तकनीकी प्रगति बनाम नैतिक प्रगति
February 20, 2026🙏एआई सम्मिट में गलगोटिया विश्वविद्यालय के झूठ पर बहुत लोग पत्थर फेंक रहे हैं, यह सत्य के प्रति हमारे आकर्षण को दिखाता है। किंतु हम स्वयं कितना सत्य के रास्ते पर चल रहे हैं,यह घटना हमें आईना भी दिखाता है- एक दार्शनिक विश्लेषण 🙏
संवाद
'तकनीकी प्रगति बनाम नैतिक प्रगति'
इंडिया एआई इंपैक्ट सम्मिट का उद्देश्य तकनीकी प्रगति का प्रदर्शन करना था किंतु गलगोटिया विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित 'रोबो डॉग' ने नैतिक प्रगति के प्रश्न को प्रमुख बना दिया। चीन की उपलब्धि को अपना बताकर पेश करने के कारण यह विश्वविद्यालय विवादों में आ गया और इसे भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। दूसरे के आविष्कार को अपना बता देने की यह कोई पहली घटना नहीं है किंतु जितनी प्रमुखता के साथ इस घटना पर प्रतिक्रिया दी गई है, इससे ऐसा लगता है कि नैतिक प्रगति का प्रश्न इस देश के लिए सबसे बड़ा प्रश्न है।
भारतीय संस्कृति का सबसे पहला विषय "दर्शन" था। दर्शन किसी भी विषय के मूल तक पहुंचने की कोशिश करता है। इसीलिए इसमें ज्ञान की ऊंचाई और गहराई दोनों होती है। द्रष्टा ऋषियों के कारण से भारत विश्वगुरु बना जिनकी दृष्टि जीवन ही नहीं बल्कि जीवन के पार देखने की भी थी-
'अपना क्या है इस जीवन में सब कुछ लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार।'
इसलिए भारत ने जो कुछ भी ज्ञान और विज्ञान अर्जित किया उसे 'सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय' सभी के लिए समर्पित कर दिया। कई प्रसिद्ध कृतियों के लेखक के बारे में पता नहीं चलता क्योंकि उन्होंने अपनी जीवनी को नहीं बल्कि अपनी कृति को ज्यादा महत्व दिया; अपनी कृतियों का श्रेय अपने प्रयास से ज्यादा परमात्मा के प्रसाद को दिया।
आज का युग 'प्रदर्शन का युग' है।इसमें किसी भी नई उपलब्धि को पेटेंट कराकर अपना बताने की प्राथमिकता पर जोर है। विकसित देश में स्थित किसी संस्था को पेटेंट का अधिकार है और जिसकी पहुंच वहां है, वह किसी भी देश के उत्पाद को या विचार को अपने नाम से पेटेंट करवा लेता है। दूसरे शब्दों में कहें तो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस।'
आज के तकनीक प्रधान सोशल मीडिया के युग में फिर से सत्य पर आग्रह इतना ज्यादा क्यों है,यह एक विचारणीय प्रश्न है। इसका मूल कारण दर्शन द्वारा ही मिलता है जो उद्घोषणा करता है कि सत्य की ही जीत होती है 'सत्यमेव जयते'। यह शाश्वत मूल्य शिक्षा-संस्थान के लिए सिर्फ एक नारा नहीं होता है बल्कि जीवन में एक सितारा होता है जिसके आलोक में जीवन आगे बढ़ता है। शिक्षक जानता है कि सत्य क्या है,फिर भी वह झूठ बोलता है तो सामाजिक जीवन के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। जीवन की सार्थकता तो सत्य में ही है। सफलता भले ही झूठ से मिल जाए किंतु सुफलता तो सत्य के बिना नहीं मिल सकती। आज के तथाकथित शिक्षित लोग यदि भ्रष्टाचार और व्यभिचार में लिप्त हैं तो उसका मूल कारण सत्य से उनकी बढ़ती दूरी है।यही कारण था कि गांधी साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर जोर देते थे।
गलगोटिया विश्वविद्यालय एक शिक्षा-संस्थान है,जहां मानव का निर्माण होता है। झूठ के आधार पर निर्मित मानव प्रदर्शन का मानव हो सकता है, सत्य की खोज वाला दर्शन उसमें नहीं पैदा हो सकता। अतः शिक्षण-संस्थानों के लिए यह एक बहुत बड़ा सबक है क्योंकि उनके दामन बहुत सफेद है और उस पर एक छोटा काला धब्बा भी बहुत बड़ा दिखाई देता है।
लेकिन आज के प्रदर्शन के युग में शिक्षण-संस्थान कई प्रकार के झूठे आंकड़े भेजने के लिए बाध्य हैं। इन आंकड़ों को भेजकर शिक्षक की नौकरी तो बच जाती है किंतु उसकी आत्मा मर जाती है। यही कारण है कि शिक्षण संस्थानों में जो नैतिक पाठ पढ़ाया जा रहा है,वह विद्यार्थी को सत्य का दर्शन नहीं, सत्य का प्रदर्शन सिखा रहा है। जिसके कारण हमारा जीवन दो भागों में बंट गया है-एक आदर्शात्मक शब्दों की दुनिया और दूसरा व्यवहार की वास्तविक दुनिया। इसलिए आज शपथ लेने वाला जिस बात की शपथ लेता है, उस बात के विरुद्ध आचरण करता दिखाई देता है-
'झूठ बोलने वाला है वो उसके हाथों में गीता है
संबंधों के पैबंदों को सिर्फ बातों से ही सीता है।'
राजनीति प्रधान आज की दुनिया में 'बहुमत के द्वारा सत्य का निर्धारण होता है' और 'जो जीतता है वही अपने आपको सत्य बताने लगता है।' जबकि सत्य बहुसंख्यक का मोहताज नहीं होता। आज का ट्रंप-कार्ड (तुरुप का पत्ता) असत्य है या सत्य हम सभी को मालूम है-
'सियासत ने हमें इस मुकाम पर पहुंचाया है
सत्य के नाम पर झूठ बोलना सिखाया है।'
ऐसे माहौल में हमें "सत्य क्या है?" और 'सत्य के साथ जीना क्यों मुश्किल हो गया है?' इस प्रश्न पर भी गहराई से विचार करना चाहिए।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹