संवाद


"टूटे हुए दिलों को जोड़ने की चुनौती"


'पधारो म्हारे देश' में "भारत जोड़ो यात्रा" प्रवेश कर रही है। पद-यात्राओं के गौरवशाली इतिहास में शंकराचार्य और स्वामी दयानंद सरस्वती की 'भारत-यात्रा' के साथ गांधी की 'दांडी-यात्रा' ने जनजागरण के उद्देश्य को प्राप्त करने में जो सफलता पायी थी,हमारे दिलो-दिमाग पर एक अमिट छाप आज भी उन यात्राओं की है। पैदल-यात्रा धार्मिक हो या सांस्कृतिक या राजनीतिक; एक ऐसे वातावरण का निर्माण कर देती है, जिससे जन-जन अपना जुड़ाव महसूस करता है।


इसी क्रम में राहुल गांधी की "भारत जोड़ो यात्रा" पार्टी-लाइन से बाहर निकलकर धर्म,जाति,क्षेत्र की लाइन को भी पार करने के प्रयास के साथ आगे बढ़ रही हैं। चुनावी फायदे की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर भारत को जोड़ने के व्यापक उद्देश्य को अपनाकर कई समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों को भी इसने अपना बना लिया।


एक नागरिक के रूप में हर भारतीय की आस्था विविधता में एकता वाले भारत के प्रति है, भले ही मतदाता के रूप में वह अपनी राजनीतिक-आस्था बदलते रहता है। सत्य-प्रेम-अहिंसा की मूल्य आधारित गांधी-राजनीति ने नर-नारी बाल-वृद्ध सभी को अपने साथ जोड़ लिया क्योंकि वे धर्म,जाति,क्षेत्र की संकीर्णता से ऊपर उठ सके। गांधी की कथनी और करनी ,अंतर और बाहर में कोई विरोध नहीं था,अतः उनका जादू सर चढ़कर बोला। जनता अपने नेता के कथन से भी ज्यादा आचरण से सीखती है क्यूंकि भारत विचारकों का नहीं,आचार्यों का देश है।


"भारत जोड़ो यात्रा" वहिर्-यात्रा के साथ अंतर्-यात्रा होने पर ही सफल और सुफल हो सकती है। जुड़ रहे लोगों की भीड़ को देखकर लगता है कि एक आशा और उत्साह इस लंबी पैदल-यात्रा ने जगाया है किंतु महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आचार और विचार की एकता को भारत जोड़ो यात्रा के नेतृत्व ने अपने अंदर मजबूत बनाया है? क्या महात्मा गांधी की तरह राजनीति का धर्म सुनिश्चित करने का बीड़ा नेतृत्व ने उठाया है?


राजनीतिक-दृष्टि बाहर पर ज्यादा जोर देती है जबकि धार्मिक-दृष्टि अंतर पर।


बाहरी कार्यक्रम का अपना महत्त्व है। सबको मिलाकर साथ चलने का सांकेतिक महत्त्व भी एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है। किंतु जब तक बाहर में किया गया प्रयास अंतर-जगत में न पहुंचे तो स्थायी परिवर्तन नहीं होता। बापू का व्यक्तित्व गंगा के पवित्र पानी की तरह बन गया था जो पास में आने वाले हर एक को भी पवित्र कर देता था-


"पानी रे पानी तेरा रंग कैसा


जिसमें मिला दो लगे उस जैसा


दुनिया बनाने वाले रब जैसा".......... इस गाने में एक दृष्टि है जो इस समय विचारणीय है। पानी का कोई रंग नहीं होता इसलिए वह किसी भी रंग में अपने स्व को मिटा कर पर के रंग में रंग जाता है।


"भारत जोड़ो यात्रा" की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि धर्म,जाति,क्षेत्र,लिंग,भाषा के रंग में हर व्यक्ति इतना गहरा रंग गया है कि उसका मूल-स्वरूप खो गया है।


सम्यक-शिक्षा इन सारे रंगों को मिटाने का काम करती है ताकि मूल-स्वरूप की पहचान हो सके। आज का दुर्भाग्य यह है कि उस उदार और सर्वसमावेशी शिक्षा को भी विशेष रंग में रंगने का प्रयास किया जा रहा है।


बहुत बड़े शिक्षाविद् और समाजसेवी लोग इस यात्रा को अपना समर्थन दे रहे हैं। इससे आशा जगती है कि जन-गण-मन को यह संदेश जाएगा कि धर्म,जाति,क्षेत्र,लिंग,भाषा के अपने-अपने लेबल को अपने मन से हटा कर इस यात्रा में शामिल हों। भारतीयता का रंग जितना गहरा होगा उतना ही फीका अन्य रंग होता जाएगा।


हमारे ऋषियों ने तो- "पुत्रोअहं पृथिव्या:" की उद्घोषणा की थी और सभी को जोड़ने की बात कही थी- "वसुधैव कुटुंबकम्।"


आज की राजनीति यदि भारतीयों को भी जोड़ सके तो बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि वहां से भारतीय संस्कृति वाली उदार-शिक्षा मानवता को जोड़ने का महा-अभियान शुरू कर सकती है।


किसी भी शुभ-प्रारंभ या शुभ-प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए और उसे व्यापक से व्यापकतर बनाने की हमारी कोशिश होनी चाहिए-


"उनके पांवों के छाले


मेरे दिल में उभर आते हैं;


हर अंदाज़ उस शख्स के


बदले से नजर आते हैं।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹