राजरोग बढ़ाने वाला राजयोग
February 1, 2026🙏महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री का शपथ-ग्रहण: तीये की बैठक भी नहीं हुई कि आंसुओं से भरे ताज के लिए शोकविह्वला पत्नी ने शपथ ग्रहण कर लिया। आखिर कैसी राजनीति है जो आंख के आंसू को सूखने भी नहीं देती; एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण🙏
संवाद
'राजरोग बढ़ाने वाला राजयोग'
राजनीति की चकाचौंध सबको दिखाई देती है किंतु उसके पीछे छिपा अंधियारा किसी किसी को।राजनीतिज्ञों की अमीरी के पीछे कितनी बड़ी गरीबी छिपी हुई है, इसके साक्षात् दर्शन का अवसर बहुत कम मिलता है। पति की अकाल मृत्यु और वह भी बहुत दर्दनाक मृत्यु जिसमें जलकर सब कुछ खत्म हो गया, उस पति के तीये की बैठक भी पूरी नहीं हुई ; उसके पहले शोक विगलित दिवंगत श्री अजीत पवार जी की पत्नी श्रीमती सुनेत्रा पवार जी का महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले लेना राजनीतिक जीवन की हृदयहीनता और मजबूरी को दर्शाता है।
रहस्यदर्शी ओशो का कहना है कि तीन दिन तक आत्मा इर्द-गिर्द घूमती है और उस आत्मा को आश्चर्य होता है कि परिजन क्यूं रो रहे हैं? तीसरे दिन तीये की बैठक होती है जिसमें आत्मा अपने पूर्व शरीर रूपी आवास से अपने को अलग मानने लगती है। तब तक शोक संतप्त परिवार बिछुड़ने वाली आत्मा को छोड़ना नहीं चाहता और वह आत्मा भी अपनों का रोना-धोना देखकर पीड़ित होती रहती है।
करुणा का भाव सबसे गहरा भाव होता है। एक हृदय प्रधान स्त्री के लिए तो जीवनसाथी का बिछड़ना उसे इतने गहरे शोक में डाल देता है कि उसे जगत दिखाई नहीं देता, क्योंकि उसकी आंखें आंसुओं से भरी होती हैं पर मजबूरी में वह जिधर भी नजर उठाती है उसे अपना पति ही दिखाई देता है। इस भाव को भी राजनीतिक-इंसान पूरा जी नहीं पाता।
लोग कहते हैं कि राजयोग बहुत भाग्य से मिलता है किंतु बहुत कम को पता है कि एक रोग सिर्फ राजाओं को होता था जिससे ज्यादा दुर्भाग्यशाली रोग दूसरा नहीं;उस रोग का नाम है राजरोग। इसमें प्रियजन की मृत्यु पर हृदय फूट-फूट कर रोना चाहता है जो कि स्वाभाविक हैं किंतु लोगों को दिखाना है कि कितना बड़ा दुख भी राजा को डिगा नहीं पाता। फलत: एक विखंडित व्यक्तित्व (splitted personality) बनता है जो दिखाता कुछ और है,होता कुछ और है।
राजनीति चीज ही ऐसी है।राजनीतिज्ञ की आत्मा कुर्सी में बस जाती है। कुर्सी के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं। इसलिए कुर्सी खाली होते ही उस पर कब्जा कर लेने का संघर्ष शुरू हो जाता है। 'राजत्व रक्त संबंध नहीं जानता' (kingship knows no kinship) कहने वाले को यह कहना चाहिए था कि राजत्व सिर्फ सत्ता-संबंध जानता है। इसलिए राजत्व रक्तरंजित रहा है।
भारतीय संस्कृति की दृष्टि यह है कि राजनीति सेवा का माध्यम है, शक्ति का नहीं। इसीलिए राम इतनी आसानी से युवराज पद छोड़कर वन जाने के लिए तैयार हो गए और भरत प्राप्त राजगद्दी को भी ठुकराने के लिए तैयार हो गए। राम के नहीं मानने पर उनकी पादुका रखकर बनवास के वर्षों तक राजा भरत राज्य की सेवा करते रहे।
भारत की राजनीति रामराज की तो बात बहुत करती है किंतु उसमें वैसा त्याग और लोककल्याण की भावना नहीं है। अंदर में तो लोभ और भय भरा होता है और बाहर में त्याग और सेवा का प्रदर्शन भी करना होता है। फलत: सार्वजनिक मंच पर जो राजनीतिज्ञ नैतिकता और पारदर्शिता की बात करता है,वह निजी जीवन में अवसरवादिता और रहस्यमयता से भरा होता है।यह आत्मविसंगति एक असाध्य रोग को जन्म देती है। इसके कारण वह न तो किसी से प्रेम कर पाता है और न किसी पर विश्वास कर पाता है। प्रेम और शांति की जगह उसका जीवन प्रतियोगिता और भ्रांति से भर जाता है।
रिश्तों में दूरी, संवाद में कृत्रिमता और भावनाओं में संकोच स्पष्ट रुप से महाराष्ट्र के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार में देखा जा सकता है। निर्जीव सत्ता के लिए जीवंत भावनाओं की बलि चढ़ाने वाली राजनीति के सत्य को सामने लाना साहित्य की सबसे बड़ी सेवा है। ऐसी सत्ता संपत्ति नहीं विपत्ति है जहां अहंकार की बलिवेदी पर अपनी आत्मा के साथ आत्मीय-रिश्ते और आत्मीय-भावनाओं को भी न्योच्छावर कर दिया जाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹