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🙏नववर्ष 2026 की शुभकामना: नए का एहसास एक नई उमंग से हमें भर देता है🙏


संवाद


'नए का स्वागत'


हिंदू पंचांग मानने वाले को अंग्रेजी कैलेंडर का नववर्ष स्वीकार नहीं हैं। राष्ट्रकवि दिनकर जी ने रीत, परंपरा, मौसम, त्यौहार इत्यादि का हवाला देते हुए बहुत खूब लिखा कि....


'ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं, है अपना ये त्यौहार नहीं


है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं।'


        लेकिन हर कोई नयापन को स्वीकार करता है क्योंकि पुराने से ऊब जाता है। इसलिए कभी वस्त्र बदलता है, कभी स्थान बदलता है,कभी संगी-साथी बदलता है, कभी जीवन साथी तक बदलता है तो कभी कैलेंडर बदलता है। लेकिन ये सब बाहरी बदलाव उसे तृप्त नहीं कर पाते। क्योंकि मूल बदलाव मन के धरातल से आत्मा के धरातल पर जाने से होता है। मन या तो अतीत की स्मृतियों में या भविष्य की कल्पनाओं में खोया रहता है, इसलिए वर्तमान से चूक जाता है जबकि जीवन वर्तमान में होता है। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा कहती है-


'भविष्यं नानुसंधते नातीतं चिन्त्यत्यसौ


वर्तमान निमेषं तु हसन्नेवानुवर्तते।'


अर्थात् न भविष्य का अनुसंधान करता है,न अतीत की चिंता करता है बल्कि वर्तमान पल में आनंद से जीता है।


             वर्तमान में जीने की कला आध्यात्मिक विद्या से आती है जिसके कारण भारत कभी विश्वगुरु बना था। आजकल विकास के नाम पर जंगलों और पहाड़ों को काटकर नया रास्ता बनाने का अभियान चलता है किंतु मन को काटकर आत्मा की ऊंचाई पर ले जाने वाले रास्ते की खोज नहीं की जाती। मन के धरातल पर ही रुक जाने के कारण कई प्रकार की मानसिक समस्याएं बढ़ती जा रही हैं जबकि भारतीय दृष्टि कहती है कि मन के धरातल की समस्याओं का समाधान आत्मा के धरातल पर जाने से ही संभव है। मन हमें अंग्रेज बनाता है या भारतीय बनाता है, हिंदू बनाता है या मुसलमान बनाता है, अगड़ी जाति का बनाता है या पिछड़ी जाति का बनाता है किंतु सबमें आत्मा है जो परमात्मा का अंश है।


        आत्मा बीज है और परमात्मा वृक्ष। जब तक बीज खिलकर वृक्ष नहीं बन जाता, वह तृप्त नहीं हो पाता। दूसरे शब्दों में कहें तो आत्मा जब तक परमात्मा नहीं बनती तब तक तृप्ति संभव नहीं। क्योंकि परमात्मा इतना सृजनशील है कि हर व्यक्ति ही नहीं हर पत्ती को भी अनूठा बनाता है। दो व्यक्तियों के अंगूठे की छाप ही अलग-अलग नहीं होती,दो पत्तियां भी अलग-अलग होती हैं। उस सृजनशील परमात्मा का एक अंश होने के कारण आत्मा भी नए की तलाश में रहती है।रामधारी सिंह 'दिनकर' की प्रसिद्ध पंक्तियां....


"नयी कला,नूतन रचनाएँ,नयी सूझ,नूतन साधन,


नये भाव, नूतन उमंग से, वीर बने रहते नूतन" .…


बताती है कि हर आत्मा परमात्मारूपीस्रष्टा की तरह ही सृजनशील बने रहना चाहती है।


नववर्ष उसी सृजनशीलता की अभिव्यक्ति है चाहे वह हिंदू कैलेंडर का नववर्ष हो या अंग्रेजी कैलेंडर का।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹