पेड़ काटना समूल विनाश का प्रारंभ
February 6, 2026🙏खेजड़ी काटने पर ही नहीं बल्कि किसी भी पेड़ को काटने पर रोक लगे। हरे-भरे और बड़े पेड़ काटकर पौधा लगाना न्यायसंगत नहीं है; एक दृश्यावलोकन 🙏
संवाद
'पेड़ काटना समूल विनाश का प्रारंभ'
50 लाख पेड़ राजस्थान में काटे गए पिछले 10 साल में सोलर के कारण। इसके विरोध में 500 से अधिक पर्यावरण-प्रेमी आमरण अनशन पर बीकानेर में बैठे हैं। पेड़ों को बेरहमी से काटने वाले ये कौन लोग हैं और पेड़ों के लिए जान देने वाले ये कौन लोग हैं-इसको गहराई से समझना चाहिए।
पेड़ों को बेरहमी से काटने वाले वे लोग हैं जिनके लिए पैसा सब कुछ है और पेड़ों के लिए जान देने वाले लोग अमृता देवी बिश्नोई के वंशज हैं जिन्होंने 18 वीं सदी में जोधपुर के महाराज के आदेश के विरुद्ध खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों के साथ अपनी जान कुर्बान कर दी थी।
21वीं सदी में आज प्रकृति के विनाश की कीमत पर जो विकास किया जा रहा है, वह इतना जानलेवा हो गया है कि राजधानी दिल्ली की हवा सांस लेने के योग्य नहीं रही।राजा हो या रंक; श्वास लिए बिना तो कोई भी जिंदा नहीं रह सकता। श्वास में हम ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ते हैं जबकि पेड़ कार्बनडाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। मानव और पेड़ एक दूसरे के परिपूरक है। इसीलिए पेड़ को भारतीय संस्कृति ने इतना ज्यादा महत्व दिया है कि एक पेड़ को 10 पुत्रों के बराबर माना है। पद्मपुराण में कहा गया है-
'दस हृद समो पुत्र:,दस पुत्र समो द्रुम:'
अर्थात् 10 तालाब के समान एक पुत्र और 10 पुत्र के समान एक पेड़ होता है।
यूं ही नहीं गीता में कृष्ण ने कहा कि वृक्षों में मैं पीपल हूं और यूं ही नहीं गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति वट वृक्ष के नीचे हुई। भारत में गुरुकुल प्रकृति की गोद में होते थे और उपनिषद वृक्षों की छाया में बैठकर रचे गए। प्रकृति की गोद में पलने वाले लोग इतने संवेदनशील होते थे कि अभिज्ञानशाकुंतलम् की नायिका शकुंतला पेड़ों को बिना जल पिलाए स्वयं जल ग्रहण नहीं करती थी, श्रृंगारप्रिया होने पर भी पत्तियों को नहीं तोड़ती थी और पौधों में फूल आने पर उत्सव मनाती थी-
'पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
ना दत्ते प्रियमंडनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्...
आज हम पेड़ों को बेरहमी से काटकर उस जमीन पर पत्थरों के मकान व कंक्रीट के रोड बना देते हैं और कटे पेड़ की लकड़ी से घर का फर्नीचर बना लेते हैं-
'छायादार वृक्षों के उपकार को हमने पूरी तरह चुका दिया
काट कर उसे मूल से घर का शानदार फर्नीचर बना लिया।'
इसका परिणाम क्या हो रहा है? हृदय पाषाण होता जा रहा है जो पेड़ों को ही नहीं काट रहा हैं बल्कि अपने मूल संबंधों को भी काट रहा हैं और अपने जन्म देनेवाले मां-बाप को भी भूल रहा हैं-
'पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है
घरों में अब हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है
बहलाकर छोड़ आते हैं लोग वृद्धाश्रम में मां-बाप को
अपने घरों में अब पुराना सामान कौन रखता है?'
एक समय संवेदनशीलता इतनी प्रगाढ़ थी कि महावीर ने कच्ची और गीली जमीन पर पैर रखने से मना किया ताकि उगते हुए हरे घास दबकर मर न जाए और दूसरी तरफ आज का समय है कि 50 लाख पेड़ विकास के नाम पर काट डाले गए।
आधुनिक युग में जगदीश चंद्र बोस ने यह प्रमाणित किया कि मनुष्य की तरह पौधों में भी जान होती है और संवेदनशीलता होती है। अब तो विज्ञान की नई खोज यह बता रही है कि पेड़ अपने पास आने वाले लकड़हारे की भावना को समझकर कंपने लगते हैं और माली को देखकर प्रसन्नता से झूमने लगते हैं। पेड़ इतने संवेदनशील होते हैं कि उनके पास यदि किसी कबूतर की गर्दन मरोड़ी जाए तो पेड़ अपने साथियों के साथ उदास हो जाता है मानो कबूतर से उसके प्राण जुड़े हों।
सागर यूनिवर्सिटी में जब ओशो पढ़ाते थे तो एक गुलमोहर के पेड़ से गले लगने के बाद क्लास में जाया करते थे। जब उन्होंने यूनिवर्सिटी छोड़ी तो वह गुलमोहर का पेड़ सूखने लगा। इसकी सूचना जब साथियों ने दी कि गुलमोहर पेड़ अंतिम सांसें गिन रहा है ; तब वे उस पेड़ से मिलने आए और उसे गले लगाए। किंतु उनके जाने के बाद वह पेड़ गिर गया मानो वह अपने प्रेमी से मिलन के लिए रुका हुआ था और प्रेमी के जाने के बाद जीना नहीं चाहता था।
पेड़ हमारे पारिस्थितिक संतुलन का और जीवंत चेतना का मूल आधार है। उनकी हरी पत्तियां जीवन को हरा-भरा बना देती हैं। वे फल,फूल और छाया ही नहीं देते बल्कि जीवन को गहरा मौन देते हैं। इसी कारण से पर्यावरणप्रेमी अपने प्राण की कीमत पर भी पेड़ बचाना चाहते हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹