क्लास की कीमत पर कोचिंग क्यों?
December 12, 2022संवाद
"क्लास की कीमत पर कोचिंग क्यों?"
कोचिंग संस्थानों के लिए कोर्ट के आदेश पर राजस्थान सरकार ने विद्यार्थी-हित में गाइडलाइन जारी कर दिया है और अब एक्ट बनाने की तैयारी में है। 80-90 के दशक में ट्यूशन पढ़ने और पढ़ाने वाले सम्मान की नजरों से नहीं देखे जाते थे। शिक्षालयों में क्लासेज नियमित रूप से चलती थी और सिलेबस पूर्ण करने के साथ शिक्षा-संस्थान व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास के लिए भी अच्छी भूमिका का निर्वाह करते थे। कोचिंग का उस समय तक कोई नामलेवा नहीं था।
व्यावसायिक-दृष्टिकोण ने आज स्कूलों और कॉलेजों की क्लास को डमी बना दिया और कोचिंग को सर्वेसर्वा। अभिभावक शिक्षा-संस्थान की फीस भी चुका रहे हैं और कोचिंग की भी। आर्थिक रूप से दोहरी मार झेल रहे अभिभावकों के बच्चों को बदले में एक ऐसी शिक्षा मिल रही है जो मशीन तैयार कर रही है ,मानव नहीं। सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान नोट्स रटकर परीक्षा में अच्छी रैंकिंग पा लेना ही जीवन का मकसद बन गया है। जिस प्रकार से घोड़े की आंखों पर ऐसा पट्टा बांध दिया जाता है कि उसे अगल-बगल की चीजें दिखाई न दे, उसी प्रकार से कोचिंग में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को परीक्षा में आने वाले प्रश्नों के अलावा अन्य किसी भी विषय के ज्ञान से वंचित कर दिया जाता है। कोचिंग में पढ़ने के दौरान बाहरी दुनिया से बेखबर सिर्फ प्रतियोगिता के माहौल में रहने वाले विद्यार्थी भारी मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं और मनमाफिक रिजल्ट नहीं आने पर आत्महत्या तक कर रहे हैं। आखिर क्यों?
क्योंकि कोचिंग में साहित्यिक,सांस्कृतिक,खेलकूद की गतिविधियों के लिए कोई स्थान ही नहीं है जबकि शिक्षा-संस्थानों में व्यक्तित्व के सारे पहलुओं को छूने का प्रयास किया जाता है। महापुरुषों की जयंतियों के माध्यम से जीवन की समस्याओं के समाधान सिखाए जाते हैं।
पटना विश्वविद्यालय में मेरा एडमिशन क्रिकेट की उपलब्धि के बदौलत हुआ। पढ़ाई साथ चलती रही और क्रिकेट की उपलब्धि भी आगे बढ़ती रही। आगे जब क्रिकेट का रास्ता बंद हुआ तो पढ़ाई के रास्ते ने मुझे संभाल लिया। क्योंकि मेरे मार्गदर्शकों ने मुझे बताया कि एक रास्ता बंद होने पर जीवन नहीं रुक जाता है। आज मै खिलाड़ी का जीवन जीने के बावजूद कॉलेज-एजुकेशन में एसो. प्रोफेसर के पद पर हूं।
आखिर एक रास्ता बंद होने पर दूसरे रास्ता को खोल लेने का आत्मविश्वास कहां से प्राप्त हुआ? निश्चितरूपेण वह शिक्षा-संस्थान में दिया गया बहुआयामी प्रशिक्षण का फल था। सरकारी स्कूल और कॉलेजों से सस्ते में पढ़कर गरीब घर से व्यक्तित्व के बहुत धनी लोग निकले हैं।
क्या कोचिंग संस्थान ऐसी उपलब्धि कभी गिनती करवा सकते हैं?
आज तो गरीब अपना खेत बेचकर और पेट काटकर भी एक बच्चे की कोचिंग फीस बहुत मुश्किल से जुटा पाता है। उस गरीब बच्चे पर सफलता का इतना आर्थिक और मानसिक दबाव होता है कि वह टूट जाता है। आज कुछ कोचिंग संस्थान मानसिक-यंत्रणा के केंद्र के रूप में तब्दील हो चुके हैं। कोचिंग से सफल विद्यार्थी अंक अच्छा लाने में तो सफल हो रहे हैं किंतु विषय की गहरी समझ उनकी नहीं बन पा रही है। कारण है कि कोचिंग संस्थानों में रटने पर ज्यादा जोर हैं,विषय को गहराई से समझ कर मनन-चिंतन करने पर नहीं।
मशीन बनाने वाली कोचिंग संस्थान के फलने- फूलने में समाज की शॉर्टकट दृष्टि का तो योगदान है ही, गैरशैक्षिक-कार्यों में शिक्षकों को लगाने वाली सरकारी नीतियां भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। सरकारी शिक्षालयों में यदि शिक्षक सिर्फ प्रतिभा तराशने के काम में लगे होते तो न तो विद्यार्थी कोचिंग की ओर अभिमुख होते और न पढ़ाई तनाव देने वाली बनती।
कोचिंग के मकड़जाल से शिक्षा को बाहर निकालने के लिए समाज को आगे आना होगा। सरकार द्वारा बनाए जाने वाले गाइडलाइन और एक्ट तो कोचिंग मालिकों पर सिर्फ थोड़ी बहुत लगाम लगाएंगे। उससे भी बचने का रास्ता कोचिंग-संचालकों के द्वारा ढूंढ लिया जाएगा। गरीब प्रतिभाओं का एकमात्र सहारा तो मानव निर्माण करने वाले शिक्षा-संस्थान और सिर्फ सरस्वती को समर्पित शिक्षक ही हैं।
लेकिन जब शिक्षा के द्वारा लक्ष्मी ही साधन और साध्य दोनों बन जाए तो सरस्वती दासी बनने के अलावा और क्या कर सकती हैं?
कोचिंग-विद्यार्थी:-
सॉरी मम्मी!सॉरी पापा!सपने साकार न कर सका
यह पढ़ाई और घुटन मैं अंगीकार न कर सका।
अभिभावक:-
पेट काटकर कोचिंग में एडमिशन करवाया था
क्यूं मरकर उसने मार्मिक संदेश भिजवाया था?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹