🙏मृतात्माओं के प्रति श्रद्धांजलि:विमान हादसे में श्री अजीत पवार की हुई मृत्यु ने आसमान में उड़ने वालों को एक संदेश भेजा है🙏


संवाद


'मृत्यु अटल सत्य'


मृत्यु किसी की भी हो,अपनी मृत्यु की भी याद दिला देती है। श्री अजीत पवार की विमान हादसे में हुई मृत्यु पर मीडिया कवरेज को देखकर कई विचार मन में उठने लगे। असामायिक,अकस्मात्,अनहोनी जैसे विशेषणों को मृत्यु के साथ जोड़कर लोग अपनी संवेदना प्रकट कर रहे थे और उन पर आरोप लगाने वाले चिर प्रतिद्वंद्वी भी उनके गुणों का बखान कर रहे थे।


मृत्यु जब भी आए उसे हम 'असामयिक' ही मानते हैं, कितनी भी चेतावनी देकर आए उसे हम 'अकस्मात्' ही बताते हैं और हर दिन हर जगह इस मृत्यु को घटित होते हुए देखते हैं फिर भी उसे 'अनहोनी' ही कहते हैं। जिस व्यक्ति को जीते जी कभी भी हमने अपना नहीं कहा, उसकी मृत्यु होते ही उसे अपना बताने लगते हैं।


मृत्यु तो विमान में बैठे सभी की हो गई ,एक साथ एक तरीके से हुई फिर भी एक की मृत्यु बहुत विशेष दिखाई देती हैं। अजीत दादा के साथ कितने सपने कितने अरमान कितने लोगों के जुड़े हुए थे, उन्हीं के आंखों के आंसू मीडिया चैनल पर दिखाई दे रहे थे ; लेकिन मृत्यु बहुत साम्यवादी है, वह विशेष और आम में कोई भेद नहीं करती। जगत की दृष्टि में मृत्यु असाधारण और साधारण हो सकती है किंतु अस्तित्व के दृष्टि में वह एक समान है।


जन्म लेते ही जो सबसे निश्चित बात होती है वह मृत्यु होती है। इस निश्चित मृत्यु को हम जितना भुलाने का प्रयास करते हैं वह उतना ही ज्यादा याद आने लगती है। शहर के बाहर एकांत कोने में मरघट बनाते हैं फिर भी किसी विशेष व्यक्ति की मृत्यु बनकर वह मीडिया चैनल और अखबार के माध्यम से हमारे सामने अपने आपको प्रभावी रुप से प्रकट कर देती है।


कितनी भी ज्ञान की बातें करें किंतु मृत्यु का भय मन से मिटता नहीं। उस मृत्यु के भय को मिटाने के लिए हम जीवन को बहुत बड़ा और उसके कृत्यों को अमर बताने लगते हैं। इस रुप में मृत्यु का मैं बड़ा उपकार मानता हूं क्योंकि कितनी भी जीवन में बुराइयां हो, श्रद्धांजलि में लोग अच्छाई ही चुन-चुनकर बोलते हैं।


यूं तो मृत्यु सब कुछ मिटा देती है लेकिन धर्म का जन्म मृत्यु के कारण ही हुआ होगा, मुझे ऐसा लगता है।युवा महोत्सव में जा रहे राजकुमार गौतम ने भी जब मरे हुए व्यक्ति को देखा तो सारथी से पूछा कि यह क्या है? राजा शुद्धोधन ने सारथी को मना कर रखा था कि कोई ऐसी बात राजकुमार गौतम को मत बताना जिससे उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हो। किंतु राजकुमार की जिद के आगे सारथी सत्य बोल बैठा। उसी समय राजकुमार गौतम ने युवा महोत्सव में जाने का विचार छोड़ दिया और उसी रात सत्य की खोज में राजमहल छोड़कर निकल गए-


'राग न जो दिल में हमारे होता


फिर किसी साज में रागिनी नहीं होती


मौत होती न सच्चाई जो अटल दुनिया की


जिंदगी बुद्ध सी संन्यासिनी नहीं होती।'


दूसरे की भी मृत्यु को देखकर जिसमें वैराग्य जन्म ले ले, उसको ओशो बुद्धत्व का लक्षण मानते हैं। लेकिन मीडिया चैनल पर अजीत दादा के उत्तराधिकारी की चर्चा हो रही थी क्योंकि हम तो इतने बुद्धू है कि वैराग्य के क्षण में भी राग और राज के अवसर तलाशते हैं।


राजनीति ऐसी ही चीज है जो आपदा में भी अवसर देखती है। पश्चिमी संस्कृति में राजनीति को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया। राजनीति का पिता कहे जानेवाले मैकियावेली ने यह सिद्धांत दिया कि राजनीति में सत्ता के अतिरिक्त कोई अपना नहीं है।लेकिन भारतीय संस्कृति ने सबसे ज्यादा महत्व धर्म को दिया और राजा के लिए भी राजधर्म का पालन अनिवार्य किया। इसीलिए धार्मिक द्वारा दिए गए 'सत्यमेव जयते' सिद्धांत को राजनीति ने अपना राष्ट्रीय वाक्य मान लिया और संसद के मुख्य द्वार पर लगा दिया।


अधिकांश लोग जानते हैं कि 'सत्य की जीत होती हैं' लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि वह जीत मृत्यु की है क्योंकि जीवन को गहराई से जानने वाले श्री कृष्ण ने मृत्यु को अटल सत्य कहा-


'जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:'अर्थात् जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अटल है‌। 


इसीलिए हमारी संस्कृति में जन्म को देने वाले ब्रह्मा और पालन करने वाले विष्णु को 'देव' कहा जाता है किंतु संहार करने वाले शंकर को 'महादेव' कहा जाता है। भारत में जन्म देने वाले ब्रह्मा का तो मंदिर एक या दो जगह पर मिलता है किंतु यहां तो कंकर कंकर शंकर है।


फिर भी मृत्यु हमें असामायिक,अकस्मात् और अनहोनी लगती हैं क्योंकि हमारी इच्छाएं कभी भी पूरी नहीं हो सकतीं-


'इच्छा का ही रहट चल रहा हर पनघट पर


किसी की प्यास नहीं बुझती है इस तट पर।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹