विवेक और आनंद की खोज
January 10, 2026🙏विवेकानंद जयंती की सार्थकता इस बात में है कि शिक्षा जगत में अवसाद और आत्महत्या जैसी घटना को विवेक और आनंद द्वारा ही रोका जा सकता है: एक विश्लेषण🙏
संवाद
'विवेक और आनंद की खोज'
विवेकानंद हमारे राष्ट्रीय आदर्श इसलिए बन पाए कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने विवेक और आनंद को सर्वोच्च मूल्य दिया था और ये दोनों मूल्य उनकी विशेष पहचान थे। इसलिए विवेकानंद की शिक्षा की परिभाषा विचारणीय है-'मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है।'
इस कसौटी पर यदि आज की शिक्षा को देखा जाए तो भारतीय शिक्षा प्रणाली दिशाहीनता की शिकार हो चुकी है। वृक्ष अपने फल से जाना जाता है और भारतीय शिक्षा रुपी वृक्ष पर विवेकहीन और आनंदहीन फल को देखकर कौन इस वृक्ष को सफल और सुफल मानेगा। मैकाले शिक्षा पद्धति के कारण शिक्षा का संबंध सिर्फ आजीविका से जुड़ गया। सीमित सरकारी नौकरियों के पीछे असीमित संख्या में डिग्रीधारी युवाओं की फौज खड़ी हो गई जिसका परिणाम है कि शिक्षा जगत में अवसाद और आत्महत्या की घटना इतनी बढ़ गई है कि इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नेशनल टास्क फोर्स बनाना पड़ा है। नेशनल टास्क फोर्स द्वारा सभी हितधारकों से सुझाव मांगे जा रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में सर्वाधिक मूल्य ज्ञान को दिया गया था और ज्ञान ने हीं भारत को विश्वगुरु बनाया था, धन,बल इत्यादि ने नहीं। भारत की गुरुकुलीय प्रणाली में गुरु अपने शिष्य को कौशल विकास से लेकर जीवन निर्माण की शिक्षा देने में अहर्निश लगा रहता था। अविद्या द्वारा कौशल विकास और विद्या द्वारा विवेक और आनंद प्राप्त कर शिष्य का जीवन सफल और सुफल हो जाता था-
'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा, विद्यया अमृतमश्नुते।'
लेकिन आज शिक्षा हमारी प्राथमिकता में नहीं है। शिक्षा पर आवंटित बजट और शिक्षा संसाधनों की कमी को देखकर यह आसानी से समझा जा सकता है कि भारतीय युवा अवसाद और आत्महत्या की ओर कदम क्यूं बढ़ा रहे हैं?
विचारणीय विषय यह है कि इन अभावों में भी विवेक और आनंद को कैसे ढूंढा जाए?
विवेक का अर्थ है-असार को छोड़ देना और सार को पकड़ लेना। जिस प्रकार से हंस पानी को छोड़ देता है और दूध पी लेता है। धन,पद,प्रतिष्ठा को आधुनिक शिक्षा ने सार बना दिया है जबकि ये सब साधन है,साध्य नहीं। अन्यथा सुभाष चंद्र बोस मातृभूमि की सेवा के लिए आईसीएस की नौकरी नहीं छोड़ते। क्योंकि विवेकानंद का उनपर पर बहुत ज्यादा प्रभाव था, इसलिए वे असार धन,पद,प्रतिष्ठा को छोड़कर सार त्याग और सेवा को पकड़ लिए।
जहां तक आनंद की बात है तो हमारी संस्कृति में परमात्मा को सच्चिदानंद कहा गया है। आत्मा परमात्मा का अंश है। इसलिए उसमें सत् ,चित्,आनंद बीज रूप में विद्यमान है। उस बीज को शिक्षा के द्वारा वृक्ष बनाया जाता है। फिर आत्मा ही आनंद से पूर्ण परमात्मा बन जाती है।
स्वामी विवेकानंद कहते थे कि सबसे छोटा जीव अमीबा और सबसे विकसित जीव बुद्ध में अंतर सिर्फ अज्ञान की परत का है। अमीबा पर अज्ञान की सारी परतें पड़ी हुई हैं जबकि गौतम ने अपनी साधना के द्वारा अज्ञान की सारी परतों को हटा दिया और बुद्ध बन गए।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹