प्रेम का नाम बदनाम न करो
February 12, 2026/start
🙏वसंत-उत्सव हो या वैलेंटाइन-डे अपने विशेष स्वरुप में काम की खाइयों से लेकर प्रेम की ऊंचाइयों के बीच झूलता रहता है। प्रकृतिप्रदत काम और संस्कृतिप्रदत्त प्रेम का एक सांस्कृतिक विश्लेषण 🙏
संवाद
'प्रेम का नाम बदनाम न करो'
वसंत-उत्सव हो या वैलेंटाइन-डे; दोनों ही प्रेम को समर्पित हैं। किंतु प्रेम बहुत ही बदनाम हो गया। पति ने प्रेमिका के साथ मिलकर पत्नी की हत्या की या पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या की अथवा प्रेमी ने प्रेमिका की हत्या की; इस प्रकार की खबरें आम हो गई हैं। अधिकतर फिल्में या सीरियल प्रेम को आधार बनाकर बनाई जाती हैं किंतु जीवन में प्रेम कहीं दिखाई नहीं देता।
इसके पीछे मूल कारण यह है कि कोयला को हीरा कितना भी बतलाया जाए किंतु हीरे की चमक कोयले में नहीं आ सकती। काम को कितना भी प्रेम का नाम दिया जाए लेकिन दोनों में अंतर है क्योंकि 'काम' कोयला है और 'प्रेम' हीरा है। कोयला ही रूपांतरित होकर हीरा बनता है लेकिन इसके लिए उसे दबाव से गुजरना पड़ता है। इसी प्रकार काम में प्रेम की संभावना छिपी हुई है किंतु उसे तपस्या की अग्नि से गुजरना पड़ेगा। काम प्रकृति है, प्रेम संस्कृति है।
अभिज्ञानशाकुंतलम् की नायिका शकुंतला दुष्यंत के साथ गांधर्व विवाह करती है और गर्भवती हो जाती है। दुर्वासा के शाप के कारण राजा दुष्यंत उसे भूल जाता है। पिता कण्व के द्वारा अपने पति के पास भेजी गई शकुंतला को अपने राज दरबार में जब राजा दुष्यंत अपनी प्रेमिका के रूप में पहचान नहीं पाता है तब वह शकुंतला क्रोधवश कहती है-
'मेरे हक पर वे ध्यान क्या देते
मेरी खातिर वे जान क्या देते
उनकी निगाहें परों पर थी मेरे
वे मुझे आसमान क्या देते?
सफर तय किया ख्यालों में
उन्हें रस्ते थकान क्या देते
जिस्म के दायरे में रहते थे
रूह को इत्मीनान क्या देते??
अब वह पति के घर से निकल जाती है और पिता के घर लौटने की स्थिति में नहीं होती है। तब उसे ऋषि के आश्रम में तपस्या से गुजरते हुए रहना पड़ता है और भरत नाम के बालक को जन्म देती है जिसके नाम पर हमारे देश का नामकरण 'भारत' पड़ा।
हमारी संस्कृति ने काम को देव कहा है-'कामदेव'। जिसको शंकर ने अपनी तपस्या भंग करने के अपराध में अपना तृतीय नेत्र खोलकर भस्म कर दिया था। यह तृतीय नेत्र विवेक है। काम भस्म होता है और फिर देव बन जाता है-कामदेव। संदेश है कि प्रकृतिप्रदत कामवासना जब शिव के संपर्क में आती है तो दिव्य प्रेम का अवतरण होता है।
स्कूलों में 'प्रजनन' चैप्टर विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है, किंतु उसे छुपाया ज्यादा जाता है। क्योंकि काम के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण सहज नहीं है। अतः मां-बाप और शिक्षक जिस महत्वपूर्ण विषय को ठीक से बता नहीं पाते हैं, वह विद्यार्थी द्वारा गलत जगह से गलत संगति से जान लिया जाता है। किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए कदम के दिनों में उसके अंदर का हार्मोन और विपरीत लिंग के प्रति उसका आकर्षण उसे दूर कहीं ले जाता है जिसको वह अपने मां-बाप और शिक्षकों से छुपाता है। अर्थात् 'काम' जो प्रकृति है, सहजता और स्वीकार्यता के अभाव में गलत माध्यम से विकृति बन जाती है।
'जब से तुमसे प्यार हुआ है,दुश्मन सब संसार हुआ है
गली गली देती है गाली,हर वातायन व्यंग्य सुनाता
हर कोई अब पथ पर चलते अंगुली से मुझको दिखलाता
मुझको अपराधी ठहराया,प्रीति रतन का चोर बताया
मेरे अपनों का भी मुझसे बदला सा व्यवहार हुआ है।'
वही काम-प्रकृति सम्यक्-शिक्षा से प्रेम-संस्कृति बन सकती है। इसके लिए हमारे जीवन का पहला आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम था जिसमें प्रकृति के वातावरण में गुरुकुल में शांत और आनंदपूर्ण गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी का जीवन बीतता था। आज पत्थरों के भवन में बाजार के बीच अशांत और महत्वाकांक्षी शिक्षक के द्वारा प्रतियोगितापूर्ण शिक्षा दी जा रही है। जिसके कारण विद्यार्थी की काम-ऊर्जा परिष्कृत नहीं होकर विकृत हो रही है। इस पर मोबाइल के अश्लील साइट्स ने उनकी भावना को और भड़काने का काम किया है। इसके परिणामस्वरुप प्रकृति से लड़ने के कारण अवसाद और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ती जा रही है।
आज भी जिस घर में और शिक्षालय में प्रेम और पवित्रता का वातावरण होता है,वहां पर नई पीढ़ी की काम-ऊर्जा प्रेम-ऊर्जा की ओर बढ़ती है। भारतीय ज्ञान परंपरा कहती है कि काम शरीर का भोजन है और प्रेम आत्मा का। किंतु माता-पिता और शिक्षक के साथ जो आत्मीय संबंध होता था, वह भी आज प्रेमपूर्ण कम और महत्वाकांक्षापूर्ण ज्यादा हो गया है। जिस बच्चे को घर में प्रेम नहीं मिला,शिक्षालय में प्रेम नहीं मिला उस बच्चे का संबंध 'काम' का होगा ही। हां!वह उस संबंध को "प्रेम" नाम देगा। किंतु नाम बदलने से काम प्रेम नहीं बन जाता। कोयले के ऊपर हीरा लिख देने से कोयला हीरा नहीं बन जाता। बल्कि 'काम' के तल पर
रह रहा संबंध "प्रेम" को भी बदनाम कर देता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹