🙏गणतंत्र दिवस की शुभकामना : गणतंत्र दिवस सिर्फ झंडा फहराने का दिवस नहीं है बल्कि जिस संविधान को हमने 26 जनवरी 1950 को लागू किया था उसको गहराई से जानने का भी दिवस है-एक विश्लेषण🙏


संवाद


'गण और तंत्र भारतीय ज्ञान परंपरा में'


77 वां गणतंत्र दिवस एक अवसर है कि 'गण' और 'तंत्र' की शिक्षा-संस्कृति पर विचार किया जाए।राष्ट्रीय शिक्षा नीति2020 के द्वारा चल रहे अभिनव प्रयोग  कुछ लोगों के लिए आशंका के बादल हैं तो कुछ लोगों के लिए आशा का सूरज। मेरी दृष्टि में भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार 'गण' और 'तंत्र' दोनों को ढाला जा सका तो हमारा गणतंत्र गुणतंत्र में बदल सकता है।


भारतीय चिंतन में प्रजा और राजा दोनों को शिक्षित-संस्कारित करने हेतु गुरुकुल और कुलगुरु की परंपरा थी। उस समय राजतंत्र था,अतः राजा को धर्म के अनुसार शासन करने की शिक्षा दी जाती थी क्योंकि राजा के धार्मिक होने पर प्रजा भी धार्मिक होती थी और राजा के पापी होने पर प्रजा भी पाप में लिप्त हो जाती थी-


'राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः।


राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः।।'


आज राजतंत्र की जगह लोकतंत्र का जमाना है,अतः 'जैसा राजा वैसी प्रजा' की उक्ति समीचीन नहीं है। आज जरूरत है शासित और शासक दोनों को शिक्षित-संस्कारित करने की। जब तक 'गण' और 'तंत्र' दोनों शिक्षित-संस्कारित नहीं होंगे तब तक गणतंत्र सफल नहीं हो सकता।


शिक्षा की दुर्दशा के कारण आज पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले के बीच दूरी बढ़ गई है जिसके कारण 'गण' दिग्भ्रमित है और 'तंत्र' बिना दार्शनिक मार्गदर्शन के निरंकुशता की ओर अग्रसर है। गुरुकुल और कुलगुरु की परंपरा को सही अर्थों में आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित किया जाए तो 'गण' जाग्रत होगा और 'तंत्र' उत्तरदायी बनेगा। राष्ट्रीय पर्व संविधान के गहन अध्ययन का एक अवसर बनेगा तब संविधान के आलोक में नागरिक- भीड़ नहीं 'गण' बनेगा और सत्ता सिंहासन से उतरकर सेवा की ओर उन्मुख होगी।


आज 'गण' राजनीति के लिए मतदाता मात्र बनता जा रहा है जिसके मत को प्रचार के आधार पर प्रभावित किया जा सकता है और जिसके वोट को प्रलोभन  के आधार पर खरीदा जा सकता है। सम्यक्-शिक्षा से वही 'गण' विचार,विवेक और उत्तरदायित्व का जीवंत स्वर बन सकता है जिसके पास तंत्र से प्रश्न पूछने की प्रतिभा होगी और तंत्र को उत्तरदायी बनाने की कला आएगी।


कुलगुरु के सान्निध्य से तंत्र की शक्ति शांति की छाया में काम करेगी। तब शासन डंडे से नहीं संविधान से चलेगा, तब पक्षपात नहीं बल्कि निष्पक्ष न्याय होगा। शासक से शासित भयभीत नहीं, संरक्षित होगा।


भारत की विकास यात्रा इस बात का प्रमाण है कि भारत के कुछ गणों ने अपनी प्रतिभा से भारत ही नहीं विश्व को भी अपना अमूल्य योगदान दिया है और कुछ तंत्र ने भी लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा को आगे बढ़ाया है। किंतु जहां 80 करोड़ 'गणों' को 5 किलो अनाज का मोहताज होना पड़ता हो और जहां 'तंत्र' पर परिवारवाद का आरोप लगता हो वहां सब कुछ सही नहीं माना जा सकता।


गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से 'गण' सम्मानपूर्ण जीवन का और स्वतंत्रता का अधिकारी बनेगा। एक गण का सम्मानपूर्ण जीवन दूसरे गण के सम्मानपूर्ण जीवन की कामना करेगा और एक गण की स्वतंत्रता दूसरे गण की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करेगा।


यदि राजधर्म बताने वाला कोई कुलगुरु हो तो 'तंत्र' शक्तिशाली की ओर झुकेगा नहीं बल्कि कमजोर को विशेष सुरक्षा देगा। शासक गोपनीयता को नहीं पारदर्शिता को तरजीह देगा। प्रश्न पूछने और आलोचना करने वाले को डराएगा नहीं बल्कि प्रोत्साहित करेगा।


भारतीय ज्ञान परंपरा में 'गण' और 'तंत्र' का संबंध परस्पर-विरोध का नहीं बल्कि परस्पर-पूरकता का है। 'गण' वह नदी है जो बहती है, 'तंत्र' वह तट है जो दिशा देता है। यदि नदी उन्मत्त हो तो तट टूट जाता है, यदि तट बहुत कठोर क्रूर हो तो नदी का प्रवाह रुक जाता है।


गणतंत्र सिर्फ झंडा फहराने और सलामी लेने मात्र का दिन नहीं है बल्कि संविधान को गहराई से देखने और आत्ममंथन का भी दिन है। गणतंत्र में सत्ता का स्रोत जनता है किंतु 'गण' और 'तंत्र' दोनों को मर्यादा में रखने वाला संविधान है। 26 जनवरी 1950 को जिस संविधान को लागू किया गया था,उस संविधान के बारे में हमारे गण और तंत्र कितना परिचित है और अपने जीवन में कितना अपनाते हैं,इस पर गणतंत्र की सफलता निर्भर करती है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹