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🙏हर्ष का विषय है कि हमारे गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय का 7वां दीक्षांत समारोह 8 जनवरी26 को संपन्न होगा। एक विद्यार्थी का प्रश्न है कि दीक्षांत समारोह का दर्शन क्या है?🙏


संवाद


'दीक्षांत की दार्शनिकता'


एक शिक्षक होने के नाते 'दीक्षांत की दार्शनिकता' पर प्रकाश डालते हुए मुझे हर्ष और विषाद की मिश्रित अनुभूति हो रही है। हर्ष इस बात का है कि भौतिक संसाधनों के मामले में विश्वविद्यालय संपन्न होता जा रहा है किंतु विषाद इस बात का है कि शैक्षिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र अभी भी पिछड़ा बना हुआ है।    


              भारतीय संस्कृति में शिक्षा को केवल जीविकार्जन का साधन नहीं बल्कि आत्मबोध और समाज-कल्याण का मार्ग माना गया है। शिक्षा की समाप्ति पर विभिन्न प्रकार की सैद्धांतिक और व्यवहारिक परीक्षाएं लेने के बाद योग्यता प्राप्त शिष्य को गुरु यह दीक्षा देता था कि अपनी विद्या और योग्यता से समाज का कल्याण करते रहना। 'दीक्षा' और 'अंत' इन दो शब्दों से बना "दीक्षांत" शब्द की दार्शनिकता यह है कि ज्ञान प्राप्ति की औपचारिक यात्रा की समाप्ति के साथ ही समाज कल्याण की जिम्मेदारी की यात्रा की शुरुआत हो जाती है। तभी गुरु कहता था-सत्यं वद,धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमद:। किसी शायर के शब्दों में कहें तो-


'मकतबे-इश्क का उसूल है निराला


उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ‌।'


                 लेकिन प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का शिष्य-गुरु का संबंध आज छात्र-शिक्षक के संबंध में तब्दील हो गया है। पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले के बीच में दूरियां आज इतनी बढ़ गई है कि विषय की कक्षा में भी बहुत कम मुलाकात होती है। विद्यार्थियों में सीखने की प्रवृत्ति का लोप होता जा रहा है जिसका प्रमाण है कि मौलिक पुस्तकों की संस्कृति की जगह पासबुक की विकृति ने जगह बना ली है। शिक्षकों में सिखाने की प्रवृत्ति का लोप तो नहीं हुआ है किंतु गैर शैक्षिक कार्यों के बोझ के कारण पूर्ण और प्रभावी शिक्षण का अवकाश नहीं मिलता। सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली लागू होने के बाद तो शिक्षा गौण हो गई है और परीक्षा ही परीक्षा चल रही है।आश्चर्य की बात है कि सीखने और सिखाने का माहौल प्रतिकूल होने पर भी प्राप्तांक बहुत अनुकूल मिल रहे हैं।


           ऐसी शिक्षा की समाप्ति पर दीक्षांत समारोह शैक्षणिक उपाधि प्राप्त करने का एक अवसर मात्र बनता जा रहा है और स्वर्ण पदक तो अहंकार का आभूषण साबित हो रहा है। परंतु विश्वविद्यालय जिन्हें स्वर्ण पदक दे रहा है,जिंदगी उन्हें स्वर्णिम आभास एकदम नहीं दे रही है। वे दर-दर की ठोकरें खाने को अभिशप्त हैं और चतुर्थश्रेणीकर्मचारी भर्ती परीक्षा से लेकर सफाईकर्मीभर्ती परीक्षा तक में आवेदन कर रहे हैं। ऐसे गोल्डमेडलिस्टों को देखकर मेरे हृदय के भाव शब्दों में यूं अवतरित हुए-


'विश्वविद्यालय का गोल्डमेडलिस्ट सड़क पर खड़ा था


उपाधियों के ढेर तले उसका अरमान पड़ा था


परीक्षा जिंदगी की आज वह फेल हो गया था


अनमोल सा हीरा बेमोल सेल हो गया था।'


                भारतीय दर्शन के अनुसार दीक्षांत समारोह तो औपचारिक शिक्षा के महत्वपूर्ण चरण के पूर्ण होने और उत्तरदायित्व के चरण में विनम्र होकर प्रवेश होने का सांस्कृतिक व नैतिक स्रोत था। ऋषि ऋण के प्रति अनुगृहीत शिष्य अपने गुरु की दी गई दीक्षा को जीवन के अंत तक नहीं भूलता था और अपने सत्कर्मों से अपने गुरु और शिक्षा संस्थान की ख्याति को चतुर्दिक् फैलाता था।


             दीक्षांत की उस गौरवशाली परंपरा को पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए जड़ को सींचना होगा। शिक्षा जड़ है और दीक्षा सुगंध; जिससे जीवन अंत तक सुवासित बना रहता है। विद्यार्थी और शिक्षक का संबंध जब तक घनिष्ठ नहीं होता तब तक शिक्षारूपी जड़ की सिंचाई संभव नहीं। मूल को जब तक पर्याप्त खाद-पानी नहीं मिलता तब तक उस पर फूल नहीं खिलता। जो फूल खिला ही नहीं उसमें दीक्षारूपी सुगंध कहां से आएगी?


            राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्प्रतिष्ठित करना चाहती है तो अध्ययन-अध्यापन की गुरुकुलीय प्रणाली को अपनाना होगा जिसमें शिक्षा की साधना अहर्निश चलती थी; तब दीक्षांत का क्षण आत्मोन्नति और समाजोन्नति का क्षण बन पाएगा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹