🙏मकर संक्रांति की शुभकामना : पश्चिम की संस्कृति 'क्रांति' पर जोर देती है जबकि पूरब की संस्कृति "संक्रांति" पर ; आखिर क्यों?🙏


संवाद


'क्रांति नहीं,संक्रांति का पक्षधर भारत'


मकर संक्रांति के साथ सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करते हैं और दिन बड़ा होने लगता है। भारतीय संस्कृति में शरीर के काम केंद्र (sex-center)से नीचे के हिस्से को दक्षिणायन माना जाता है जबकि काम केंद्र से ऊपर के हिस्से को उत्तरायण माना जाता है जिसमें हृदय और मस्तिष्क दो विशेष भाग होते हैं। उत्तरायण की ओर जाने का अर्थ है कि हृदय और मस्तिष्क का द्वार खुलने लगता है। काम से व्यक्ति जब तक ऊपर की ओर नहीं उठता तब तक राम की संभावना के द्वार नहीं खुलते। सुसंस्कृत हृदय और परिष्कृत मस्तिष्क की ओर व्यक्ति जितना बढ़ता जाता है,उतना ही उसके जीवन में अंधकार कम होता जाता है और प्रकाश बढ़ता जाता है अर्थात् दिन बड़ा होता जाता है।


विश्व में कई क्रांतियां हुईं जिसके परिणामस्वरूप सत्ता बदली लेकिन व्यवस्था कमोबेश ज्यों की त्यों बनी रही। फ्रांस की क्रांति हो या रूस की क्रांति;रक्त बहाने के बाद भी शक्ति से विरक्त मनुष्य पैदा नहीं कर सकी जो जनता के कल्याण के लिए सत्ता का उपयोग करता। फ्रांस की क्रांति के बाद नेपोलियन आया और रूस की क्रांति के बाद जारशाही की जगह कम्युनिस्टशाही आई लेकिन जनता शक्तिहीन बनी रही।


भारतीय संस्कृति अद्भुत है जो क्रांति की जगह संक्रांति का प्रयोग करती है। क्रांति तो सामाजिक या राजनीतिक होती है जिसके कारण थोड़ा बहुत बाहरी परिवर्तन दिखाई देता है लेकिन आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता। क्योंकि भारतीय संस्कृति मानती है कि आमूलचूल परिवर्तन बाहरी नहीं आंतरिक होता है और शासन का नहीं चेतना का होता है। काम जब राम बन जाता है,क्रोध जब करुणा बन जाती है, लोभ जब दान बन जाता है और मोह जब त्याग बन जाता है तो वास्तविक क्रांति होती है-


'जो अंतर की आग अधर पर आकर वही पराग बन गई


अवचेतन में छिपी घृणा ही चेतन का अनुराग बन गई


स्व की चरमासक्ति स्वयं से छलकर परम विराग बन गई


सप्तम स्वर तक पहुंच भैरवी कोमल राग विहाग बन गई।'


जब तक व्यक्ति नहीं बदलता तब तक तंत्र का नाम बदलने से तंत्र का चरित्र नहीं बदलता। राजतंत्र में भी राम जैसे राजा हुए और लोकतंत्र में भी हिटलर जैसा तानाशाह हुआ। आज भी लोकतंत्र का प्रहरी स्वयं को बताने वाला अमेरिका वेनेजुएला को हड़प लेता है क्योंकि व्यक्ति की आंतरिक चेतना लोकतांत्रिक नहीं है ; वह आंतरिक चेतना तो काम, क्रोध,लोभ,मोह से भरी हुई है।


अतः भारतीय ज्ञान परंपरा मानती है कि वास्तविक परिवर्तन आंतरिक होता है और क्रमिक होता है जिसको संक्रांति कहते है। मकर संक्रांति का अभिप्राय है कि व्यक्ति की चेतना ऊपर की ओर उठने लगती है जो इंसान को भगवान बनाने के रास्ते पर ले जाती है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹