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🙏भावभीनी श्रद्धांजलि:गांधी को गोली मारने वाले ने गांधीवाद को अमर बना दिया🙏


संवाद


'गांधी का जीवन ही उनका दर्शन'


मन वचन कर्म की एकता को भारतीय संस्कृति ने 'महात्मा' होने का आधार माना और गांधी को इसी ने मोहन से महात्मा बना दिया-


'मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्


मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्।'


आज राजनीति में मन,वचन और कर्म में कोई संबंध नहीं रहा फलत: जिस राजनीति को समस्याओं का समाधान करना था, वही राजनीति अपने आप में समस्या हो गई है। ऐसी स्थिति में गांधी और ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं।


गांधी ने जिन मूल्यों को आगे बढ़ाया,वे सार्वकालिक और सार्वदेशिक सनातन मूल्य हैं। 'सत्य प्रेम अहिंसा' ही मानवता को मुक्ति की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। दो विश्व युद्धों और निरंतर चल रहे स्थानीय युद्धों ने यह साबित कर दिया कि शक्ति से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। क्योंकि पराजित और भयभीत कॉम या राष्ट्र शक्ति अर्जित कर भयंकर बदला लेता है।


आज विश्व के पास विनाश के लिए बहुत ज्यादा अस्त्र-शस्त्र है किंतु विश्व के विकास के लिए सत्य प्रेम अहिंसा से ज्यादा शक्तिशाली कुछ नहीं है। इस रास्ते पर चलकर साधारण मोहन ने भारत को एकता के सूत्र में बांधा और सब की आत्मा में स्वतंत्रता का बीज बो दिया।


         आज हमारा शिक्षालय ही जातिगत विभाजन के संकट को झेल रहा है क्योंकि यूजीसी के 13 जनवरी 2026 के नियम के कारण जाति के आधार पर परस्पर अविश्वास इस कदर उग्र हुआ कि माननीय सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करनी पड़ी कि शिक्षा जातिविहीन समाज के निर्माण के लिए होनी चाहिए, न कि जाति भेद को बढ़ावा देने के लिए। जाति धर्म क्षेत्र भाषा इत्यादि किसी भी आधार पर भेदभाव को रोकना तब तक संभव नहीं है जब तक हम सभी यह नहीं मान लें कि हम सभी आत्मा परमात्मा के अंश हैं। गांधी को भारतीय ज्ञान परंपरा का यह मंत्र-'ईशावास्यमिदं सर्वं' बचपन में ही मिल गया था और अपने जीवन में इसका प्रयोग उन्होंने किया जिसके कारण भारत को सत्याग्रह का ऐसा सिद्धांत मिला कि अंग्रेजी सरकार की नींव हिल गई।


           आज भारत को एकता के सूत्र में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक शिक्षा द्वारा ही बांधा जा सकता है। यूजीसी का ध्येय वाक्य-'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' भी यही कहता है कि ज्ञान और विज्ञान के द्वारा हम जाति धर्म क्षेत्र भाषा इत्यादि बंधनों से मुक्त होते हैं। लेकिन राजनीति के कारण मुक्त करने वाले साधन को भी हम अपने लिए बंधनकारी बना लेते हैं।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास इसी उद्देश्य से किया जा रहा है कि हम विश्व नागरिक तैयार कर सकें जो सारी वसुधा को अपना कुटुंब मानते हों और सारी पृथ्वी को अपनी माता। जो पेड़-पौधों से लेकर पशु-पक्षियों के साथ सभी प्राणियों में अपनी आत्मा को देखता हो‌। भारतीय ज्ञान परंपरा का आदर्श जब जीवन में भारत ने उतारा था तब वह विश्व गुरु बना था आज हम उन आदर्शों से जितना दूर होंगे उतना ही दीन-हीन  हो जाएंगे।


भारतीय ज्ञान परंपरा के आदर्शों को जीवन में उतारने के लिए त्याग और तपस्या ही उपाय है। इन्हीं उपायों के द्वारा साधारण से मोहन में वह आत्मशक्ति आ गई कि वे समग्र विश्व के लिए महात्मा गांधी बन गए। गांधी का हम नाम बहुत लेते हैं किंतु गांधी का जीवन नहीं जीते हैं। गोडसे ने तो सिर्फ गांधी के तन को मारा किंतु हम सभी अनुयायियों ने तो गांधी के जीवन मूल्यों को मार डाला-


'गोडसे ने तो सिर्फ नश्वर शरीर को मारा


किंतु गांधीवाद को अमर कर दिया


गांधीवादियों ने तो सिर्फ खादी संवारा


और उन्हें पत्थरों में बेखबर कर दिया।


उनके अनुयायियों ने उनकी मूर्ति पर फूल और सिद्धांतों पर इतनी धूल चढ़ाई है


आत्मा रोती है उनकी और पुनः पैदा न लेने की बापू ने कसम खाई है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹