🙏Hero worship की संस्कृति सभी जगह रही है किंतु व्यक्ति-पूजा यदि गुणग्राही न बनाकर अंधभक्त बनाए तो उस पर विचार करना चाहिए; Greatest of all time(GOAT) इवेंट मैनेजमेंट पर एक विचार 🙏


संवाद


'व्यक्ति-प्रशंसक बनाम व्यक्ति-पूजक'


मैसी के प्रति उमड़ी दीवानगी में कहीं उनकी झलक न मिलने पर तोड़फोड़ की जा रही है तो कहीं उनके साथ सिर्फ सेल्फी के लिए 10 लाख रुपए तक दिए जा रहे हैं। व्यक्ति का प्रशंसक होना कुछ और बात है,व्यक्ति-पूजक होना कुछ और।


                  यदि आप किसी व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं तो उसके सद्गुणों की चर्चा आपमें उन सद्गुणों के विकास की पृष्ठभूमि तैयार करती है। क्योंकि व्यक्ति जैसा सोचता है और भावना करता है, वैसा ही बन जाता है। किंतु यदि आप किसी की पूजा करने लगते हैं तो उसके भक्त के रूप में अपने अंदर में एक अहंकार को जन्म देते हैं क्योंकि देवता जितना बड़ा होता है भक्त उतना ही बड़ा बन जाता है।


           प्रशंसक जहां भी वह सद्गुण पाएगा,वहां आकृष्ट हो जाएगा। क्योंकि जिस गुण के कारण वह प्रशंसक बना है, वह गुण महत्वपूर्ण है,व्यक्ति नहीं। अतः दूसरे व्यक्ति में वह गुण अधिक मात्रा में पाने पर वह दूसरे के प्रति भी भाव से जुड़ जाएगा। किंतु पूजक अंधभक्त बन जाता है। वह व्यक्ति को पूजने लगता है, अतः दूसरे में उन गुणों को देखने की आंखें बंद कर लेता है। उसके लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण हो गया,गुण नहीं।


                प्रशंसक जिस व्यक्ति की प्रशंसा करता है, उसकी सीमाओं को भी ध्यान में रखता है। अतः वह उस पर विचार कर सकता है,उसकी आलोचना कर सकता है। उसकी खूबियों से प्रेरणा ग्रहण कर सकता है और उसकी कमजोरियों से बच सकता है। किंतु व्यक्ति-पूजक अपनी आंखें गिरवी रख देता है और अपने हीरो की कमजोरियों में भी खूबियां देखने लगता है। अंधानुकरण व्यक्ति में हठधर्मिता को और हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ाता है।


             आज भारत की सबसे बड़ी समस्या यही बन गई है कि प्रशंसकों की संख्या घटती जा रही हैं और पूजकों की संख्या बढ़ती जा रही हैं। राजनीति,धर्म,कला,खेल इत्यादि क्षेत्र में यदि कोई आदर्श उभरता है तो आमजन उसके सद्गुणों से प्रेरणा ग्रहण करके अपने गुणों का विकास नहीं करते बल्कि उस व्यक्ति की पूजा करने लगते हैं और अपने को उसके साथ इतना जोड़ लेते हैं कि उसकी आलोचना को अपनी निंदा मानने लगते हैं। इस अंधभक्ति का नाजायज लाभ आदर्श-हीरो उठाने लगता है। आदर्श अपने अंधभक्तों का आंखें खोलने का प्रयास नहीं करता बल्कि उनकी आंखों में धूल झोंकने का उपाय करने लगता है।


'राजपथ पर जब कभी जयघोष होता है


आदमी फुटपाथ पर बेहोश होता है


भीड़ भटके रास्तों पर दौड़ती हैं


जब सफर का रहनुमा खामोश होता है।'


                     मैसी के प्रति दीवानगी का परिणाम तो यह होना चाहिए कि भारत में भी कोई मैसी पैदा हो और खेल प्रतिभाओं को अनुकूल परिस्थिति और प्रशिक्षण मिल सके। लेकिन भारत में तो खेल संघों पर राजनीति का कब्जा हो जाता है। राजनीति तो सुरसा की तरह अपना मुंह बढ़ाए चली जा रही है। मैसी के साथ खड़े होकर अपना राजनीतिक कद बढ़ा लेने की होड़ मची हुई है, ऐसे में मैसी का सदुपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। मैसी को बुलाकर कमाई का जरिया बढ़ा लेना एक बात है और मैसी के समान प्रतिभा विकसित कर लेने के लिए योजना बना लेना दूसरी बात है।


            मैसी का प्रशंसक मैं भी हूं किंतु मैं मैसी का खेल देखना पसंद करता हूं। फुटबॉल के वर्ल्ड कप फाइनल में जब अर्जेंटीना से मैसी अपना जलवा दिखा रहे थे, उसी समय फ्रांस से एमबापे भी दर्शकों का दिल जीत रहे थे। मेरे दोनों बेटे मैसी के इतने बड़े प्रशंसक हैं कि उनके नाम का टीशर्ट खरीद कर पहन लिया करते थे। एमबापे का आक्रामक फुटबॉल देखकर वे दोनों तनाव में आ गए कि कहीं अर्जेंटीना हार न जाए। अर्जेंटीना के मैच जीतने पर और मैसी के वर्ल्ड कप उठाने पर मुझे खुशी हुई किंतु एमबापे ने भी मेरा दिल जीता। खेल से मुझे मोहब्बत है तो जिस खिलाड़ी में भी अच्छे खेल की झलक मिल जाएगी वह भी मेरे दिल में स्थान बनाएगा। अपने बच्चों को समझाया कि अपने दिलोदिमाग को गुणों का प्रशंसक बनाओ, व्यक्ति का पूजक नहीं।


               ओशो स्पष्ट रूप से कहते थे कि चेतना की स्वतंत्रता में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति-पूजा (hero worship) है। बुद्ध ने भी कहा था कि मेरी मूर्ति मत बनाना,मेरे गुणों को अपनाना-"अप्प दीपो भव।" लेकिन सबसे ज्यादा मूर्तियां बुद्ध की बनाई गई। 'बुत' शब्द बुद्ध का अपभ्रंश है। बुतपरस्तों और बुतध्वंसकों  के संघर्ष में देश आज उलझा हुआ है। इतना ही नहीं गांधीवाद और सावरकरवाद का संघर्ष भी बढ़ता जा रहा है।दोनों में बहुत सारे सद्गुण ग्रहण करने लायक हैं किंतु बहुत सारी बातें समालोचना के लायक भी हैं। मैं तो सभी महापुरुषों का प्रशंसक हूं किंतु पूजक किसी का नहीं।


              मेरी राय में महापुरुषों की निंदा से बचना चाहिए किंतु समालोचना अवश्य करनी चाहिए। क्योंकि निंदा मिटाने के लिए होती है जबकि समालोचना जगाने के लिए। निंदा पर के तिरस्कार के लिए होती है जबकि समालोचना सत्य के आविष्कार के लिए। निंदा क्रोधवश होती है जबकि समालोचना करुणावश।


               आजकल तो महापुरुषों का चरित्र हनन किया जा रहा है जो कि अक्षम्य अपराध है।भारतीय संस्कृति का सबसे पहला विषय दर्शन कहता है कि तुम्हारी आत्मा में जो बीज रूप में छुपा हुआ है,वही परमात्मा में वृक्ष रूप में प्रकट हुआ है। अतः प्रशंसक बनकर गुणों को बढ़ाओ किंतु पूजक बनकर कहीं पर भी रुक मत जाओ ; क्योंकि-


'सितारों से आगे जहां और भी हैं


अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹