बेतुके बयान पर व्यर्थ चर्चा क्यूं?
December 18, 2022संवाद
"बेतुके बयान पर व्यर्थ चर्चा क्यूं?"
भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म कहा गया है- शब्द: ब्रह्म । जिस प्रकार से पानी में डाला गया एक बूंद तेल फैल जाता है,उसी प्रकार से एक ही शब्द का अर्थ वक्ता,श्रोता और संदर्भ के दृष्टिकोण से अलग-अलग हो जाता है। शब्द के सही अर्थ को पकड़ने में नीयत (intention) महत्वपूर्ण हो जाती है,जो अदृश्य होती है। इस नीयत को पकड़ने की सामर्थ्य सभी में नहीं होती। यहीं पर राजनीति को अपना खेल खेलने का अवसर मिल जाता है-
रोज कोई कुछ बोल देता है,
हवा में सनसनी घोल देता है
वो रोजगार की तलाश में था
क्यूं देखे कि बातों का मोल होता है?
'पिओगे तो मरोगे' यह वाक्य भाषाशास्त्रीय दृष्टिकोण से कारण-कार्य सिद्धांत को बता रहा है। किंतु इसका अर्थ अनेक प्रकार से लिया जा रहा है और हर पक्ष के पास अपने-अपने तर्क हैं। आश्चर्य की बात है कि वे सभी अर्थ और सभी तर्क अपनी-अपनी जगह पर सही प्रतीत होते हैं।
बिहार में सत्ता पक्ष कह रहा है कि 'पिओगे तो मरोगे' यह सच्चाई है।जहरीली शराब पीकर मरने वालों के साथ कोई सहानुभूति नहीं और कोई मुआवजा नहीं। इस मुद्दे पर सभी को एक साथ खड़ा होना चाहिए ताकि गलत काम करने वाले को कोई प्रोत्साहन नहीं मिले।
दूसरी तरफ वे विपक्षी जो शराबबंदी में साथ थे, आज 'पिओगे तो मरोगे' के बयान को संवेदनहीन बता रहे हैं और मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
वोट की राजनीति आज देश को इस मुकाम पर ले आई है कि सत्य का निर्धारण बहुमत के द्वारा किया जाता है। जबकि सत्य तो विरले को ही प्राप्त होता है, यह कभी भी बहुसंख्यक का मोहताज नहीं होता।
जब तक शिक्षा द्वारा वैज्ञानिक-दृष्टिकोण वाले नागरिक तैयार नहीं किए जाएंगे तब तक भावनाएं भड़का कर अपनी राजनीति चमकाने की दौड़ में कोई पीछे नहीं रहेगा।
गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता काल की 'सिद्धांत की राजनीति' और अमृत महोत्सव के दौरान की 'वोट की राजनीति' के बीच मूलभूत अंतर यही है कि पहले लोगों को जगाने का प्रयास किया जाता था और आज लोगों को भरमाने का प्रयास किया जा रहा है।
किसी भी नेता के बेतुके बयान पर चर्चा कराकर मीडिया कानों में शीशा घोल दे रहा है,जिससे देश निरर्थक बातों में उलझ कर जनसरोकार के सार्थक मुद्दों से दूर होता जा रहा है। यदि पर्यावरण,जलवायु परिवर्तन,महंगाई, बेरोजगारी पर चर्चा होती तो सरकार की भूमिका के साथ नागरिकों की भूमिका भी तय होती और देश के पास एक दृष्टि विकसित होती।
वास्तविकता यह है कि शराबबंदी वाले राज्य बिहार के साथ गुजरात में भी जहरीली शराब पीने से लोग मर रहे हैं और जहरीली शराब पीने से उस राज्य में भी लोग मर रहे हैं,जहां शराब पर कोई प्रतिबंध नहीं है-
"अच्छी या खराब पी ली
जो भी मिली शराब पी ली।"
एक तरफ हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं और दूसरी तरफ जहर पीकर लोग मर रहे हैं, आखिर क्यों?
व्यक्तिगत रूप से कुछ लोगों की अमृततुल्य उपलब्धियां गर्व और गौरव करने के लायक हैं किंतु सामाजिक रूप से अधिकांश लोगों की विषपूर्ण स्थितियां बहुत गहराई से सोचने लायक हैं।
राजनीति के लिए ऐसे अधिकांश लोग बहुत बड़े एसेट्स साबित हो रहे हैं क्योंकि राजनीति की दृष्टि संख्यात्मक होती है, गुणात्मक नहीं।
गलत काम करने वाले लोग और गलत काम को प्रोत्साहन देने वाले राजनीतिक दल के बारे में जब तक हमारी नीति और नीयत दोनों सही नहीं होती तब तक देश विकास के रास्ते पर कैसे आगे बढ़ पाएगा??
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹