🙏देश की राजनीति में आज 'गद्दार शब्द सबसे ज्यादा प्रयोग में है‌। लेकिन किसी को गद्दार कहने का हमारा आधार ही गलत या संकीर्ण हो तो निष्कर्ष कहां से सही होगा?-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'गद्दार कौन,वफादार कौन'


देश की राजनीति में आज गद्दार शब्द सबसे ज्यादा गूंज रहा है। गद्दारी के अनेक उदाहरण दिए जाते हैं किंतु विभीषण को गद्दारी का पर्याय माना जाता है।'घर का भेदी लंका ढाए' लोकोक्ति इतनी प्रचलित हुई कि रावण नाम तो किसी का मिल जाएगा किंतु विभीषण नाम मिलना मुश्किल है।


            एक तरफ हमारी संस्कृति सत्य के पक्ष में खड़े होने को कहती है और दूसरी तरफ सत्य के पक्ष में खड़े होने वाले को परंपरा में कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। रावण असत्य व अधर्म के रास्ते पर था और राम सत्य व धर्म के रास्ते पर थे। जब विभीषण के सत्य व धर्म की बात सुनने के लिए रावण तैयार नहीं हुआ तो विभीषण राम की शरण में चले गए। गहराई से विचार करें तो विभीषण ने अंतरात्मा की आवाज सुनी-


'टोक देता है कदम जब भी गलत उठता है


ऐसा लगता है कि कोई मुझसे बड़ा है मुझमें


अब तो ले दे के वही शख्स बचा है मुझमें


मुझको मुझसे जुदा करके जो छुपा है मुझमें।'


                 अपनी अंतरात्मा की आवाज पर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को 1922 में घटित चौरीचौरा कांड के बाद वापस ले लिया जबकि तत्कालीन कांग्रेस के सारे नेता इसके विरोध में थे। क्या गांधी गद्दार थे?


            महात्मा विदुर ने हस्तिनापुर की राजसभा में महामंत्री होने के नाते हमेशा युवराज दुर्योधन के हर गलत कृत्य और निर्णय का विरोध किया और जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने महामंत्री पद छोड़कर अलग रास्ता आख्तियार कर लिया। क्या विदुर गद्दार थे?


             सुभाष चंद्र बोस ने 1939 में गांधी द्वारा समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में हरा दिया और फिर कांग्रेस से अलग हो गए। क्या नेताजी गद्दार थे? ध्यान रहे गांधी का घोर विरोध करने वाले नेताजी ने गांधी जी को 'राष्ट्रपिता' अपने संबोधन में कहा।


               गद्दार कौन है और वफादार कौन है;इसका निर्णय आसानी से नहीं लिया जा सकता। सत्ता के पक्ष में खड़ा होना वफादारी नहीं है और विपक्ष में खड़ा होना गद्दारी नहीं है। आज की राजनीति में व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है,दल महत्वपूर्ण है। अंतरात्मा व्यक्ति के पास होती है,किसी दल के पास नहीं होती। व्यक्तियों में भी सभी की अंतरात्मा जागृत नहीं होती। कोई गांधी, कोई सुभाष उस ऊंचाई पर पहुंचते हैं जो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते ही नहीं है बल्कि लाखों विरोध के बावजूद उस पर आगे चलते भी हैं। अंतरात्मा की आवाज सुनने वाले और उस पर अकेले भी चलने की हिम्मत रखने वाले गांधी और सुभाष एक दूसरे को कभी गद्दार नहीं कहते। वे जानते थे कि हमारे रास्ते अलग हैं किंतु मंजिल एक है-भारत माता की आजादी।


               आज भारत माता की कानों में जब गद्दारी जैसा शब्द जाता होगा तो वे भी आश्चर्य में पड़ जाती होंगी। क्योंकि महापुरुषों के चरित्र हनन की हमने नई पाठशाला शुरू कर दी हैं। वे महापुरुष आकर अपने चरित्र का बचाव भी नहीं कर सकते और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में पढ़कर आज की पीढ़ी को लगता है कि किसी महापुरुष के पास कोई चरित्र था ही नहीं। ऐसे में मूल्यविहीन और चरित्रहीन पीढ़ी पैदा होती है। प्रेरणा नहीं हो तो फिर कोई क्यों ऊंचे मूल्य या ऊंचे चरित्र के रास्ते पर अपने जीवन को आगे ले जाएगा?


           वस्तुत: मानव जीवन इतना जटिल है कि किसी एक कृत्य (one action) के आधार पर किसी को गद्दार या वफादार घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो कर्ता के समग्र जीवन को आधार बनाना पड़ेगा।


                 आज की राजनीति किसी के एक कृत्य को पकड़ ले रही है और उसके आधार पर कर्ता को (व्यक्तित्व को) गद्दार घोषित कर देती है। ऐसी राजनीति उस कालिदास के रास्ते पर है जो उसी डाल को काट रहे थे जिस डाल पर बैठे हुए थे।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹