शैक्षिक सम्मेलन की सफलता का पैमाना
December 21, 2025🙏प्रदेश स्तरीय शैक्षिक सम्मेलन के लिए शिक्षक आमंत्रित करने आए तो उस समय मैं आंतरिक मूल्यांकन की कॉपियां चेक कर रहा था और महसूस कर रहा था कि विद्यार्थियों ने पढ़ाई से बहुत दूरी बना ली है। ऐसे में मैंने इस गंभीर मुद्दे की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट कराया🙏
संवाद
'शैक्षिक सम्मेलन की सफलता का पैमाना'
शैक्षिक नेतृत्व ने अपनी मांगे रखीं और राजनैतिक नेतृत्व ने अपनी बातें रखीं; इस तरह दो दिवसीय शैक्षिक सम्मेलन संपन्न हुआ। हजारों लोगों की मेहनत से आयोजित प्रदेश स्तरीय शैक्षिक सम्मेलन में हजारों शिक्षकों ने शिरकत की। माननीय मुख्यमंत्री से लेकर शिक्षामंत्री तक और शिक्षाविद् से लेकर संत तक की उपस्थिति में जो विचारों का आदान- प्रदान हुआ, उसमें सिर्फ एक बात को छोड़कर बाकी सारी बातें हुई। जो एक बात छूट गई वह है-'विद्यार्थियों की दयनीय दशा'.
शिक्षारुपीवृक्ष बहुत बड़ा हो गया लेकिन उस पर लगने वाला फल बहुत छोटा और कड़वा निकल गया तो क्या यह चिंता और चिंतन का विषय नहीं है? आखिर वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रसिद्ध उद्घोष है-
'नर: सर्वत्र विजयमिच्छेत् , पुत्रात् शिष्यात् च पराजयम्'
अर्थात् मनुष्य सभी जगह विजय की तमन्ना करता है किंतु अपने पुत्र से और शिष्य से हार की कामना करता है। क्योंकि विकास का एक बड़ा पैमाना है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से आगे निकल जाए। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से इस मामले में आगे निकल गई कि उसे बाहरी सुख- सुविधाएं बहुत मिल गईं किंतु पुरानी पीढ़ी के जो आंतरिक-चरित्रगत मूल्य थे, उनसे नई पीढ़ी बहुत दूर जा रही हैं। सच्चाई,ईमानदारी,त्याग,तपस्या के अभाव में नई पीढ़ी बिना पढ़े परीक्षा में अच्छे नंबर पाना चाहती हैं, डमी अभ्यर्थियों के सहारे नौकरी पा लेना चाहती हैं, नशे की गिरफ्त में पड़ती जा रही है और मोबाइल के दुरुपयोग से उनका चरित्र गिरता जा रहा है।
लेकिन व्यवस्था ऐसी है कि शिक्षारूपीवृक्ष के फल का आकलन नंबर देकर किया जा रहा है। अच्छा से अच्छा परिणाम बता रहा है कि फल बहुत अच्छा है किंतु गिरता समाज और बढ़ता अपराध बता रहा है कि फल विषाक्त है-
'लड़कों को देख लड़की ने रास्ता मोड़ लिया
लड़कों पर विश्वास न जानें क्यों छोड़ दिया।
दरख्तों से दूर चिड़ियों का निवास हो गया
व्यवस्था से हर शख्स का विश्वास खो गया।'
भारत सरकार की शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी जी के समय में मामा बालेश्वर दयाल कॉलेज कुशलगढ़ की तरफ से शिक्षा पर चल रहे मंथन में विचार देने हेतु मैं बांसवाड़ा कलेक्ट्रेट में गया था। एक विधायक जी ने सभा में सवाल रखा कि कितने लोगों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं? सारे सरकारी अधिकारियों में से एक ने भी हाथ नहीं उठाया। विधायक जी नाराज होकर खरी-खोटी सुनाने लगे। मैंने उसी समय सभा में दूसरा सवाल उठाया कि कितने सरकारी अधिकारी प्राइवेट स्कूल से पढ़कर आए हैं? इसके जवाब में भी किसी ने हाथ नहीं उठाया अर्थात् सभी सरकारी अधिकारी सरकारी स्कूल से पढ़कर आए थे।मैंने कहा कि विचार इस पर होना चाहिए कि सरकारी स्कूल से पढ़कर सरकारी अधिकारी बनने वाले हम सभी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए क्यों नहीं भेजते? मैंने अपना निजी अनुभव सुनाया कि हमारे घर में खाना बनाने वाली बाई जी की दो पोती हैं और उनके लिए वो प्राइवेट स्कूल ढूंढ रही थीं। मैंने सलाह दी कि सरकारी विद्यालय में योग्य शिक्षक होते हैं और पैसा भी कम खर्च होता है, आप वहां एडमिशन करा दीजिए। बाई जी ने कहा कि सर! बच्चियों को पढ़ाना है सिर्फ खाना नहीं खिलाना है। आखिर कैसी नीतियां बनाई गईं कि सरकारी स्कूल की छवि ऐसी बन गई?
माननीय मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा जी ने शिक्षकों को दीपक की ज्योति बताया और चाणक्य का उदाहरण देकर कहा कि एक साधारण बालक चंद्रगुप्त को अपने शिक्षा और दृष्टिकोण की शक्ति से एक शिक्षक ने सम्राट बना दिया। यह बात शत-प्रतिशत सच है। किंतु हमें यह भी जानना होगा कि चाणक्य और चंद्रगुप्त के बीच अध्ययन-अध्यापन अहर्निश चलता था। चौबीस घंटे गुरु अपने शिष्य के लिए योजनाएं बनाता था और शिष्य भी अपने गुरु की एक-एक सीख को अपने जीवन में उतारने के लिए अपना प्राण लगा देता था। गुरु की निगाहों में सिर्फ शिष्य था और शिष्य की निगाहों में सिर्फ गुरु था क्योंकि शिष्य ढलने के लिए तैयार था और गुरु उस उद्देश्य से अपनी समग्र ज्योति के साथ जलने के लिए तैयार था-
'मोम के ढेर को हल्की सी तमाजत भी बहुत
हो सके तो किसी शक्ल में ढालो मुझको
तुमसे तन्हा न हटेगा शब की स्याही का तिलस्म
मैंने पहले ही कहा था कि जला लो मुझको।'
आज शिक्षक और विद्यार्थी के बीच में कई प्रकार के गैर शैक्षिक कार्य इतनी बड़ी बाधा बन गए हैं कि निगाहों में सिर्फ सूचना जुटाना और स्प्रेडशीट भरना रह गया है। जीवन भर पढ़कर जो शिक्षक ज्ञान लेकर आया था, उसका ज्ञान उसी के अंदर मर रहा है ; और छात्र जो ज्ञान की प्यास लेकर शिक्षा संस्थान में पहुंचा था, उस प्यास को बुझाने के लिए ज्ञान नहीं सिर्फ नंबर दिया जा रहा है और वह उसी से संतुष्ट है। परिणामस्वरूप शिक्षक निरर्थकता का शिकार हो रहा है और छात्र अयोग्यता का।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति से यह बहुत बड़ी आशा बनी थी कि सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली के कारण शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संबंध घनिष्ठ होगा। किंतु व्यवहार में शिक्षा का समय भी सिर्फ परीक्षा ने निगल लिया। 90% से ऊपर विद्यार्थी परीक्षा देने के लिए उपस्थित हो जाते हैं और 10% से कम विद्यार्थी क्लास में शिक्षा के लिए आते हैं तो क्या यह विकसित भारत के सपने की ओर बढ़ता कदम है?
एक तरफ शिक्षकों की व्यस्तताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि काम के बोझ तले उनकी जान जा रही हैं तो दूसरी तरफ विद्यार्थियों का अज्ञान इतना बढ़ता जा रहा है कि वे शुद्ध नहीं लिख सकते और किसी विषय पर अपना विचार व्यक्त नहीं कर सकते।
इतने बड़े प्रदेश स्तरीय शैक्षिक सम्मेलन में यदि इस समस्या को किसी ने उठाया हो और इस संबंध में कोई समाधान आया हो तो शैक्षिक सम्मेलन को सफल ही नहीं सुफल भी माना जाना चाहिए।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹