नकाब,नीयत,नुसरत,नसीहत
December 18, 2025🙏श्री नीतीश जी द्वारा डॉ.नुसरत का नकाब हटाना एक सार्वजनिक विवाद को जन्म देना बन गया किंतु इसके पीछे छिपी नीयत और नसीहत को पकड़ना हमारा उद्देश्य होना चाहिए; एक विश्लेषण 🙏
संवाद
"नकाब,नीयत,नुसरत,नसीहत"
बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी द्वारा चिकित्सक नियुक्ति प्रमाणपत्र देने के समारोह में डॉ. नुसरत जी के नकाब को सरकाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विरोधियों और समर्थकों द्वारा मामले को उलझाया जा रहा है। विरोधियों का यह कहना कि यह शीलभंग का मामला है और समर्थकों का यह कहना कि यदि नुसरत त्यागपत्र देती है तो जहन्नुम में जाए ; ये दोनों अतिवादी कथन कृत्य के पीछे छिपी हुई नीयत और सार्वजनिक मंच पे घटी घटना से मिलने वाली नसीहत से हमें दूर कर देते हैं।
शिक्षा जगत की व्याख्या इस संबंध में ऐसी होनी चाहिए ताकि कृत्य के पीछे छिपी हुई नीयत और घटना से मिलने वाली नसीहत पर प्रकाश पड़ सके।
नीयत का जहां तक सवाल है, वहां तक 'जाकी रही भावना, जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' कहावत चरितार्थ होती है। इसी कारण से विरोधी इसे बहुत अमर्यादित बता रहे हैं तो समर्थक इसे अभिभावक द्वारा किया गया आचरण बता रहे हैं। श्री नीतीश कुमार जी के द्वारा नकाब हटाने की घटना की तुलना श्री अशोक गहलोत जी द्वारा घूंघट हटाने की घटना से भी किया जा रहा है।कृत्य दोनों एक समान लगता है लेकिन दोनों का परिणाम अलग-अलग स्पष्ट दिखाई देता है। नीतीश जी द्वारा नकाब हटाने पर नुसरत असहज दिखाई देती है और गहलोत जी द्वारा घूंघट हटाने पर संबंधित महिला की प्रसन्न मुद्रा दिखाई देती हैं। नकाब हटाने के तरीके और घूंघट हटाने के तरीके में भी गहराई से देखने पर अंतर दिखाई देता है। श्री नीतीश जी और श्री अशोक गहलोत जी दोनों की छवि एक परिपक्व और साफ-सुथरे नेता की हैं फिर भी श्री नीतीश जी का विधानसभा में दिए गए विवादित बयान के बाद नकाब खींचने वाली घटना थोड़ा विवादित बन गया है।
इस संबंध में कन्या महाविद्यालय के प्राचार्य के रुप में मेरे काल में घटित एक घटना का उल्लेख करना यहां प्रासंगिक होगा। उस घटना से मुझे यह नसीहत मिली कि किस प्रकार से राजनीति द्वारा तिल का ताड़ बना दिया जाता है। साथ ही यह भी सबक मिला कि कन्या या महिला के साथ व्यवहार करते समय कितना सजग और शालीन रहने की जरुरत है। घटना ऐसी थी कि अनुशासन समिति के एक शिक्षक ने लड़के जैसा पहनावा को देखकर साइकिल स्टैंड पर खड़े एक से यह पूछा कि तुम कन्या महाविद्यालय में क्या कर रहे हो? लेकिन वह लड़की थी और इसी कॉलेज की थी। शिक्षक के पूछने के तरीके ने मामले को उलझा दिया। किसी के सिखाने पर लड़की ने लिखित शिकायत कर दी कि मेरे ड्रेस पर शिक्षक द्वारा गलत कमेंट किया गया है। प्राचार्य के रूप में मैंने शिक्षक और बालिका से बात की लेकिन तब तक पत्रकार का प्रवेश हो चुका था। शिक्षक ने अपने पूछने के सलीके की गलती मान ली कि मैंने इसे लड़का समझ कर टोका और बालिका ने भी यह स्वीकार किया कि शिक्षक की नीयत अपमान करने की नहीं थी बल्कि अनुशासन बनाने की थी। किंतु पत्रकार ने इस छोटी खबर को दूसरे दिन प्राचार्य कक्ष के वार्ता की बड़ी फोटो के साथ अपनी व्याख्या करके इसे बड़ा मुद्दा बना दिया। दूसरे दिन एक विद्यार्थी संगठन का हंगामा कॉलेज गेट पर 'बहना तेरा यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान' नारे के साथ हुआ। जबकि बहना ने स्पष्ट रुप से सामने में आकर कहा कि सारी बातें स्पष्ट हो गई और हमारे कॉलेज में सारी कक्षाएं अच्छा अनुशासन होने के कारण नियमित चल रही हैं, अत: इसे मुद्दा न बनाया जाए। प्राचार्य के रूप में मुझे तनाव यह था कि हमारे शिक्षकों की मेहनत और छात्राओं के नियमित अध्ययन की खबर समाचारपत्र ने कभी इतनी बड़ी नहीं छापी,जितनी इस हंगामे की बड़ी खबर छापी।स्थानीय समाचारपत्र में दो दिन बड़ी सुर्खियां पाने के बाद तीसरे दिन कन्या महाविद्यालय की इस घटना को संपादकीय पृष्ठ पर जगह मिल गई जिसमें ('प्रसंगवश' में)यह लेख लिखा गया कि छात्राओं के पहनावे पर भी यहां नजर रखी जाती है जबकि लड़कियां आज अंतरिक्ष में उड़ान भर रही हैं।
इस घटना का सत्य मुझे पता था और इसके पीछे चल रही राजनीति का तनाव मैं प्राचार्य होने के कारण झेल रहा था। लेकिन मन में यह विश्वास था कि प्राचार्य होने के बावजूद अपनी सारी कक्षाएं लेते हुए सारे काम सजगता से देखता हूं और सारे शिक्षक छात्राओं पर हर प्रकार से ध्यान देते हैं; ऐसे में यदि निष्पक्ष जांच होगी तो मेरे महाविद्यालय का सुंदर चेहरा और निखर जाएगा-
'कोई ताश का पता नहीं हूं जो बेतरतीब बिखर जाऊंगा
आंधियां अफवाहों की आएंगी तो और निखर जाऊंगा।'
इसके बाद यह घटना आई गई हो गई लेकिन मुझे यह नसीहत दे गई कि आधी आबादी के साथ व्यवहार के संदर्भ में बहुत ही संवेदनशील बने रहने की जरुरत है-
'पुरुषों की दुनिया में मुनिया अपने सपने बुनती हैं
सपने को हकीकत बनाने के लिए सरकार चुनती है।'
नकाब हो या घूंघट; सिर्फ पर्दाप्रथा की पहचान नहीं है, संस्कृति की भी पहचान है। पर्दा प्रथा को खत्म करने की जरूरत है किंतु संस्कृति को भी बचाए रखने की जरूरत है। पुरुष मार्गदर्शन दे सकते हैं लेकिन नकाब या घूंघट उठाने या हटाने की पहल स्त्री द्वारा ही होनी चाहिए। लज्जा स्त्रियों का आभूषण है, कमजोरी नहीं। स्त्रियां जब चाहें इसे रख सकती हैं और जब चाहें इसे हटा सकती हैं।लेकिन कार्यस्थल पर और जांच-पड़ताल के स्थल पर कार्य निष्पादन में यह बाधा नहीं बननी चाहिए ; यह ज्ञान प्रदान करने के लिए ही शिक्षा जगत होता है।
पश्चिम में नारी मुक्ति आंदोलन के दौरान स्त्रियों ने पुरुषों की बराबरी करने की होड़ में अपने वस्त्र कम से कम कर दिए लेकिन जाने या अनजाने उन्होंने अपने नारी होने की पहचान को भी कम कर दिया। भारतीय संस्कृति मानती है कि नर और नारी अर्थात् शिव और शक्ति अपने आप में अनूठे और अद्वितीय हैं। नर को नारी बनने की जरूरत नहीं है तो नारी को भी नर बनने की जरूरत नहीं है। दोनों एक दूसरी के परिपूरक हैं; प्रतियोगी नहीं। लेकिन प्रतियोगिता के क्षेत्र में दोनों में निहित आत्मा समान रुप से अपनी-अपनी भूमिका निभाएगी।
स्वयं से नकाब या घूंघट हटाना बढ़ते आत्मविश्वास की पहचान है लेकिन दूसरे द्वारा हटाना विवाद को बढ़ाना है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹