कहते हैं, सिकंदर वेद की एक संहिता को यूनान ले जाना चाहता था और उसने पंजाब के एक गाँव में पता लगाने की कोशिश की कि वेद की प्रति कहाँ मिल सकेगी। पता चल गया। एक वृद्ध ब्राह्मण के पास ऋगवेद की संहिता थी। उसने घर घेर लिया। और उसने ब्राह्मण से कहा कि वेद की संहिता मुझे सौंप दो अन्यथ घर, तुम, संहिता सबको जला डाला जाबगा। ब्राह्मण ने कहाः इतने परेशान होने की जरूरत नहीं है, कल सुबह सौंप दूँगा, पहरा आप रखें।


रात भर का समय क्यों चाहते हो? सिकंदर ने पूछा। उसने कहा कि रात भर का समय चाहता हूँ ताकि पूजा-पाठ कर लूँ, पीढ़ियों से यह संहिता हमारे घर में रही है तो इसे ठीक से सम्मान से विदा देना होगा न! सुबह आप को भेंट कर देंगे। रात भर हम पूजा-पाठ कर लें, सुबह आप ले लेंगे। सिकंदर ने सोचा: हर्ज भी कुछ नहीं है। पहरा तो लगा था, भाग कहीं सकता न था ब्राह्मण। लेकिन सिकंदर ने यह सोचा भी न था कि भागने के और कोई सूक्ष्म उपाय भी हो सकते हैं। यज्ञ की वेदी पर हवन किया और उसने ऋगवेद का पाठ करना शुरू किया।


सुबह जब सिकंदर पहुँचा तो ऋगवेद की संहिता का आखिरी पन्ना ब्राह्मण के हाथ में था। वह एक-एक पन्ना पढ़ता गया और आग में डालता गया। उसका बेटा बैठा सुन रहा था। जब सिकंदर पहुँचा तो उसने कहा: मेरे बेटे को ले जाएँ, इसे ऋगवेद कंठस्थ करवा दिया है। यह संहिता है। शास्त्र तो मैं दे नहीं सकता था, उसकी तो गुरू से मनाही थी; लेकिन बेटा मैं दे सकता हूँ, इसकी कोई मनाही नहीं है!


सिकंदर को तो भरोसा न आया कि सिर्फ एक बार दोहराने से पूरा ऋगवेद बेटे को कंठस्थ हो गया होगा! उसने और पंडित बुलवाए, परीक्षा करवाई-चकित हुआ : वेद कंठस्थ हो गया था।


स्मृति को व्यवस्थित करने के बहुत उपाय खोजे गए थे, इसलिए बहुत दिनों तक तो भारत में हमने वेद को लिखे जाने के लिए स्वीकृति नहीं दी; जरूरत न थी। मनुष्य का मन इस भाँति हमने व्यवस्थित किया था, ऐसी प्रणालियाँ खोजी थी कि जरूरत नहीं थी कि किताब लिखी जाए; मन पर अंकित हो सकता था।


ओशो; अष्टावक्र महागीता प्रवचन--38