्रदाय के प्रति घृणा पैदा हो जाती है। जिस प्रकार से ईरान के खिलाड़ियों ने विश्व कप के दौरान अपना राष्ट्रगान न गाकर हिजाब के विरोध में चल रहे नारी के आंदोलन का समर्थन किया है, उसी प्रकार से हमें लिंग,जाति,धर्म,क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर यूनाइट होकर किसी भी प्रकार की हिंसा का विरोध करना चाहिए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिए वर्ष 2022 की थीम भी यही है- "UNITE" अर्थात् एकजुटता।
संवेदना जगाने वाली उस वेद-विद्या की जरूरत आज है जो सिर्फ मानवों के प्रति ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों से लेकर पेड़-पौधों के प्रति भी श्रद्धा रखती थी। लेकिन हम तो श्रद्धाविहीन-सृष्टि की ओर कदम बढ़ा रहे हैं जिसमें लड़की या महिला को हर अजीज (रिश्तेदार/दोस्त) दुश्मन सा मालूम लगने लगा है।
यदि हमने परिवार-संस्था और शिक्षा-संस्था में शीघ्रातिशीघ्र गुणात्मक परिवर्तन नहीं किए तो.........
"फिर मत तरसना कभी मां की लोरियों के लिए
मत इंतजार करना रक्षाबंधन की डोरियों के लिए
न तो प्रेमिका बनकर जीवन में कोई बहार लाएगी
और न बेटी बनकर कोई आंगन में खिलखिलाएगी।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹