शौर्य और संवेदना का अद्भुत संयोग
January 16, 2026🙏सेना दिवस पर शहीद लांस नायक प्रदीप कुमार की वीर माता 'राम स्नेही' सेनाध्यक्ष से मेडल लेते समय बेहोश हो गईं। शौर्य और संवेदना के इस मिलन का अनुभवसिक्त विश्लेषण 🙏
संवाद
'शौर्य और संवेदना का अद्भुत संयोग'
आज समाचारपत्र के मुखपृष्ठ पर सेना के शौर्य के साथ मां की संवेदना की खबर को देखकर मेरा मन वहीं ठिठक गया। मुझे अपने सैनिक पिता के पराक्रम की याद आई,साथ ही ममतामयी मातृ-हृदय की भी याद आई। जयपुर में लोगों के जुनून के बीच देश के लिए जान देने वाले पांच जवानों के परिजन 15 जनवरी को जब सेना दिवस के अवसर पर सेना-अध्यक्ष से मेडल ले रहे थे तब शहीद लांस नायक प्रदीप कुमार की मां 'राम स्नेही' मेडल लेते समय बेहोश हो गईं। वीर रस और करुण रस के मिलन के इस दृश्य ने ऐसा झकझोरा कि भावना का भार पदक के सम्मान पर भारी पड़ गया। कहने को तो परिवार से एक ने देश के लिए जान दी किंतु परिवार के परिजनों ने जान रहते हुए भी कितनी बार जान दी इसकी अभिव्यक्ति वीर माता की बेहोशी में होती है।
जब मेरे सैनिक पिता युद्ध के लिए घर से निकलते थे तो पूजा-पाठ,व्रत-उपवास घर में शुरू हो जाता था क्योंकि युद्ध स्थल पर जाने की घटना तो सहज सुलभ थी किंतु युद्ध स्थल से लौटने की घटना बहुत दुर्लभ थी।भारत का चीन के साथ 1962 का युद्ध हो या पाकिस्तान के साथ 1965 या 1971 का युद्ध हो; उस समय युद्ध में इतने सैनिक मारे जाते थे कि अगल-बगल के गांव में किसी सैनिक के शहीद होने की खबर के साथ ही मेरे घर में भी आशंका के बादल मंडराने लगते थे। चिंताएं बहुत बढ़ जाने पर रामचरितमानस की पंक्ति-"होईहि सोई जो राम रचि राखा,को करि तर्क बढ़ावै साखा"- को लोग जपना शुरू कर देते थे अथवा महामृत्युंजय जाप शुरू हो जाता था। हर युद्ध के बाद जब पिता घर सकुशल लौट आते तो लोग कहते कि इनका नाम रामदेव हैं,अतः राम की इन पर कृपा बनी हुई हैं।मेरे मन में आज यह विचार उठ रहा है कि फिर वीर माता "राम स्नेही" पर यह कृपा क्यों नहीं हुई?
राष्ट्र की रक्षा के यज्ञ में अपने प्राणों की बलि देने वाले वीर लांस नायक प्रदीप की वीर माता के लिए 'बेहोश होना' कहना भी चिकित्सकीय शब्द है। अध्यात्म की दृष्टि से यह चेतना का परम चेतना की खोज है। मां ने जिस बेटे को जन्म दिया और उसे पाल पोसकर देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर भेज दिया तो उस समय भी मां राम स्नेही की चेतना में पुत्र प्रदीप ही प्रदीप दिखता होगा। आज जब वह दुनिया में नहीं रहा और उसके बलिदान का सम्मान मेडल के रूप में मां के सामने आया तो मां की चेतना अपने पुत्र प्रदीप की चेतना के पास पहुंच गई-
'मेडल हाथ में था किंतु वो निगाह में था
मां क्या करती,मन तो पनहगाह में था।'
कई बार रामकृष्ण परमहंस बाजार से गुजरते समय मां काली या राम राम का नाम किसी के मुख से सुनते ही बेहोश हो जाते थे और बहुत समय के बाद उनकी चेतना वापस लौटती थी।
वीरमाता के शून्य भाव दशा में जाने की घटना ने शासन और समाज में बढ़ती संवेदनशून्यता की भी मुझे याद दिलाई। मेरे सैनिक पिता अपनी बढ़ी हुई पेंशन की राशि को प्राप्त करने के लिए कई ऑफिस के चक्कर लगाते रहे और दिल्ली दरबार तक गुहार लगाते रहे फिर भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। सिर्फ सम्मान समारोह में मेडल दिया जाना ही सैनिक का पूरा सम्मान नहीं है।जिस राष्ट्र के लिए उसने अपने प्राणों का बलिदान किया है,उस राष्ट्र की जिम्मेवारी बनती है कि उसके पारिवारिक दायित्वों को भी उठाए। मां के सपनों को पूरा करने के लिए एक सैनिक मातृभूमि की सेवा में जब अपना सर्वस्व लुटा सकता है तो उसके अधूरे सपने को पूरा करने के लिए शासन और समाज भी अपना कुछ विशेष क्यूं नहीं लुटा सकता-
"मां ने अपने हिस्से की रोटियां जो मुझे खिलाई थीं
उसी ने मुझे सीमा पर लड़ने की हिम्मत दिलाई थीं।"
ऐ मां तुझे सलाम!!!
"शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹