संवाद


"प्रस्तावना मंजिल,अनुच्छेद मार्ग"


संविधान दिवस भारत की महान प्रतिभाओं के द्वारा किए गए समुद्र-मंथन के बाद निकले हुए अमृत की याद दिलाता है। विविधतापूर्ण भारत के लिए एक सर्वग्राही लिखित दस्तावेज तैयार करना आसान नहीं था किंतु बाबासाहेब के नेतृत्व में महापुरुषों की दीर्घकालीन कठोर तपस्या से यह संभव हो पाया।।


डिग्निटी फॉर इंडियंस और यूनिटी फॉर इंडिया का संदेश देने वाला विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान क्या हम भारत के लोगों में सर्वाधिक लोकप्रिय है? जब कभी भी यह प्रश्न मैं स्वयं से पूछता हूं तो उत्तर नकारात्मक आता है।


रामचरितमानस रामलीला के माध्यम से जन-जन में लोकप्रिय हो गया,क्या संविधान को भी लोकप्रिय बनाने के लिए कुछ ऐसे उपाय किए जाने जरूरी नहीं है? संविधान हमारे लिए सबसे पवित्र दस्तावेज है किंतु इतना पवित्र कि अधिकतर नागरिकों ने इसे कभी स्पर्श ही नहीं किया,पढ़ने की तो बात दूर है।_


दुर्भाग्य से संविधान को सिर्फ वकीलों के लिए,वकीलों के द्वारा और वकीलों का ग्रंथ बना दिया गया है। यही कारण है कि हमारी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि समस्त नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता,समानता और बंधुता का आदर्श व्यावहारिक धरातल पर नहीं उतर पाया है।


संविधान की आत्मा कही जाने वाली प्रस्तावना में लिखा गया है कि वी द पीपल ऑफ इंडिया संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। किंतु क्या यह संविधान हम सभी के पास है?


छात्र के रूप में मैंने संविधान थोड़ा-बहुत पढ़ा और अनुभव किया कि एक तो संविधान मूल में अंग्रेजी में लिखा गया और दूसरा इसकी अनुवादित हिंदी-प्रति का वाक्य-विन्यास जटिल और नीरस है।


परीक्षा पास करने के लिए संविधान के कई अनुच्छेदों को रट तो गया किंतु इसमें रस सृजित नहीं हुआ। जबकि संविधान सभा में जब एक-एक महत्वपूर्ण विषयों पर वाद,विवाद और संवाद हुआ है तो हमारे महापुरुषों की भाषा सरस और हृदयस्पर्शी रही हैं।।


हमारे संविधान में मौलिक अधिकार पहले दिए गए और मूल कर्तव्य बाद में 42 वें संशोधन द्वारा 1976 में जोड़ा गया। महात्मा गांधी जी ने कहा था कि हमारी मां पढ़ी-लिखी नहीं थी किंतु अपने आचरण से और जीवन से उन्होंने बताया कि कर्तव्य रूपी वृक्ष पर ही अधिकार रूपी फल लगते हैं। UNO महासचिव हक्सले ने यूएन ह्यूमन राइट चार्टर बनाने के लिए विश्व के 60 महान लोगों से सुझाव मांगा था उसमें गांधीजी भी एक थे। गांधीजी का सुझाव सबसे अद्भुत और अनूठा था- "कर्तव्य रूपी नींव पर अधिकार रूपी इमारत खड़ा होता है।"


संविधान सभा के सदस्यों में गांधीजी नहीं थे किंतु गांधी जी की आत्मा का प्रतिबिंबन है यह संविधान।एक औरत के पास तन ढकने को कपड़े नहीं थे तो उन्होंने यह देख कर तब से अपने तन ढकने के लिए आधे कपड़े पहनने शुरू कर दिए। ऐसे कृत्यों में संविधान की आत्मा का दर्शन होता है।


मेरी समझ में तो संविधान-दिवस सर्वाधिक पवित्र कर्तव्य-बोध दिवस है। घर में आईना सब कोई रखता है किंतु आंख हो तो आईने में अपना चेहरा दिखता है। जब तक संविधान रूपी आईना हमारे पास नहीं हो और उसे पढ़ने तथा समझने की आंख हमारे पास नहीं हो तब तक हम भारत के लोग न तो कभी अपने वास्तविक चेहरे को देख सकते हैं और न समझ सकते हैं। यह संविधान हमारा मार्ग भी है और मंजिल भी_


"चाहे जितना भी घर में सामान रखना ,


आईने के लिए मगर एक स्थान रखना ।


दिल में सजाए लाखों अरमान रखना ,


पर रास्ता दिखाने वाला संविधान रखना।।*


'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे


संविधान-दिवस की मंगलकामनाओं के साथ...🙏🌹


संविधान दिवस भारत की महान प्रतिभाओं के द्वारा किए गए समुद्र-मंथन के बाद निकले हुए अमृत की याद दिलाता है। विविधतापूर्ण भारत के लिए एक सर्वग्राही लिखित दस्तावेज तैयार करना आसान नहीं था किंतु बाबासाहेब के नेतृत्व में महापुरुषों की दीर्घकालीन कठोर तपस्या से यह संभव हो पाया।।


डिग्निटी फॉर इंडियंस और यूनिटी फॉर इंडिया का संदेश देने वाला विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान क्या हम भारत के लोगों में सर्वाधिक लोकप्रिय है? जब कभी भी यह प्रश्न मैं स्वयं से पूछता हूं तो उत्तर नकारात्मक आता है।


रामचरितमानस रामलीला के माध्यम से जन-जन में लोकप्रिय हो गया,क्या संविधान को भी लोकप्रिय बनाने के लिए कुछ ऐसे उपाय किए जाने जरूरी नहीं है? संविधान हमारे लिए सबसे पवित्र दस्तावेज है किंतु इतना पवित्र कि अधिकतर नागरिकों ने इसे कभी स्पर्श ही नहीं किया,पढ़ने की तो बात दूर है।_


दुर्भाग्य से संविधान को सिर्फ वकीलों के लिए,वकीलों के द्वारा और वकीलों का ग्रंथ बना दिया गया है। यही कारण है कि हमारी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि समस्त नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता,समानता और बंधुता का आदर्श व्यावहारिक धरातल पर नहीं उतर पाया है।


संविधान की आत्मा कही जाने वाली प्रस्तावना में लिखा गया है कि वी द पीपल ऑफ इंडिया संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। किंतु क्या यह संविधान हम सभी के पास है?


छात्र के रूप में मैंने संविधान थोड़ा-बहुत पढ़ा और अनुभव किया कि एक तो संविधान मूल में अंग्रेजी में लिखा गया और दूसरा इसकी अनुवादित हिंदी-प्रति का वाक्य-विन्यास जटिल और नीरस है।


परीक्षा पास करने के लिए संविधान के कई अनुच्छेदों को रट तो गया किंतु इसमें रस सृजित नहीं हुआ। जबकि संविधान सभा में जब एक-एक महत्वपूर्ण विषयों पर वाद,विवाद और संवाद हुआ है तो हमारे महापुरुषों की भाषा सरस और हृदयस्पर्शी रही हैं।।


हमारे संविधान में मौलिक अधिकार पहले दिए गए और मूल कर्तव्य बाद में 42 वें संशोधन द्वारा 1976 में जोड़ा गया। महात्मा गांधी जी ने कहा था कि हमारी मां पढ़ी-लिखी नहीं थी किंतु अपने आचरण से और जीवन से उन्होंने बताया कि कर्तव्य रूपी वृक्ष पर ही अधिकार रूपी फल लगते हैं। UNO महासचिव हक्सले ने यूएन ह्यूमन राइट चार्टर बनाने के लिए विश्व के 60 महान लोगों से सुझाव मांगा था उसमें गांधीजी भी एक थे। गांधीजी का सुझाव सबसे अद्भुत और अनूठा था- "कर्तव्य रूपी नींव पर अधिकार रूपी इमारत खड़ा होता है।"


संविधान सभा के सदस्यों में गांधीजी नहीं थे किंतु गांधी जी की आत्मा का प्रतिबिंबन है यह संविधान।एक औरत के पास तन ढकने को कपड़े नहीं थे तो उन्होंने यह देख कर तब से अपने तन ढकने के लिए आधे कपड़े पहनने शुरू कर दिए। ऐसे कृत्यों में संविधान की आत्मा का दर्शन होता है।


मेरी समझ में तो संविधान-दिवस सर्वाधिक पवित्र कर्तव्य-बोध दिवस है। घर में आईना सब कोई रखता है किंतु आंख हो तो आईने में अपना चेहरा दिखता है। जब तक संविधान रूपी आईना हमारे पास नहीं हो और उसे पढ़ने तथा समझने की आंख हमारे पास नहीं हो तब तक हम भारत के लोग न तो कभी अपने वास्तविक चेहरे को देख सकते हैं और न समझ सकते हैं। यह संविधान हमारा मार्ग भी है और मंजिल भी_


"चाहे जितना भी घर में सामान रखना ,


आईने के लिए मगर एक स्थान रखना ।


दिल में सजाए लाखों अरमान रखना ,


पर रास्ता दिखाने वाला संविधान रखना।।*


'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे


संविधान-दिवस की मंगलकामनाओं के साथ...🙏🌹