सत्यम् शिवम् सुंदरम् से दूर हुई शिक्षा
February 15, 2026🙏महाशिवरात्रि की शुभकामना:उच्च शिक्षा में आत्महत्या को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का 40 पेज का निर्देश हमें मिला।उसे पढ़ने के बाद यह लेख आपके विचारार्थ प्रस्तुत है🙏
संवाद
'सत्यम् शिवम् सुंदरम् से दूर हुई शिक्षा'
'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' से हमारा शिक्षा जगत दूर हो गया है तभी तो आत्महत्या की घटना रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नेशनल टास्क फोर्स बनाया गया। उच्च शिक्षा संस्थानों को यूजीसी द्वारा गाइडलाइंस जारी की जा रही है। कैसी विडंबना है कि जीवन देने वाली शिक्षा जीवन लेने लगी। भारतीय ज्ञान परंपरा कहती है कि विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है किंतु महाविद्यालयों में विद्यार्थी मरने लगें तो क्या वहां दी जाने वाली विद्या को हम अमृत कहेंगे? शिव ने तो विष को भी इस कला से पिया कि वे देव से महादेव बन गए-
'बढ़ती चली गई उमर हर एक घूंट पर
पिया है हमने विष भी इतना कमाल से।'
लेकिन कंकर कंकर में शंकर को मानने वाला हमारा देश उस राहु के समान बन गया जो अमृत पीने के बाद दो भागों में काटा गया-राहु और केतु। संदेश साफ है कि 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' का मंत्र हो तो जहर का भी उपयोग किया जा सकता है और नहीं हो तो अमृत भी हमें काट सकता है।
'सत्यम्' :सत्य की खोज के लिए ही विद्या की साधना की जाती है। विज्ञान द्वारा हम पदार्थ के सत्य को जानते हैं और धर्म के द्वारा चेतना के सत्य को। आज विज्ञान ने पदार्थ के सत्य को जानकर अद्भुत आविष्कार करके हमारे जीवन को बहुत सुविधायुक्त बना दिया है किंतु चेतना के सत्य को आज नजरअंदाज कर दिया गया। जिसके कारण विज्ञान की एटम शक्ति संकीर्ण चेतना वाले लोगों के हाथों में जा रही है जिससे विनाश हो रहा है। परस्पर युद्धों में ही लोग नहीं मारे जा रहे हैं बल्कि अब आत्महत्या से भी बहुत लोग मरने लगे हैं। जीवन परमात्मा का उपहार है;जिसे मनुष्य दे नहीं सकता तो फिर उस जीवन को लेने का क्या अधिकार है?जीवन के इस सत्य से हम दूर हो गए।
'शिवम्' का अर्थ है-श्रेय या कल्याण। प्रेय और श्रेय दोनों मनुष्य के जीवन में आते हैं किंतु विवेकवान प्रेय को छोड़कर श्रेय का चुनाव करता है। प्रिय लगने वाली धन,पद,प्रतिष्ठा के पीछे आज की दौड़ आत्मघाती होती जा रही है। नचिकेता का यह देश भूल गया कि उस बालक को यमराज धन,पद,प्रतिष्ठा का लालच दे रहे थे किंतु उसने आत्मज्ञान रूपी श्रेय मांगा। धन,पद,प्रतिष्ठा वाले बहुत लोग आज अवसाद और आत्महत्या का शिकार हो रहे हैं किंतु एक भी आत्मज्ञानी ऐसा नहीं मिला जो अवसाद का शिकार होकर आत्महत्या किया हो। आत्मज्ञानियों ने तो झोपड़ी में परमात्मा के गीत गाए और अत्यंत प्रतिकूलताओं में आशा के दीपक जलाए।
'सुंदरम्' है जीवन में सौंदर्य की खोज। आज यह सौंदर्य की खोज बाहर परिधि पर केंद्रित हो गई है। शरीर के सौंदर्य के पीछे भागने वाली इस दुनिया में मन के सौंदर्य के साधक बहुत कम हो गए हैं। आत्मा के सौंदर्य की साधना करने वाले तो दुर्लभ हो गए। भारतीय ज्ञान परंपरा कहती है-'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'अर्थात् आत्मा ही देखने योग्य,सुनने योग्य, मनन करने योग्य और होने योग्य है।
'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' की आराधना की ओर यदि हमारा शिक्षा जगत नहीं लौटता तो संवेदनशीलता,संवादशीलता, क्रियाशीलता की ओर हमारी पीढ़ी उन्मुख नहीं हो पाएगी। कहां तो हमें शिक्षालय को सही मायने में विद्यालय से महाविद्यालय और विश्वविद्यालय बनाना था और कहां हम शिक्षालय को कार्यालय बनाते जा रहे हैं जिसके परिणामस्वरुप अवसाद और आत्महत्या की घटना बढ़ती जा रही है। उस पर से शिक्षक की गौरव-गरिमा धूलधूसरित करने के नए-नए आदेश प्रतिदिन आ रहे हैं। स्थायी शिक्षक से हम संविदा शिक्षक की ओर कदम बढ़ा रहे हैं और बढ़ रहे अवसाद और आत्महत्या पर आंसू भी बहा रहे हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹