चुनाव कहीं जंग तो नहीं?
December 9, 2022संवाद
"चुनाव कहीं जंग तो नहीं?"
क्या जंग और चुनाव एक समान है? अलग-अलग संस्कृतियों का दृष्टिकोण इस संबंध में अलग-अलग रहा है।
पश्चिम की संस्कृति मानती है कि जंग में हर चीज जायज है। राजनीति और धर्म के बीच वहां लंबा संघर्ष चला और दोनों को एक दूसरे से अलग रखने का निर्णय लिया गया। तब सेकुलर या धर्मनिरपेक्ष राज्य अस्तित्व में आया। चुनाव हो या जंग; दोनों में अस्तित्व मिटने या बनने का प्रश्न होता है। अतः हर कीमत पर दोनों में जीत चाहिए। मैकियावेली के प्रभाव से पश्चिम में चुनाव भी एक जंग की तरह लड़ा जाता है।
पूरब की संस्कृति मानती है कि जंग के दौरान भी कुछ मूल्यों को नहीं छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि सिर्फ सफलता ही नहीं सुफलता भी चाहिए। इसीलिए महाभारत युद्ध के पहले कौरव और पांडवों ने मिलकर युद्ध के कुछ नियम बनाए। यद्यपि उन नियमों को बाद में दोनों ओर से तोड़ा गया किंतु भीष्म और कर्ण जैसे महावीरों ने मूल्यों की प्रतिबद्धता के साथ युद्ध को हर संभव लड़ने का प्रयास किया। इस कारण से आज भी उनका स्थान बहुत सम्मान का है जबकि दोनों हारी हुई कौरव सेना के सेनापति थे। जहां जंग में भी मूल्यों की बात की जाती थी, वहां चुनाव मूल्यविहीन कैसे हो सकते हैं?
भारतीय राजनीति में आज यह प्रश्न बहुत प्रमुखता से खड़ा हो गया है कि क्या किसी भी कीमत पर प्राप्त चुनावी-जीत का महिमामंडन किया जाना चाहिए या उस पर आत्मावलोकन किया जाना चाहिए?
चुनाव परिणाम के बाद जीत के जश्न में सत्ता रूपी साध्य के प्राप्त हो जाने के बाद चुनाव प्रचार के दौरान अपनाए गए जाति,धर्म इत्यादि साधनों की चर्चा गौण हो जाती है, जीत सब कुछ हो जाती है।
गांधी साधन की पवित्रता पर भी उतना ही जोर देते हैं जितना साध्य की पवित्रता पर। अटल बिहारी बाजपेई ने जब संसद में यह कहा था कि गलत साधन से प्राप्त सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा तब यह भारतीय संस्कृति की "पार्टी विद ए डिफरेंस" की आवाज थी। एक वोट के कारण उनकी सरकार गिर गई किंतु भारतीयों के दिलों में सदा सदा के लिए अटल सरकार अटल स्थान प्राप्त कर गई।
आज चुनाव में धनबल और दुष्प्रचार का प्रभाव इतना बढ़ता जा रहा है कि चुनाव जंग का रूप लेता जा रहा है। कई नेता इसे अब गर्व के साथ दोहराने भी लगे हैं कि चुनाव और जंग को हम एक समान मानते हैं और पूरी ताकत से लड़ते हैं।
विचारणीय बात यह है कि लोकतंत्र में चुनाव अनेक विकल्पों में से किसी एक विकल्प को चुनने का अवसर देता है तथा पक्ष-विपक्ष मिलकर शासन के नियम बनाते हैं और चलाते हैं। जबकि जंग में तो प्रतिद्वंदी को पूर्णतया नेस्तनाबूद कर दिया जाता है।
चुनाव परिणामों पर गौर करें तो तीनों प्रमुख दलों ने कुछ पाया है तो कुछ खोया भी है। जनता जिसे एक बार जिताती है,उसे दूसरी बार हार का स्वाद भी चखाती है। जीतने वाले जीत को और हारने वाले हार को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं तो लोकतंत्र की गौरव-गरिमा बढ़ती है। जनता की सेवा की लिए जीतने वाले के हाथ में सत्ता आई है तो हारने वाले के हाथ में जनता को और जागरुक बनाने का मौका।
धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण को लोकतंत्र के लिए एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया जाता है। भारतीय संविधान भी यही कहता है कि चुनाव में मतदान करते समय जाति-धर्म से ऊपर उठकर काम के आधार पर वोट डालना चाहिए। विविधता में एकता वाले भारत को एक सजग नागरिक ही सारी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर अपने अमूल्य मतदान से मूल्यों की ओर अग्रसर कर सकता है।
इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए स्वायत्त चुनाव आयोग की भी व्यवस्था की गई है जो यह सुनिश्चित करे कि मूल्यों और मर्यादाओं का पालन करते हुए चुनाव संपन्न हो।चुनाव के दौरान हर मतदाता के समक्ष हर दल अपनी बात रख कर उनका विश्वास जीतने का प्रयत्न करता है। कोई प्रलोभन या धमकी पर चुनाव आयोग बहुत सख्त निर्णय लेता है।
ऐसी परिस्थिति में चुनाव और जंग एक समान कैसे हो सकता है?
सब आंख मूंदकर लड़ते हैं
जीत हर कीमत पर पाने को;
कौन "अटल" है अब यहां पर
संवैधानिक मूल्य बचाने को?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹