🙏भेदभाव रोकने हेतु लाए गए यूजीसी के नये नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। अपनी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जातिविहीन समाज के निर्माण की ओर कदम बढ़ाना है न कि जातिगत पहचान को मजबूत करने की ओर।


जातिविहीन समाज के निर्माण की दिशा में यूजीसी का ध्येय-वाक्य 'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' जो संदेश दे रहा है वही संदेश आज सुप्रीम कोर्ट ने दिया है:एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'ज्ञान पर नहीं,पहचान पर ध्यान'


उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता और समानता सुनिश्चित करना यूजीसी का मुख्य उद्देश्य है। भेदभाव से निपटने के लिए 13 जनवरी 2026 को यूजीसी द्वारा जो नियम लाया गया है, उसको सामान्य वर्ग अपने लिए खतरा मान रहा है। चूंकि झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए यह आशंका है कि शिकायतों की बाढ़ आ जाएगी और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष के परिणामस्वरूप निर्दोषों का कैरियर बर्बाद हो सकता है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम पर रोक लगाते हुए चिंता जाहिर की कि यूजीसी का काम जातिविहीन समाज की ओर कदम बढ़ाने वाले नियम बनाना है, फिर यह जाति विभेद बढ़ाने वाला नियम कैसे बना दिया गया-


'फिर रहा है आदमी भूला हुआ भटका हुआ


एक न एक लेबल हर एक माथे पर है लटका हुआ


आखिर इंसान तंग सांचों में ढला जाता है क्यों?


आदमी कहते हुए अपने को शरमाता है क्यों??'


इस नियम के पक्ष में और विपक्ष में छात्रों का प्रदर्शन यह सिद्ध करता है कि नियम में अस्पष्टता और आशंका है। किसी भी नियम को सार्वजनिक करने से पहले उस पर होने वाली प्रतिक्रिया का आकलन कर लेना चाहिए।


                   खासकर उस यूजीसी संस्था को जिसका ध्येय-वाक्य है-'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये'.जिसका अर्थ है कि ज्ञान और विज्ञान मुक्ति के लिए है। लेकिन समानता को सुनिश्चित करने के लिए जो नया नियम लाया गया है, उसने उच्च शिक्षा संस्थानों को मुक्ति की जगह बंधन में डाल दिया ; यह कैसा ज्ञान-विज्ञान है? पहले भी कई प्रकार के एक्ट भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए ; किंतु उनका दुरुपयोग ज्यादा देखने को मिला। उनसे भेदभाव रोकने में कितनी सफलता मिली यह पता नहीं लेकिन नई रिपोर्ट कहती है कि भेदभाव और ज्यादा बढ़ गया है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि समस्या कहीं और है और समाधान कहीं और तलाशा जा रहा है-


'उन्हें बचाया क्रूर बाज से उस दिन मैं गुमनाम रहा


फटा दुपट्टा जिस दिन उनका उस दिन मैं बदनाम हुआ


जब तक दवा कराई तब तक घावों ने विस्तार किया


वैद्य बुलाना बंद किया तो थोड़ा सा आराम हुआ।'


             वस्तुस्थिति यह है कि शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाए जाने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है ; इसके विपरीत नए-नए नियमों को लाकर पहले से ही गैर शैक्षिक कार्यों के बोझ तले दबे शिक्षकों को और उलझाया जा रहा है।अब कैंपस में इक्विटी स्क्वाड के रूप में शिक्षकों को चौकीदारी करते हुए घूमना होगा। किसी भी शिकायत पर पढ़ने-पढ़ाने का काम दरकिनार कर इक्विटी समिति का काम प्रमुखता से देखना होगा।


             विश्वविद्यालय में मैंने जब दाखिला लिया था तो प्रोफेसर क्लास में पढ़ाने के बाद अवकाश के क्षणों में विद्यार्थियों की शंकाओं का जवाब देते थे अथवा दूसरे क्लास के लिए तैयारी करते थे‌। उस समय शिक्षक-स्टाफ-रूम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श का केंद्र हुआ करता था। जब कभी भी अपने प्रश्न लेकर प्रोफेसर से स्टाफ रूम में या उनके घर पर मिलने गया तो कुछ न कुछ मार्गदर्शन अवश्य मिलता था।


                आज जब मैं स्वयं प्रोफेसर बन गया हूं तो देख रहा हूं कि अध्ययन-अध्यापन का काम तो गौण हो गया है और विभिन्न समितियों की सूचनाएं जुटाने और स्प्रेडशीट भरने के साथ परीक्षा कराने का काम मुख्य हो गया है। भेदभाव रोकने के लिए कानून बाहरी उपाय हैं,असली आंतरिक उपाय वह शिक्षा है जो क्लास में दी जाती है।


       'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' के ध्येय वाक्य वाले यूजीसी से ज्यादा इस बात को कौन जान सकता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों का शैक्षिक परिवेश मुक्तिदायी बने इसके लिए राजनीतिक हस्तक्षेप कम से कम हो और शैक्षिक स्वायत्तता अधिक से अधिक हो। मानव निर्माण करने वाले शिक्षक को ज्ञान और विज्ञान की आराधना करने का और बेहतर अवसर प्रदान किया जाए। विद्यार्थियों में ज्ञान विज्ञान के प्रति जिज्ञासा जगाने के लिए शिक्षकों को सूचना जुटाने के कार्य से मुक्त रखा जाए।


            'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' का मंत्र उन गुरुओं ने दिया था जो सामाजिक कोलाहल से दूर प्रकृति के एकांत वन में अपने शिष्यों के जीवन को ऊंचाइयां देने के लिए अहर्निश लगे रहते थे। आज विद्यार्थियों का संपर्क क्लास में भी अपने शिक्षकों के साथ नहीं हो रहा है तो चिंता इस बात की होनी चाहिए कि उनके मन का निर्माण कहां हो रहा है? 10% से कम विद्यार्थी शिक्षा संस्थान में क्लास में आते हों और 90% से ऊपर


परीक्षा देने पहुंच जाते हों और शत-प्रतिशत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर जाते हों तो इस डिग्री बांटने वाली शिक्षा पर यूजीसी का ध्यान क्यों नहीं जा रहा?


          गण को नागरिक बनाना शिक्षक की जिम्मेवारी है। उसके बाद वह किसी विचारधारा से प्रभावित होकर किसी दल से संबंध रख सकता है क्योंकि उसे सारी विचारधाराओं के बारे में अब पता है और जिसे वह बेहतर समझ रहा है उसको अपना सकता है। किंतु आज तो नागरिक-निर्माण के पहले मतदाता-निर्माण का प्रयास चल रहा है। धर्म,जाति,क्षेत्र,भाषा इत्यादि आधार पर बांटने वाली राजनीति यदि युवाओं के मन में पहले प्रवेश कर जाएगी तो 'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' का मंत्र मन में कैसे प्रवेश पाएगा?


                    भेदभाव को जड़-मूल से रोकना हो और 'ज्ञान विज्ञान  विमुक्तये' मंत्र को हर मन में बिठाना हो तो प्रतिभापूर्ण शिक्षक, जिज्ञासापूर्ण विद्यार्थी, ज्ञानपूर्ण क्लास और कौशलपूर्ण प्रशिक्षण पर यूजीसी को ध्यान देना चाहिए। आज हर क्लास में सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ है। जब प्रतियोगी परीक्षाओं की निगरानी उसके द्वारा हो सकती है तो उस क्लास की निगरानी इस नियामक संस्था द्वारा क्यों नहीं हो सकती जहां मानव निर्माण और राष्ट्र निर्माण का कार्य चल रहा हो? क्लास में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए और शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विशेष नियम क्यों नहीं लाया जा रहा?


          'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' ध्येय-वाक्य वाले यूजीसी से ज्यादा किसको पता होगा कि ज्ञान के कारण भारत विश्व गुरु बना था, उस ज्ञान-विज्ञान के साथ समझौता करना प्रतिभा के साथ अन्याय होगा-


'जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान


मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान‌।'


                    कबीर साहब के इस मंत्र को अपनाकर नवोदित राष्ट्र अमेरिका विश्व का सबसे विकसित राष्ट्र बन गया और इस मंत्र को ठुकराकर विश्व की सबसे प्राचीनतम और समृद्धतम संस्कृति वाला भारत आज अपनी ही प्रतिभाओं को अपने देश में नहीं रोक पा रहा है। प्रतिदिन 500 से अधिक भारतीय विदेशी-नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं। क्या उन्हें जननी और जन्मभूमि से प्रेम नहीं है? उन्हें जननी और जन्मभूमि से बहुत अधिक प्रेम है किंतु उससे भी ज्यादा उन्हें अपनी प्रतिभा के विकास का ख्याल है। प्रतिभा का बीज जब वृक्ष बन जाता है तो वह दूर से भी अपनी जननी और जन्मभूमि के लिए बहुत कुछ करने की स्थिति में हो जाता है।


         'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' का ध्येय-वाक्य मुक्ति रूपी साध्य को प्राप्त करने के लिए उस ज्ञान और विज्ञान रूपी साधन पर ध्यान देने के लिए कहता है जो इंसानी पहचान के अलावा बाकी सारी पहचान मिटाने पर जोर देता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹