संवाद


"राजनीति का धर्म"


यदि राजनीति का धर्म हो तो जनसामान्य का कितना बड़ा समर्थन मिलता है, इसका प्रमाण गांधीवादी राजनीतिक आंदोलनों से आज भी पता चलता है। गांधी की धार्मिक- आस्था ऐसी थी कि उन्हें कुछ लोग संत का दर्जा देते थे और उनकी राजनीतिक-सक्रियता इतनी व्यापक थी कि कुछ लोग उन्हें राजनीतिज्ञ का दर्जा देते थे। इन दो विरोधाभासी गुणों के बावजूद गांधी को इतना व्यापक जनसमर्थन मिला कि साबरमती का संत सागर की सीमाओं को पार करके विश्व के कई महान राजनीतिक हस्तियों का प्रेरणा स्रोत बना हुआ है।


भारत की रीढ़ धर्म है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे सारे क्रियाकलाप और कर्मकांड धर्म के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं। अतः "धर्मनिरपेक्षता" को संविधान में तो जगह मिल गई किंतु हमारे दिलों में नहीं। क्योंकि धर्म की हमारी परिभाषा है-जो हमें धारण करे अर्थात् हमारा कर्तव्य,दायित्व,फर्ज


चूंकि पश्चिम में धर्म और राजनीति को अलग करने का लंबा संघर्ष चला और "धर्मनिरपेक्ष राज्य" वहां अस्तित्व में आया। हमने धर्मनिरपेक्षता को वहां से उधार लेकर अपना लिया। इसका मूल उद्देश्य था कि धर्म की राजनीति से परहेज किया जाए। किंतु इतने बरसों के बाद हम देख रहे हैं कि हर राजनेता धर्म की शरण में और भी ज्यादा से ज्यादा जाने लगा है।


धार्मिक स्थल आज इतना महत्वपूर्ण बन गया है कि लौकिक जगत की वास्तविक समस्याएं नजरअंदाज हो रही हैं। पर्यावरण,महंगाई,बेरोजगारी, शिक्षा,स्वास्थ्य जो राजनीति के मुख्य मुद्दे होने चाहिए, उनकी जगह आस्था और विश्वास के मुद्दे हावी हो गए हैं।


प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के अपने मौलिक-कर्तव्य से दूर हो गया है। राजनीतिक भाषण और चुनावी चर्चा द्वारा एक नागरिक तैयार नहीं किया जा रहा है बल्कि एक नागरिक को धर्म और जाति की पहचान विशेष रूप से दिलाया जा रहा है और सिर्फ अपना-अपना वोटर तैयार किया जा रहा है।


दिल्ली में कूड़े का ढेर या दिल्ली की हवा का प्रदूषित होना, गुजरात में प्रत्येक परीक्षा का प्रश्न पत्र लीक होना या महंगाई का बढ़ जाना चुनावी चर्चा में गौण है; मुख्य है धर्म से जुड़ा विवाद।


भारतीय संविधान कहता है कि धर्म की राजनीति नहीं होनी चाहिए क्योंकि धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है। भारतीय संस्कृति कहती है कि राजनीति का धर्म अवश्य होना चाहिए। गांधी की नजरों में धर्मविहीन राजनीति विधवा के समान है। आज जिस तरह की राजनीति हो रही है, उससे राजनेताओं के प्रति विश्वास घटता जा रहा है। सभी एक दूसरे को भ्रष्टाचारी और व्यभिचारी साबित करने पर तुले हुए हैं तो ऐसे राजनेताओं के हाथ में लगाम देने के लिए मतदान करने कौन जाएगा?


इस चुनावी माहौल में हर नागरिक चुपचाप सब कुछ देख रहा है। किंतु निर्णय नहीं कर पा रहा है कि नागरिक-धर्म निभाने के लिए क्या किया जाए? लग रहे आरोप-प्रत्यारोप के अनुसार यदि हर उम्मीदवार और हर पार्टी गलत है तो नागरिक अपना अमूल्य मत देकर किसे चुने?-


"चलो अब किसी और के सहारे लोगों


बड़े खुदगर्ज हो गए हैं किनारे लोगों।


उम्मीद की हदें टूटीं तो ताज्जुब नहीं


पर म्यान से बाहर हैं तलवारें लोगों।।


महाभारत युद्ध के पहले वेदव्यास राजा धृतराष्ट्र के पास पहुंचे और पूछा कि राजन! आपके राज्य में पांडवों के प्रति यह क्या हो रहा है? धृतराष्ट्र ने कहा कि"क्या करूं गुरुवर!दुर्योधन मेरी सुनता ही नहीं? वेदव्यास ने कहा कि हे राजन! यदि कोई नागरिक राजा की बात नहीं सुनता तो उसके साथ क्या किया जाता है?


वेदव्यास राजधर्म की याद दिला कर चले गए और राजा की नींद उड़ा गए। किंकर्तव्यविमूढ़ राजा अपने धर्म का पालन नहीं कर सका। विदुर जैसा महात्मा और कृष्ण जैसा परमात्मा भी महाभारत रोक नहीं पाए। परिणाम हुआ समूल विनाश-


"धर्म एव हतो हंति,धर्मो रक्षति रक्षित:"


अर्थात् मारा हुआ धर्म अपने को मार डालता है और रक्षा किया हुआ धर्म अपनी रक्षा करता है।


"राजनीति का धर्म क्या है और नागरिक का धर्म क्या है?"-इसके उत्तर में हम सभी का भविष्य छुपा हुआ है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹