होश की युक्ति से नशा मुक्ति संभव
December 23, 2025/start
🙏नशा छुड़ाने का एक नया नशा सर्वत्र दिखाई दे रहा है किंतु नशा के बिना मन को मजा नहीं आता।अतः ज़रूरी है कि बाहरी नशा की जगह आंतरिक आध्यात्मिक नशा की ओर नई पीढ़ी को ले जाया जाए 🙏
संवाद
'होश की युक्ति से नशा मुक्ति संभव'
व्यसन मुक्त भारत का अभियान जितना अधिक चलाया जा रहा है उतना ही अधिक एक तरफ मादक पदार्थों की खपत बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ नए-नए नशे की गिरफ्त में नई पीढ़ी जकड़ती जा रही है। किसी शायर का कहना है-
'आपकी जिद ने मुझे और पिलाई हजरत
शेख जी इतनी नसीहत भी बुरी होती है।'
शिक्षा संस्थानों में नशा मुक्त भारत अभियान सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभियान बन गया है। जो सरकार इन मादक पदार्थों की बिक्री के लिए लाइसेंस जारी करती है, वही सरकार मादक पदार्थों के सेवन से दूर रहने का अभियान चला रही है। जिन राज्यों में मद्य निषेध लागू है, उन राज्यों में अगल-बगल के राज्यों से मद्य की आपूर्ति की जा रही है।
'व्यसन' का अर्थ होता है-आदत और निर्भरता। किसी पदार्थ की लत लग जाती है तो उसकी तलफ जगती है और नहीं मिलने पर बहुत बेचैनी होती है। पान,बीड़ी,सिगरेट,तंबाकू,शराब इत्यादि पदार्थों के नशे से समाज जूझ रहा था कि अब मोबाइल,गेमिंग,रील इत्यादि के व्यवहारगत नशे में मन फंस गया। हर नया नशा पुराने नशे से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है।
भारतीय संस्कृति की गहरी समझ कहती है कि बिना व्यसन के मन नहीं रह सकता। मन को एक न एक आधार चाहिए। यदि उसे बाहरी नशे से बचाना है तो किसी भीतरी नशे का आधार देना होगा। इसलिए महात्मा के लक्षण में 'व्यसनम् श्रुतौ' गिनाया गया है जिसका मतलब है कि श्रुतियों अर्थात् वेदों के पढ़ने के वे व्यसनी होते हैं। बुद्धिमानों और मूर्खों का अंतर साफ करते हुए स्पष्ट रूप से हमारे ऋषि कहते हैं-
'काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्
व्यसनेन च मूर्खानाम् निद्रया कलहेन वा।'
अर्थात् बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्र में विनोद करते हुए बीतता है जबकि मूर्खों का समय व्यसन में,निद्रा में या कलह में व्यतीत होता है।
इसलिए शराबी फिल्म का गीत सही कहता है कि-
'नशे में कौन नहीं है ये तो बताओ जरा
किसे है होश उसे सामने तो लाओ जरा।
किसी पर हुस्न का गुरूर, जवानी का नशा
किसी के दिल पर मोहब्बत की रवानी का नशा
कहीं पर देखो तो आंखों से उतरता है नशा
बिन पिए भी कहीं हद से गुजरता है नशा।
ध्यान से देखें तो शक्ति,धन,पद,प्रतिष्ठा का नशा मादक पदार्थों के नशे से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। हिटलर कोई नशा नहीं करता था लेकिन शक्ति के नशे में चूर होकर उसने लाखों लोगों की हत्या करवा दी। उद्योगपति धन के नशे में जंगलों,पहाड़ों को काटकर अपनी बेशुमार संपत्ति और अधिक बढ़ा लेना चाह रहे हैं। पद पाने के लिए भ्रष्टाचार और व्यभिचार की सारी सीमाएं लांघी जा रही है। अपनी छवि चमकाकर झूठी प्रतिष्ठा के लिए करोड़ों रुपए बहाए जा रहे हैं।
भारतीय मनीषा की गहरी समझ यह थी कि यदि मन को बहुत बड़ा आधार दे दिया जाए तो उस मन को मादक पदार्थ जैसे छोटे आधार आकर्षित नहीं कर पाते। तभी तो कबीर कहते हैं-
'पीवत राम रस लगी खुमारी।'
इस खुमारी का नशा उतरता ही नहीं है। सूरदास भी कहते हैं-
'मेरो मन अनत कहां सुख पावै
जैसे उड़ि जहाज को पंछी
पुनि जहाज पै आवै
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।'
खासकर युवा पीढ़ी के संदर्भ में यह बात विचारणीय है कि ज्ञान और ध्यान के व्यापक व्यसन की ओर ले जाने वाले शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्यों में उलझा दिया गया है। शिक्षक तो बीएलओ के रूप में काम करते हुए मर रहे हैं और क्लास सूने पड़ रहे हैं। अच्छे रास्तों पर ले जाने वाले शिक्षकों से दूर होती नई पीढ़ी नए-नए प्रकार के व्यसनों का शिकार हो रही हैं। यही भटकी हुई पीढ़ी राजनीतिक दलों के लिए और धार्मिक संगठनों के लिए अच्छा कार्यकर्ता बन रही है। तथाकथित राष्ट्र और धर्म का नया नशा इनकी रगों में अब दौड़ रहा है-
'दम मारो दम मिट जाए गम
बोलो सुबह शाम हरे कृष्ण हरे राम।
दुनिया ने हमको दिया क्या
दुनिया से हमने लिया क्या
दुनिया की परवाह करे क्यूं
सबने हमको दिया क्या?'
जैसे गाने इनका जीवन मंत्र बनता जा रहा है। कहीं 'जय जय शिव शंकर..' गाया जा रहा है तो कहीं 'अल्लाह हू अकबर' का नारा बोला जा रहा है। शिक्षकों को आत्महीन बना दिया गया और शिक्षा-संस्थान को दयनीय; उस पर से उनको तथाकथित राष्ट्र और धर्म का नया नशा राजनीतिक और धार्मिक ठेकेदार आत्मविश्वास के साथ गौरवपूर्ण ढंग से परोस रहे हैं। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? राष्ट्र और धर्म के लिए जो मर जाए उसको स्वर्ग या जन्नत मिल जाने का पूर्ण आश्वासन है।
लेकिन इसी धरती को स्वर्ग बनाने वाली शिक्षा का अवसान हो रहा है जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा कहती हैं -'आत्मार्थे पृथ्वीं त्यजेत्'. अर्थात् आत्मा को पाने के लिए पृथ्वी को छोड़ देना चाहिए। कभी उस आत्मज्ञान को पाने के लिए विश्व की सारी प्रतिभाएं नालंदा विश्वविद्यालय की तरफ आकर्षित हो जाती थीं।आज अच्छी शिक्षा पाने के लिए हमारी प्रतिभाएं विदेशों में जा रही हैं, प्रतिदिन 500 से अधिक लोग विदेशी नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं। क्या उन्हें अपने राष्ट्र और अपनी मातृभूमि से प्रेम नहीं है? किंतु जब राष्ट्र और मातृभूमि प्रेय तथा श्रेय का अंतर बताने वाली गुणवत्तापूर्ण-समान-शिक्षा नहीं दे पा रही है तो उस शिक्षा की खोज में कुछ संपन्न लोग बाहर जा रहे हैं और शेष विपन्न लोग नशे की गिरफ्त में पड़ रहे हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹