शिक्षक का वास्तविक सम्मान
January 23, 2026🙏बसंत पंचमी का शुभ दिन मां सरस्वती की आराधना में व्यतीत होना चाहिए था किंतु एक द्वंद्व में बीता कि शिक्षक का वास्तविक सम्मान किसमें है और वास्तविक सरस्वती पूजा क्या है?🙏
संवाद
'शिक्षक का वास्तविक सम्मान'
'शिक्षकों के सम्मान के लिए एक विशेष कार्यक्रम रखा गया है, कृपया आप पधारें!-एक समाचारपत्र कार्यालय से फोन आया।कॉलेज से कुछ आचार्यों को सम्मान के लिए निमंत्रित किया गया था। शिष्टाचारवश निमंत्रण स्वीकार करते हुए मैंने उनको धन्यवाद कह दिया। उसके साथ ही एक द्वंद्व की शुरुआत हो गई। क्योंकि गैर शैक्षिक कार्यों के बोझ तले दबे हर शिक्षक की आत्मा आज कराह रही है। इंसान को तराशने वाले शिक्षकों को श्वान को तलाशने के काम में लगाने का जब से आदेश आया है तब से शिक्षक अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा है-
'जो बांटता फिरता था दुनिया को उजाले
उसके दामन में आज अंधेरे किसने डाले??'
खासकर सरकारी शिक्षालयों से विद्यार्थी और अभिभावक का मोह भंग होना एक ऐसा प्रश्न है जिसने समाज की निर्धन प्रतिभाओं को असहाय छोड़ दिया है। फिर किसी एकलव्य को द्रोणाचार्य लौटाएंगे और फिर किसी कर्ण से गुरु परशुराम ब्रह्मास्त्र की दी हुई शिक्षा वापस ले लेंगे। जबकि...
'कुसुम मात्र खिलते नहीं राजाओं के उपवन में
अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुंज कानन में
कौन जाने रहस्य प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल
गुदड़ी में रखती चुन चुन कर बड़े कीमती लाल।'
शिक्षालयों की संख्या बढ़ना तो शुभ संकेत होना चाहिए था किंतु निजी शिक्षालयों की संख्या जितनी बढ़ रही है, सरकारी शिक्षालयों की हालत उतनी ही खराब होती जा रही है। आखिर क्या ऐसा हो रहा है कि कठिन प्रतियोगिता परीक्षा में अपनी योग्यता को साबित करने वाले सरकारी- शिक्षकों की प्रतिभा समाज की निर्धन प्रतिभाओं को अपने पास आकर्षित नहीं कर पा रही हैं जबकि सरकार कई प्रकार की सुविधाएं भी बढ़ाती चली जा रही हैं?
मेरे लाख समझाने के बावजूद मेरे घर में काम करने वाली बाई जी भी अपने घर के बच्चों को सरकारी शिक्षालय में नहीं भेजना चाहती हैं क्योंकि उनकी नजर में वहां पढ़ाई के अलावा और सारा काम होता है। वे कर्ज लेकर भी अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए निजी शिक्षालय में भेज रही हैं। मानो सरकारी शिक्षालय भविष्य बिगाड़ने का काम करता हो। यदि ऐसी धारणा सरकारी शिक्षालयों और शिक्षकों की बनी है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?दुष्यंत साब कहते हैं-
'इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म है
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
आंकड़े कुछ और कहते हैं,असलियत कुछ और है।शिक्षालयों की छतें ही नहीं जर्जर हैं, शिक्षालयों की नींव भी खोखली हो चुकी हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया गया है जो शिक्षकों,विद्यार्थियों,अभिभावकों से और समाज के हितधारकों से शिक्षा संस्थानों में बढ़ते जा रहे अवसाद और आत्महत्या को रोकने के लिए सुझाव मांग रहा है।
'मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं
बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।'
जिस ज्ञान प्रधान संस्कृति वाला भारत का शिक्षक सच बोलने के लिए जाना जाता था,आज मौन रहने के लिए जाना जाता है। किंतु मां सरस्वती की पूजा करते हुए बसंत पंचमी के दिन मेरी आंखों को शिक्षा जगत में बसंत के दर्शन नहीं हो रहे हैं, मुझे तो मुरझाए हुए और झूलसते जा रहे पौधे दिखाई दे रहे हैं। नहीं पता कुछ लोगों को किन आंखों से हरियाली के दर्शन हो रहे हैं-
'पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है
उनकी नजर में अब भी चमन है हरा हरा
माथे पे रखकर हाथ बहुत सोचते हो आप
गंगा कसम बताओ आखिर क्या है माजरा?'
दिग्भ्रमित विद्यार्थियों को देखकर मुझे तो भविष्य बहुत डरावना लग रहा है। आज एक छात्रा का फोन मेरे पास आया कि संस्कृत का सिलेबस क्या है: द्वितीय वर्ष में संस्कृत नाटक पढ़ना है या ज्योतिष क्योंकि ऑनलाइन सिलेबस में ज्योतिष दिखा रहा है ? छात्रा पढ़ने में तेज थी किंतु इस साल थोड़े पैसे के लिए स्कूल में पढ़ाने लगी और कॉलेज आना छोड़ दिया जबकि मैंने विद्यार्थियों को संस्कृत नाटक अच्छी प्रकार से पढ़ाया। मैंने पूछा कि परीक्षा कब है? छात्रा का जवाब था-आज ही परीक्षा है। मैं आश्चर्य में पड़ गया कि विद्यार्थी परीक्षा के दिन भी पाठ्यक्रम को लेकर शिक्षक से जानकारी मांग रहे हैं , वे क्लास में नहीं आ रहे हैं। ऐसे में वे परीक्षा में क्या लिखेंगे?
मैंने मां सरस्वती से प्रार्थना की कि कुछ ऐसा करो कि हमारे विद्यार्थी क्लास में लौटने लगें। क्योंकि विद्यार्थी के बिना शिक्षक और शिक्षक के बिना विद्यार्थी ठीक वैसे ही हो जाते हैं जैसे आत्मा के बिना शरीर-
'बेरुह अपना जिस्म लिए फिर रहा हूं मैं
गफलत की कितनी सख़्त सजा दे गया कोई
मुझको जरा पहुंचने में ताख़ीर हो गई
मंदिर से मूरती ही उठा ले गया कोई।'
ऐसी स्थिति में एक तरफ शिक्षकों को सम्मानित करनेवाले को 'ना' कहना शिष्टाचार नहीं है किंतु दूसरी तरफ शिक्षक सम्मान लेने के लिए जाना हृदय को स्वीकार नहीं है। सरस्वती पूजा का दिन इसी उधेड़बुन में व्यतीत हुआ। फिर एक विचार आया कि शिक्षा जगत के सत्य को समाज के सामने लाने में और सरकार को असली हालत बताने में समाचारपत्र की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है तो क्यों न सम्मान ग्रहण करने के बदले अपनी पीड़ा को उनको बताऊं ताकि मां सरस्वती की आराधना सच्चे अर्थों में हो सके।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹