बाप बेटे के रिश्ते पर भारी आतंकी विचारधारा
December 16, 2025🙏सिडनी में हनुका जैसे यहूदियों के त्योहार पर जश्न में डूबे हुए लोगों पर बाप बेटे द्वारा की गई आतंकी वारदात आत्मीय-रिश्तों के ऊपर भारी पड़ती जिहादी विचारधारा पर सोचने के लिए मजबूर करती है; एक मनोविश्लेषण 🙏
संवाद
'बाप बेटे के रिश्ते पर भारी आतंकी विचारधारा'
क्या एक बाप अपने बेटे को आतंकी बना सकता है? यह प्रश्न बार-बार मेरे ज़हन में उठ रहा है। जब से मैंने सुना कि सिडनी नरसंहार में बाप और बेटे ने मिलकर आतंकी घटना को अंजाम दिया तब से मैं बेचैन हो उठा हूं। क्योंकि बाप का मनोविज्ञान मेरे अनुभव में यही है कि वह स्वयं कितना भी गलत रास्ते पर हो किंतु अपनी संतान को गलत रास्ते पर जाने नहीं दे सकता। सुबह उठकर परमात्मा से यही प्रार्थना रहती है कि बेटे सन्मार्ग पर रहें और बेटों पर आने वाली आफतें भले ही मेरे सर आ जाए किंतु उन्हें कुछ कष्ट न हो। भाव यह रहता है कि
'मेरे बाद भी इस दुनिया में जिंदा मेरा नाम रहेगा
जो भी तुझको देखेगा तुझे मेरा लाल कहेगा
तेरे रूप में मिल जाएगा मुझको जीवन दोबारा
मेरा नाम करेगा रोशन,जग में मेरा राज दुलारा।'
किशोरावस्था आते ही बाप बेटे में मतभेद की शुरुआत भले हो जाए किंतु मनभेद नहीं होता।गहराई से देखने पर वह मतभेद श्रेय और प्रेय का मतभेद होता है। बाप बेटे को कल्याण (श्रेय) के रास्ते पर ले जाना चाहता है जबकि बेटा नादान होने के कारण अपने मनपसंद (प्रेय) रास्ते पर जाना चाहता है-
'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा
मगर ये तो कोई ना जाने
कि मेरी मंजिल है कहां...
उम्र कुछ ऐसी होती है और दोस्तों का प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि बेटे और बाप के बीच की दूरी बढ़ जाती है जिसे जेनरेशन गैप का नाम भी दिया जाता है। फिर भी एक बाप के दिल में बेटे की चिंता सदैव बनी रहती है। पिता के हृदय में यही भाव उठता है कि
'हम हर उस किताब को काबिले जब्ती समझते हैं
जिसको पढ़ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं।'
बेटे को एक बेहतर इंसान बनाने के लिए बेहतर स्कूल, बेहतर शिक्षा,बेहतर शिक्षक और न जाने क्या-क्या... इंतजाम करने में बाप लगा रहता है क्योंकि बेटे के जन्म के साथ ही एक बेहतरीन नाम और एक बेहतरीन जिंदगी की खोज शुरू हो जाती है। इस आशा में बाप के हृदय का भाव गाने लगता है-
'न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।
अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है
तुझको किसी मजहब से कोई काम नहीं है
जिस इल्म ने इंसान को तक्सीम किया है
उस इल्म का तुझ पर कोई इल्जाम नहीं है।
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा
न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा....
फिर एक बाप अपने बेटे को साथ में लेकर जिहाद के लिए क्यों चला गया? क्या जिहादी-मानसिकता आत्मिक-लगाव पर भी भारी पड़ रही है?
सुना है कि सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने अपना और अपने बेटे (वास्तव में चारों बेटों) सहित पूरे परिवार का बलिदान धर्म और न्याय की रक्षा के लिए दिया, जिसके कारण उन्हें 'सरबंस दानी' (सब कुछ कुर्बान करने वाला) कहा जाता है। उन्होंने अपने पिता 'गुरु तेग बहादुर' के बलिदान के बाद, अपने चारों पुत्रों (साहिबजादा अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह) को मुगलों के खिलाफ लड़ते हुए या क्रूरता से शहीद होते देखा, और अंततः स्वयं भी मुगल शासकों के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान दिया। लेकिन इस उदाहरण में धर्म की रक्षा के लिए थोपे गए युद्ध में बलिदान का भाव था जबकि सिडनी नरसंहार में हनुका जैसे त्यौहार मनाते हुए लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की कुत्सित भावदशा है।
मैं मानता हूं कि चरमपंथी विचारों का प्रभाव,धार्मिक पहचान की भावना, व्यक्तिगत असंतोष और सामाजिक अलगाव मिलकर किसी को आतंकी बनाते हैं लेकिन बाप-बेटे के रिश्ते पर भी आतंकी विचारधारा भारी पड़ जाएगी ऐसा मैं सोच नहीं पाता; परंतु प्रत्यक्ष देख रहा हूं। अतः गहन सोच में मन डूबता जा रहा है।
आखिर मानव के मन का निर्माण करने वाली शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण है कि उसके गलत होने पर इंसान जिहादी बनकर शैतान बन जा रहा है और उसके सही होने पर शहीदी बनकर भगवान बन जाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹