🙏इंसान को तराशने वाले शिक्षक को जब श्वान तलाशने में लगा दिया जाए तो इस निर्णय की भूरी-भूरी प्रशंसा होनी चाहिए 🙏


संवाद


'श्वान और शिक्षक'


गैर शैक्षिक कार्यों के बोझ तले दबे शिक्षकों को जब लावारिस श्वानों की टोह लेने के काम में लगाने का आदेश आया तब से एक मुहावरा-'धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का' फिज़ाओं में गूंजने लगा है‌। इंसान को तराशने वाला शिक्षक श्वान को तलाशने लगेगा ; यह कभी भारत के मनीषियों ने न सोचा था। किंतु आधुनिक नेतृत्व दृष्टि और प्रशासकीय दृष्टि ने भारत को विश्वगुरु बनाने का संकल्प ले लिया है। अब शिक्षाविदों की जिम्मेदारी बनती है कि इस महान संकल्प को पूरा करने के लिए अपना बहुमूल्य सुझाव दें ताकि रही सही कसर पूरी हो जाए।


शिक्षकों पर इतने काम लाद दिए गए हैं कि न तो वे शिक्षालय में विद्यार्थियों को पढ़ा पा रहे हैं और न गृहस्थाश्रम की जिम्मेदारियों को निभा पा रहे है। ऐसे में उन्हें चिंतन-मनन छोड़ देना चाहिए और जो भी काम दिया जाए उसे पूरा डूबकर मनोयोगपूर्वक करना चाहिए। श्वानों की टोह लेते समय उनके रंगों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि काले,पीले,भूरे,चितकबरे कई प्रकार के श्वान होते हैं। उनके रंगों का अध्ययन करने से शिक्षकों के बेरंग जीवन में कुछ रंगीनियत पैदा हो जाएगी। फिर उन्हें यह भी अध्ययन करना चाहिए कि श्वानों की दुनिया में लिंगानुपात कहीं गड़बड़ा तो नहीं गया है। इंसानों की तरह उनमें लव जिहाद की कहीं शुरुआत तो नहीं हो गई है। श्वानों के दांपत्य जीवन पर कहीं इंसानों के दांपत्य जीवन की छाप तो नहीं पड़ गई है। लिव इन रिलेशन पर पाबंदी के लिए वहां पर कोई नियम तो नहीं बनाया जा रहा है। इससे शिक्षकों के जीवन में कुछ सरसता आएगी। अन्यथा सूखी सूचनाओं को जुटाते-जुटाते और भेजते-भेजते शिक्षकों का जीवन सूखा हो गया है।


इस सूखापन से जीवन की हरियाली की ओर कदम बढ़ाने के लिए शिक्षकों को डॉग-लवर्स और श्वानों के बीच के संबंध का भी गहरा अध्ययन करना चाहिए। आखिर ऐसी क्या बात है कि जो इंसानों से बच रहा है वो श्वानों के प्यार में पागल होता जा रहा है। इससे एक ओर मानवेत्तर संबंधों की समझ बढ़ेगी दूसरी ओर सामाजिक विषमता को भी कम करने की दिशा में कुछ सार्थक सुझाव उभर कर आएगा क्योंकि राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा है कि


'श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र,भूखे बालक अकुलाते हैं


मां की हड्डी से लिपट ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं


युवती की लज्जा वसन बेच जब ब्याज चुकाए जाते हैं


मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी सा द्रव्य बहाते हैं।'


श्वानों से जुड़कर इंसानी जीवन के लिए कुछ नया संदेश भी मिल सकता है क्योंकि हमने सुना है कि अब कुत्ते आपस में लड़ते नहीं है। कारण पता चला है कि आदमी के नेताओं को देखकर वे अब लड़ने में शर्माने लगे हैं-


'एक जगह पर कुछ कुत्ते बड़ी शांति के साथ जूठन खा रहे थे


न एक दूसरे पर भौंक रहे थे और न आपस में गुर्रा रहे थे


आश्चर्यचकित होकर मैंने पूछा- आप लोग आपस में लड़ते क्यों नहीं, एक दूसरे पर झपटते क्यों नहीं


कुत्तों का नेता बोला-अब हमलोग आपस में नहीं लड़ते, एक दूसरे पर नहीं झपटते


क्योंकि हम शर्म के मारे हैं,इस कला में आदमी के नेताओं से बुरी तरह हारे हैं।'


श्वानों की टोह लेने के कार्य के बाद शिक्षकों को गधों और ऊंटों की भी टोह लेनी चाहिए। इसके लिए उन्हें श्वान कार्य करते समय स्वेच्छा से आवेदनपत्र प्रेषित करना चाहिए कि श्रीमान्!श्वान वाले कार्य सौंपने की आपकी दूरदृष्टि से भावी भारत की हमें झलक मिल गई,अतः हम सभी अपने बेरंग बेरस जीवन में अब गधों और ऊंटों से भी जुड़ना चाहते हैं क्योंकि हम सभी ने सुन रखा है कि गधे और ऊंट एक दूसरे का गजब हौंसला अफजाई करते हैं-


'उष्ट्राणां च विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभा:


परस्परं प्रशंसन्ति,अहो रुपम्! अहो ध्वनि:!'


अर्थात् ऊंटों के विवाह मे गधे गाना गा रहे हैं। दोनो एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं वाह क्या रुप है(ऊंट का), वाह क्या राग है (गधे की)।


हम सब भी उनसे कहां कम हैं। एक तरफ शिक्षण कार्य से शिक्षकों को दूर करते जा रहे हैं और दूसरी तरफ शिक्षकों की महिमा और शिक्षा की प्रगति के गीत भी गाते जा रहे हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹