🙏'घूसखोर पंडत' और 'कला की मर्यादा' पर मंथन जारी है। समुद्र मंथन से विष निकला तो अमृत भी : एक दार्शनिक विश्लेषण 🙏


संवाद


'पांडित्य और कला की कसौटी'


'घूसखोर पंडत' फिल्म ने सामाजिक भावना और कला- मर्यादा के बीच एक द्वंद्व को उपस्थित किया है। द्वंद्व से भागने की जरूरत नहीं है बल्कि उसके प्रति जागने की जरूरत है। 'पंडित' जैसे आदृत संज्ञा  के साथ 'घूसखोर' जैसे अपमानजनक विशेषण का प्रयोग करना ब्राह्मण समाज की भावना को आहत करता है लेकिन कला का काम समाज को दर्पण दिखाने के साथ आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करना भी तो है।


            घूसखोर हर वर्ग में होते हैं किंतु पंडित(ब्राह्मण) वर्ग में किसी का घूसखोर निकलना जन-आस्था को चोटिल करता है। क्योंकि


'ब्राह्मण ज्ञान,भक्ति,त्याग,परमार्थ का प्रकाश है


ब्राह्मण शक्ति,कौशल,पुरुषार्थ का आकाश है।'


                   ऐसे में कला प्रेमियों का कहना है कि 'घूसखोर पंडत' किसी व्यक्ति विशेष या किसी समाज विशेष पर आरोप नहीं है बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्न है जो नैतिकता का लबादा ओढ़कर अनैतिकता को बढ़ावा देती है।


           कला प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग करती है जो व्यक्ति से ज्यादा व्यवस्था पर चोट करती है। लेकिन विवाद तब जन्म लेता है जब प्रतीक को व्यक्ति या वर्ग से जोड़ दिया जाता है। यदि कला को स्वतंत्रता नहीं देंगे तो सत्य का अन्वेषण नहीं किया जा सकता।


             आश्चर्य की बात है कि 'घूसखोर पंडत' शीर्षक देने वाले भी ब्राह्मण वर्ग के ही हैं। यदि दूसरा विरोधी वर्ग इस शीर्षक को चुनता तो यह अपमान करने की भावना माना जाता लेकिन उसी समाज का एक कलाकार इस बात को कहता है तो वह आत्मनिरीक्षण की भावना माना जाना चाहिए। अतः ब्राह्मण समाज के द्वारा ही ब्राह्मण वर्ग के कलाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हंगामा बरपाना विचारणीय है।


           क्योंकि ब्राह्मण संस्कृति ने ही 'सत्यमेव जयते' का मंत्र दिया है। एक ब्राह्मण गुरु ने ही अपने शिष्य से उसके पिता का नाम पूछा तो शिष्य ने अपनी माता से पूछकर बताया कि मेरी माता का अनेक घरों में आना जाना था और अनेक पुरुषों के साथ संबंध था,अतः मैं किसका पुत्र हूं,यह मेरी माता नहीं जानती। तब उस ब्रह्म-गुरु ने इतने बड़े सत्य को कहने का साहस करने के कारण उस शिष्य को गले से लगा लिया और उस 'सत्यकाम' को अपना सर्वस्व ज्ञान प्रदान किया।


        यह विडंबना है कि जो कला समाज को आत्मपरीक्षण का अवसर देती है, वही समाज उसे अपना अपमान मान रहा है। लेकिन एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या कलाकार को यह नहीं सोचना चाहिए कि उसकी रचना का सामाजिक प्रभाव क्या होगा?


         मेरी दृष्टि में कलाकार को इस मामले में संवेदनशील होना चाहिए लेकिन यहां दिक्कत है कि कलाकार भी ब्राह्मण वर्ग का है जिसने पढ़ा है कि 'ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मण:' अर्थात् जो ब्रह्म (सत्य)को जाने वही ब्राह्मण। क्योंकि


'ब्राह्मण न धर्म और न जाति में बंधा इंसान है


ब्राह्मण मनुष्य के रूप में साक्षात् भगवान है।'


               फिर भी कला को न तो पूर्णतया निरंकुश होना चाहिए और न भयग्रस्त। साथ ही समाज को भी न तो छुईमुई पौधे की तरह होना चाहिए और न पाषाण के समान।


            सुखद खबर है कि फिल्म से जुड़े कलाकारों ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी की भावना आहत करने का कोई इरादा न था फिर भी आहत भावनावालों के विरोध को देखते हुए फिल्म में बदलाव कर दिया जाएगा। यह कलाकारों की संवेदनशीलता का परिचायक है।साथ ही समाज को भी संवादशीलता की ओर बढ़ना चाहिए। खासकर ब्राह्मण समाज से यह अपेक्षा की जाती है कि ब्राह्मणत्व की उस चरम कसौटी पर उसे खरा उतरना ही होगा जिसे उसके पूर्वजों ने स्थापित किया है। ब्राह्मणत्व को रुपए पैसे की तरह एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में हस्तांतरित (transfer) नहीं किया जा सकता, पवित्रतापूर्ण त्याग तपस्यामय जीवन से ही कोई ब्राह्मणत्व अर्जित करता है। इसलिए हमारी संस्कृति कहती है कि 'जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते' अर्थात् हर कोई जन्म से शुद्र के रूप में पैदा होता है और संस्कारों से ब्राह्मण बनता है।


              शाश्वत मूल्य की खातिर अपना अंतिम मोल चुकाने वाला ब्राह्मण होता है।महात्मा बुद्ध ने कहा कि किसी जाति में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नहीं हो जाता,ब्राह्मणत्व तो उपलब्धि है जिसे अपना सर्वस्व देकर अर्जित किया जाता है। स्वामी विवेकानंद ने भी इस ओर इशारा करते हुए कहा कि ब्राह्मणवाद की कितनी भी आलोचना की जाए लेकिन ब्राह्मणत्व भारतीय संस्कृति का प्राण है और अपनी त्याग- तपस्या से उस ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेना हर मानव का चरम लक्ष्य है। क्योंकि


'ब्राह्मण ज्ञान के दीप जलाने का नाम है


ब्राह्मण विद्या का प्रकाश फैलाने का काम है।'


             किंतु उसी ब्राह्मण वर्ग में जन्म लेकर कोई भेदभाव करे और किसी को ज्ञान प्राप्त करने से रोके तो वह सही अर्थों में ब्राह्मण नहीं हो सकता। ब्राह्मणवाद की सबसे प्रखर आलोचना स्वयं ब्राह्मणों ने की है क्योंकि नकली सिक्के असली सिक्के को चलन से बाहर कर देते हैं। ब्राह्मण सत्य के लिए सम्मान को भी विष समझता  है और अपमान को अमृत की भांति स्वीकार करने का साहस रखता है-


"सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।


अमृतस्येव चाऽऽकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा।"


                 'पोंगा पंडित' जैसी अनेक फिल्में भी इसी समाज में बनी और चली। 'घूसखोर पंडत' जैसी फिल्म उसी परंपरा में खड़ी है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता टकरा रही है। इस टकराव से एक दार्शनिक प्रश्न जन्म ले रहा है कि क्या कला को सच कहने का पूर्ण अधिकार है या उसे समाज की भावनाओं के अनुसार स्वयं को सीमित करना चाहिए?


इस प्रश्न के उत्तर की खोज भी ब्राह्मणत्व या पांडित्य की कसौटी है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹