🙏रील बनाने के चक्कर में तेज रफ्तार वाले स्कॉर्पियो से एक नाबालिग ने एक बेटे को कुचलकर एक मां की सारी दुनियां उजाड़ दी। संपत्ति ने साहिल को ही नहीं बल्कि संस्कार को भी सड़क पर कुचल दिया और साहिल की मां को मझधार में छोड़ दिया-एक मार्मिक विश्लेषण 🙏


संवाद


'साहिल की मां मझधार में'


साहिल का अर्थ होता है-किनारा। दिल्ली में अपनी मोटरसाइकिल से जा रहा 23 वर्ष का साहिल तेज रफ्तार स्कॉर्पियो से कुचल दिया गया। महंगी स्कॉर्पियो गाड़ी को एक नाबालिग चला रहा था और रील बनाने के चक्कर में गाड़ी का रफ्तार बढ़ाता जा रहा था। बगल की सीट पर उसकी बड़ी बहन थी। कोर्ट द्वारा नाबालिग को दसवीं की परीक्षा देने के लिए जमानत भी मिल गई जबकि कई बार तेज रफ्तार के कारण उस गाड़ी का चालान किया गया था।


न्याय की गुहार लगाते हुए आंसूओं से भरी साहिल की मां का दर्द मुझे रात भर सोने नहीं दिया। अकेले ही कितने जतन से उसने अपने बेटे को पाला-पोसा और संस्कार देकर बड़ा किया। बड़े सपने लेकर अपनी परिश्रम की बदौलत साहिल अपनी मां को अनुपम उपहार देने के ख्याल के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए निकला था। किंतु जो सड़क कार्यस्थल तक पहुंचाती है, उसी सड़क पर मौजमस्ती के लिए निकले हुए एक लापरवाह रफ्तार प्रेमी ने उसे यमलोक तक पहुंचा दिया। खबर है कि अपने बर्थडे गिफ्ट में उसने अपने पिता से यह बड़ी महंगी गाड़ी प्राप्त की थी और उसके पिता ने उसके लिए नकली लाइसेंस भी कहीं से बनवा कर दे दिया था।


यह सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं है बल्कि बच्चों की परवरिश पर और संवेदनशीलता पर सवाल खड़ी करती एक गंभीर घटना है। क्या मौजमस्ती पूर्ण करने के लिए महंगी गाड़ी और खुली आजादी देना ही मां-बाप का प्रेम है? क्या अपने मन की रफ्तार को पूरा करने के लिए दूसरे के सपनों को भूल जाना ही शौक-मौज है?


संपत्ति अर्जित करके अपने बच्चों को सुख-सुविधाओं से लबरेज़ कर देना ही मां-बाप का धर्म नहीं है। जन्म देकर संस्कारित जीवन देना भी मां-बाप का धर्म है।संपत्ति तो एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में क्षणमात्र में स्थानांतरित हो जाती है किंतु संस्कार एक जीवन से दूसरे जीवन में स्थानांतरित होने में बरसों लगते है। रफ्तार मन को बहुत प्रिय है किंतु जीवन के लिए वह कल्याणकारी भी हो और मंजिल तक पहुंचाने वाली भी हो,इसके लिए उस रफ्तार पर विवेक का अंकुश होना भी जरूरी है।


यह जीवन और जगत भी अद्भुत रहस्य से भरा हुआ है। अपने बच्चे को संस्कार देने वाली साहिल की मां अपने बेटे को खोकर आज मझधार में है और दूसरी तरफ अपने बच्चे को सिर्फ संपत्ति देने वाले मां-बाप और विवेकहीन रफ्तारवाला नाबालिग अपराधी कानून की कमियों का फायदा उठाकर किनारे पर है-


'बरसों लगे जिस साहिल को संवारने में


क्या तेरा गया क्षण भर में उसे मिटाने में?'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹