🙏सुख की खबर के तुरंत बाद दुख की खबर सुनकर मेरा मन दो विरोधी भावों के बीच डोलने लगा। उस असमंजस और उधेड़बुन को शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है..🙏


संवाद


'मेरो मन अनत कहां सुख पावै'


स्थानांतरण के बाद कोर्ट के स्टे पर महीने भर से परेशान चल रहे एक प्रियजन का मनोवांछित जगह पर स्थानांतरण की खबर आई और मन खुश हो गया। उसी पल में व्हाट्सएप पर एक वरिष्ठ प्रोफेसर के निधन की खबर आई और मन दुखी हो गया। सुख और दुख की खबर एक साथ मिलने से मन विरोधाभासी भावदशा में पहुंच गया। एक तरफ नजदीकी रिश्तेदार के एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण की बात थी तो दूसरी तरफ साथ में काम किए सीनियर की जगत से विदाई या स्थानांतरण की बात थी ; मस्तिष्क निर्णय नहीं कर पा रहा था कि किस भाव को प्रधान बनाए।


         बुद्ध के सौतेले भाई आनंद ने जब दीक्षा ग्रहण की तो एक तरफ उसे अपनी पत्नी सुंदरी का राग आकृष्ट कर रहा था तो दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध के वैराग्य का महान आकर्षण उसे खींच रहा था ; इन दोनों प्रबल आकर्षणों के बीच वह न सुंदरी की तरफ लौट पा रहा था और न बुद्ध की तरफ बढ़ पा रहा था-


'राग न जो दिल में हमारे होता


फिर किसी साज में रागिनी नहीं होती


मौत होती न सच्चाई जो अटल दुनिया की


जिंदगी बुद्ध सी संन्यासिनी नहीं होती।'


          कुछ देर शांत बैठने की कोशिश की किंतु अनिर्णय की स्थिति में अशांति बढ़ती गई। गीता में कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि निर्णय करो अन्यथा 'संशयात्मा विनश्यति'अर्थात् अनिर्णीत आत्मा नष्ट हो जाती है। इस उधेड़बुन से निजात पाने के लिए परीक्षा ड्यूटी के अपने एकांत कक्ष से उठकर स्टाफ रूम में चला गया। लेकिन वहां बातचीत के बाद भी मानसिक द्वंद्व से निजात नहीं मिला तो बेचैन होकर टहलता रहा तभी किसी कवि की पंक्तियां आंखों में तैरने लगीं-


'एक तरफ दर्दीला मातम,एक तरफ त्योहार है


विधना के बस इसी खेल में यह मिट्टी लाचार है।


उड़ता कहीं पराग पवन में,कहीं चित्ता की राख है


किरण जादुई खड़ी कहीं तो कहीं वितप्त सलाख है।


एक तरफ है फूल सेज पर, एक तरफ अंगार है


विधना के बस इसी खेल में यह मिट्टी लाचार है।'


इस मनःस्थिति में बौद्धदर्शन का क्षणिकतावाद पहली बार समझ में आया


'एक पल है हंसना, एक पल है रोना, कैसा है जीवन का खेला


एक पल है मिलना ,एक पल बिछड़ना,जीवन है दो दिन का मेला।'


लेकिन मन तो इतना चंचल है कि कभी इस डाली पर कभी उस डाली पर कूदता रहता है। मृत्यु को देखकर अस्तित्ववाद का दर्शन याद आ रहा था जो जीवन को ही असार समझता है किंतु सुखद खबर की याद आते ही कुछ सार महसूस होने लगता था। तब हेगेल का द्वंद्ववाद उभरने लगा जो सुख (thesis) दुख (antithesis) के बाद गहन चेतना (synthesis) की बात करता है। अर्थात् सुख और दुख की खबरें एक साथ मिलने पर उच्च स्तर की समझ विकसित होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो सुख और दुख एक साथ मिलने पर मन तो विचलित होता है लेकिन चेतना परिपक्व होती है। ऐसी दशा में सूरदास जी का ध्यान आया जो कहते हैं-


'मेरो मन अनत कहां सुख पावै


जैसे उड़ी जहाज कौ पंछी


फिरि जहाज पर आवै।'


लेकिन मेरा मन रूपी पंछी तो कभी सुख पर बैठता था तो कभी दुख पर और दोनों में से किसी को भी भूला नहीं पा रहा था ; अतः बेचैन होता जा रहा था। मन के तल पर शांति नहीं थी और शांति की कामना हर कोई करता है ; ऐसे में आकाश की तरफ आंखें उठीं और अंतरात्मा की आवाज़ आने लगी-


'मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे


बाकी न मैं रहूं न मेरी आरजू रहे।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹