🙏जीवन का कोई दिन कुछ विशेष द्वंद्व से गुजरता है और अंत में जीवन के लिए एक प्रश्न छोड़ जाता है-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'आखिर जीवन है क्या?'


21 फरवरी का दिन दो विरोधी भाव में बीता-वैराग्य में और राग में। सुबह का समय अपने आदरणीय जन की अंतिम महायात्रा में शामिल होकर मोक्षधाम पर बीता और शाम का समय परिणय वाटिका में अपने प्रिय विद्यार्थी के शादी समारोह में बीता।


मोक्षधाम से आने के बाद जीवन की निरर्थकता का बोध गहराता चला गया और कहीं भी आने-जाने का जी नहीं कर रहा था। किंतु घर के पास की वाटिका में गूंज रही शहनाई आमंत्रण की याद दिलाने लगी। मन में एक द्वंद्व चलने लगा। एक मन कहे कि कान बंद कर लो और दूसरा मन कहे कि शादी का दिवस भी बार-बार नहीं आता। शिक्षक का पहुंच कर आशीर्वाद देना विद्यार्थी के लिए विशेष मायने रखता है।


सुबह में जीवन की डाल से स्वाभाविक रूप से टूटे हुए एक पीले पत्ते को अंतिम विदाई दिया था और शाम को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने वाले नए जोड़े को शुभकामना देने जाना था। मन तो कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था किंतु अंतरतम ने आदेश दिया कि जीवन जो रंग दिखाए, उस रंग में रंग जाना चाहिए-


'तंतु प्रेरित गात्र हो तुम,एक पुतले मात्र हो तुम


इस जगत की नाटिका के क्षणिक भंगुर पात्र हो तुम।'


इस जीवन रूपी नाटिका के क्षणभंगुर पात्र की भूमिका निभाते हुए शादी समारोह में गया और वहां से लौट कर अपने अंदर में उमड़ते घुमड़ते हुए गहरे दार्शनिक भाव को देखने लगा।जीवन सुख-दुख,सफलता-असफलता, मिलन-वियोग के अलावा और क्या है?


'लुटता कहीं पराग पवन में,कहीं चिता की राख है


किरण जादुई खड़ी कहीं पर, कहीं वितप्त सलाख है


एक तरफ है फूल सेज पर, एक तरफ अंगार है


विधना के बस इसी खेल में यह मिट्टी लाचार है।'


मनुष्य तो विधि के हाथों का एक खिलौना मात्र है। नहीं तो पूछकर जन्म दिया जाता है और नहीं पूछकर मृत्यु आती है-


'लाई हयात आए, कजा ले चली चले


न अपनी खुशी से आए,न अपनी खुशी चले।'


ऐसी बेबसी की दशा में एक प्रश्न मन को परेशान करने लगा कि क्या अपने वश में सचमुच कुछ नहीं? क्या जीवन रूपी नदी के दो विरोधी तटों से टकराते रहने का नाम ही जिंदगी है?तभी एक विचार कौंधा कि एक वृक्ष पर दो पक्षी हैं उसमें से एक कर्ता-भोक्ता बनकर कड़वे व मीठे फलों को खा रहा है और सुख-दुख में डूब-उतरा रहा है लेकिन दूसरा पक्षी इन सारे खेलों का द्रष्टा मात्र है-


द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।


तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥


इस महामंत्र के ध्यान में आते ही मन फिर से एक प्रश्न में उलझ गया कि क्या साक्षीभाव में हम कभी प्रतिष्ठित हो सकते हैं या हमारी आंखें खुशी या गम के आंसुओं से ही भरी रहेंगी?


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹