एक अनमोल रिश्ते की विदाई
February 21, 2026/start
🙏भावपूर्ण श्रद्धांजलि🙏
संवाद
'एक अनमोल रिश्ते की विदाई'
93 वर्षीय पंडित गोपीकृष्ण भट्ट जी की अंतिम महायात्रा से अभी मैं तुरंत लौटा हूं। उनके सुंदर तन को अग्निसात होते हुए देखकर एक तरफ जीवन की नश्वरता का बोध गहरा हो रहा है तो दूसरी तरफ रहस्यदर्शी ओशो की एक बात को यादकर जीवन के एक सत्य की झलक भी मिल रही है। ओशो कहा करते थे कि जीवन का यदि सम्यक विकास हो तो तन के सौंदर्य से भी ज्यादा मन का सौंदर्य निखरता है लेकिन जिस दिन आत्मा का सौंदर्य निखर जाता है उस दिन जीवन के सौंदर्य का कोई ठिकाना ही नहीं रहता। तब वृद्धावस्था भी सर्वाधिक सुंदर अवस्था होती है।
उम्र बढ़ने के साथ मेरे पिताजी का सौंदर्य निखरता चला गया था, वैसा ही सौंदर्य मुझे पंडित गोपी कृष्ण भट्टजी में दिखाई देता था। अब यह सौंदर्य तन,मन और आत्मा में से किसका था,यह पता नहीं चलता था। किंतु उनके प्रेमपूर्ण शीतल छांव में कुछ देर बैठकर ऐसा लगता था कि जीवन की तपिश गायब हो गई। उन्होंने मेरे घर की पूजा कराई थी।वे बड़े स्नेह से मुझे अपने घर बुलाते और अपने जीवन के गहरे अनुभव और अध्यात्म की बात बताते। संस्कृत का विद्यार्थी होने के कारण संस्कृत के शिक्षक की बात को मैं बहुत ध्यान से सुनता था और उनके ज्ञान की प्यास को देखकर विस्मयविमुग्ध हो जाता था। कई किताबें उन्होंने मुझसे मंगवाई और पढ़कर अपनी व्याख्या मुझे बताई।
एक बार उन्होंने 'माधव' शब्द का अर्थ मुझसे पूछा। मैंने कहा कि मेरी जानकारी में माधव शब्द कृष्ण के लिए प्रयुक्त होता रहा है। किंतु उन्होंने "माधव" शब्द की नई व्याख्या सुनाई जो मैंने पहले नहीं सुनी थी और अभी भी किसी को बताता हूं तो यह व्याख्या किसी को रास नहीं आती। लेकिन उनकी अद्भुत व्याख्या मेरे को बहुत पसंद आई और जीवन के लिए एक नई दिशा भी दिखलाई। उन्होंने कहा 'मा धाव' अर्थात् मत दौड़ो। 'मा धाव' ही घिसकर "माधव" बन गया। शास्त्रीय दृष्टि से यह व्याख्या किसी को सही नहीं लगे किंतु जीवन की दृष्टि से यह व्याख्या मुझे बहुत सही लगी। जीवन को आज दौड़ बना दिया गया है। हर व्यक्ति हर जगह किसी न किसी दौड़ में शामिल है लेकिन किसी को भी मंजिल नसीब नहीं होती जहां वह ठहर कर सुकून पा सके-
'मंजिल मंजिल करती दुनिया मंजिल है कोई शै नहीं
जिसको देखा चलते देखा पहुंचा तो कोई है नहीं।'
माधव के लिए जीवन दौड़ नहीं था , वे तो बसंत की नदी की भांति मंद-मंद अपनी मस्ती में बहते थे। होठों पर बांसुरी रखकर कभी मधुर गीत गाए तो कभी उंगलियों पर सुदर्शन चक्र रखकर अपने कर्तव्य भी निभाए। संदेश साफ था कि मौसम कोई भी हो किंतु मंद मुस्कान और निश्चिंत भाव बनाए रखना-
'हर मौसम में नीरव और निश्चिंत रहना
वसंत की नदी की भांति मंद मंद बहना।'
पंडित गोपी कृष्णजी मेरे लिखे हर लेख को पढ़ते और वीडियो को देखते फिर अपने अनुभवों की उन पर बारिश करते। 60 वर्ष की अवस्था में सरकार सेवानिवृत्त कर देती है किंतु 90 वर्ष के पार की अवस्था में भी उनकी सेवाभावी वृत्ति को देखकर किसी महान दार्शनिक का कथन याद आ जाता है कि शिक्षक कभी भी सेवानिवृत्त नहीं होता (A teacher never retires).
मोक्षधाम पर उनके सुपुत्र से पता चला कि पंडित जी कल पंचांग देखते हुए अचानक चल बसे। भारत रत्न अब्दुल कलाम साहब ने जिस प्रकार से व्याख्यान देते हुए जीवन की अंतिम सांस ली, उसी प्रकार से पंडित गोपी कृष्ण भट्ट जी ने भी अध्ययन अवस्था में अपनी अंतिम सांस ली। पूजा-पाठ,अध्ययन-मनन, प्रभुस्मरण-ध्यान के कारण उनके गौर वर्ण से एक आभा निकलती थी जिसे देखकर मैं अभिभूत हो जाया करता था। एक तरफ आज उनके देहावसान से मन शून्य होता जा रहा है किंतु दूसरी तरफ आत्मा की अमरता में विश्वास करने वाला मन श्री कृष्ण को याद कर रहा है-
'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।'
प्रेम में पगे हुए आत्मा की थोड़ी देर की संगति से मेरा हृदय जब इतना विह्वल हो रहा है तो उनके परिवारजनों की शोकविह्वलता का अनुमान लगा पाना असंभव है।
हे परमात्मा!परिजनों को वियोग सहने की शक्ति प्रदान करना और दिवंगत आत्मा को मुक्ति!
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि!!!
ओम् शांति:शांति:शांति:🙏🙏🙏
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹