ऊपर बुलाने का न वक्त और न क्रम
December 7, 2022🙏साइलेंट अटैक पर अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि🙏
"ऊपर बुलाने का न वक्त और न क्रम"
हे परमात्मा!तुझे इतना भी सलीका नहीं!
साइलेंट हार्ट अटैक से परिवार में नई पीढ़ी की हुई मौत ने सब कुछ बदल दिया। घर में शादी का माहौल था और तिलक की रस्म पर सभी ने उसे काफी खुश और हंसते-खेलते देखा था। दूसरे दिन एक और रस्म के लिए घर की औरतें बाहर गीत गाते हुए निकलीं, अचानक उसे कुछ घबराहट महसूस हुई और पसीना आया।
घर की गाड़ी में बिठाकर गांव से डॉक्टर के पास ले जाते, इसके पहले ही निर्दयी मौत ने उसे सदा सदा के लिए सुला दिया। बच्चियां मां को जगा रही थीं, घरवाले चिल्ला चिल्ला कर उठा रहे थे, नाचते गाते लोग परमात्मा को पुकार लगा रहे थे लेकिन न तो वो जागी और न ही उठी और न ही कुछ सुनी।
जंगल की आग की तरह खबर चारों तरफ फैल गई।जो भी जहां था,वहां से दौड़ा; लेकिन उससे मिलने के लिए नहीं बल्कि अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए। पति भरी जवानी में विधुर हो चुका था, बच्चियां अनाथ हो चुकी थीं और जहां चार दिन के बाद शादी थी और उत्सव का माहौल था,वहां मातम पसरा हुआ था।
खबर मुझे भी मिली और घर से हजारों किलोमीटर दूर पड़े मैंने वही गलती की,जो हर इंसान करता है। फोन करके हर एक से पूछ रहा था- कैसे हुआ और क्यों हुआ? हमारे ख्याल में संसार में जैसे आने का क्रम होता है, वैसे ही जाने का भी क्रम होना चाहिए। असमय और अकस्मात् मौत से तो हमारी दूर-दूर तक कोई पहचान नहीं है।
लेकिन कोविड-19 के दौरान और उसके बाद साइलेंट हार्ट अटैक से होने वाली मौतों ने बता दिया कि यह जीवन कितना क्षणभंगुर है, कितना अनिश्चित है और कितना बेवक्त आने वाला तथा बेरहम है-
जीवन एक हवा का झोंका,
दो क्षण का मेहमान है
अरे ठहरना कहां, यहां?
गिरवी हर एक मकान है।
लेकिन हम तो यहां स्थायी घर बना लेते हैं, कई पीढ़ियों के लिए संपत्ति जुटा लेते हैं, पुश्तैनी दुश्मनी पाल लेते हैं और न जानें क्या क्या पाने के लिए कितनी भागदौड़ करते हैं!
उस जिंदगी को जब मौत से इस तरह से गले लगते हुए देखता हूं तो यही ख्याल उभर आता है-
न अपने वश में जिंदगी,नअपने वश में मौत
आदमी मजबूर है और किस कदर मजबूर है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹