🙏जाति का जहर तेजी से फैलाया जा रहा है।कोई शंकर चाहिए जो जहर को पी सके।वह शंकर सम्यक-शिक्षा है: एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'ज्ञान-विज्ञान विभक्तये या विमुक्तये'


'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' ध्येय-वाक्य वाले यूजीसी के 13 जनवरी 2026 के नियम ने भेदभाव को रोकने के बदले और बढ़ा दिया। सुप्रीम कोर्ट के स्टे और टिप्पणी के बावजूद समाज में जातिगत जहर फैलाया जा रहा है।


समुद्र मंथन के समय जो जहर निकला था उसे शंकर ने पी लिया और देव से महादेव बन गए।'शं करोति इति शंकर:'अर्थात् जो श्रेय करे वह शंकर। शिक्षा का काम यही है कि 'प्रेय'(प्रिय) की जगह हमें श्रेय (कल्याण) की ओर ले जाए।


             शिक्षा में गुणवत्ता,समानता और मानकीकरण सुनिश्चित करने के लिए यूजीसी है और उसका ध्येय वाक्य भी यही कहता है कि ज्ञान और विज्ञान मुक्ति के लिए है-'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' जबकि वास्तविकता यह है कि आज ज्ञान और विज्ञान नियुक्ति के लिए है-'ज्ञान विज्ञान नियुक्तये'. इससे भी बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि गंदी राजनीति इस ज्ञान विज्ञान का उपयोग विभाजन के लिए कर रही है-'ज्ञान विज्ञान विभक्तये'.


               ज्ञान-विज्ञान जब मुक्ति के लिए होता है तो हम श्रेय के रास्ते पर होते हैं ,जब ज्ञान-विज्ञान नियुक्ति के लिए होता है तो हम प्रेय के रास्ते पर होते हैं और जब ज्ञान-विज्ञान विभक्ति (division) के लिए होता है तो हम विनाश के रास्ते पर होते हैं। सीमित सरकारी पदों के लिए पूरे देश का माहौल खराब किया जा रहा है। 'एक अनार सौ बीमार' वाली कहावत अब 'एक अनार करोड़ बीमार' में तब्दील हो चुकी है। यूजीसी की अनदेखी की वजह से शिक्षालय योग्यता निर्माण केंद्र की जगह सिर्फ डिग्री बांटने वाले केंद्र के रूप में काम करते रहे। फलत: ऐसी डिग्रीधारी नई पीढ़ी के पास ज्ञान और विज्ञान नियुक्ति के लायक ही नहीं है तो मुक्ति के लायक क्या होगी।


                 फिर भी आशा की किरण यह है कि अपने ज्ञान और विज्ञान के बल पर भारत के कुछ युवाओं ने विश्व को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया है और बड़ी-बड़ी कंपनियों के बड़े-बड़े पदों पर पहुंच गए हैं। वे अपने ज्ञान और विज्ञान का प्रयोग दूसरों को भी अपने स्टार्टअप में नियुक्ति देने के बाद अब अपनी मुक्ति के लिए कर रहे हैं। वे प्रतिष्ठित कंपनियों की नौकरी छोड़कर दूरदराज के इलाकों में नए-नए स्टार्टअप खड़े कर रहे हैं और अपने जीवन को धर्म तथा अध्यात्म के रास्ते पर भी ले जा रहे हैं। इन युवाओं से सीखने की जरूरत है और इनसे नई पीढ़ी को जुड़ने की जरूरत है।


              लेकिन दुर्भाग्य यह है कि योग्यता के शिखर पर गए हुए इन लोगों की भी जाति उजागर की जा रही है। ज्ञानियों की और वैज्ञानिकों की जाति नहीं पूछी जाती, उनका ज्ञान और विज्ञान पूछा जाता है।


आज सभी का जीवन विज्ञान के अविष्कारों से इतना सुविधाजनक हो चुका है कि प्राचीन काल में राजाओं को भी इतनी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। राजाओं के पास भी गर्मी से निजात पाने के लिए ए.सी. नहीं थी, जरूर कुछ भृत्य होते थे जो पंखा झलते रहते थे। किंतु भृत्यों के पंखा झलने में गर्मी की डिग्री घटाई और बढ़ाई नहीं जा सकती। विज्ञान के आविष्कारों ने औरतों को घर के भारी कामकाज से मुक्त कर दिया और शिक्षालय तथा कार्यालय पहुंचने का वक्त दे दिया।विज्ञान से दी हुई मुक्ति को हम थोड़ा गौर से देखें तो आसानी से महसूस कर सकते हैं।


इसी प्रकार से कुछ लोगों को ज्ञान ने भी मुक्ति प्रदान की है। ओशो अपने आप को हिंदू,मुस्लिम,सिख,इसाई नहीं मानते थे और न ही किसी जाति का मानते थे ; वे अपने आप को आत्मा मानते थे। अपने आत्मज्ञान द्वारा उन्होंने स्वयं भी मुक्ति  पाई और दूसरों को भी मुक्ति का रास्ता दिखाया।'ज्ञान विज्ञान विमुक्तये' का अर्थ समझना हो तो ओशो जैसे ज्ञानियों को देखें और आइंस्टीन जैसे विज्ञानियों को देखें।


           ओशो ने स्पष्ट रूप से कहा कि राजनीति को पढ़ो ताकि राजनीति की चालों को समझ सको किंतु राजनीति मत करो क्योंकि राजनीति विभाजन पर टिकी होती है इसलिए बंधन में डालती है। राजनीति मनुष्य की सबसे निम्नतम प्रवृत्ति है जबकि ज्ञान-विज्ञान सबसे उत्तम प्रवृत्ति। उत्तम प्रवृत्ति वाला व्यक्ति राजनीति में आए तो वह राजनीति सेवा का माध्यम बन जाती है जैसे अब्दुल कलाम साहब ने राष्ट्रपति भवन को भी शिक्षालय बना दिया‌। आज हमारे शिक्षालय भी कार्यालय में तब्दील होते जा रहे हैं। आज हम सभी को यह सोचना होगा कि हमारा ज्ञान विज्ञान जो मुक्ति के लिए हुआ करता था, वह ज्ञान विज्ञान विभक्ति (division) के लिए क्यों कर इस्तेमाल हो रहा है?


'बांट देगी सियासत हमें खंडों में


गर शिक्षालय को कार्यालय बनाते रहे


विष पीने का जिनको सलीका न था


वे ही महादेव बनकर रास्ता दिखाते रहे।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹